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आकांक्षा यादव
खत्म होती वृक्षों की दुनिया पक्षी कहाँ पर वास करें किससे अपना दुखड़ा रोयें किससे वो सवाल करें
कंक्रीटों की इस दुनिया में तपिश सहना भी हुआ मुश्किल मानवता के अस्थि-पंजर टूटे पृथ्वी नित् हो रही विकल
आकांक्षा यादव की कविताएँ