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नई तस्वीर

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कलायन पत्रिका

मथुरा कलौनी की उत्तरांचल से संबंधित कहानियाँ


कहानी – सावित्री परमार

 

विनोद ने जैसे ही घर मैं पांव रखा कि उसे लगा, जैसे पूरे वातावरण मे बदबूदार सीलन भरी हुई हो। अजीब-सा भारीपन, बेहद घुटन। तभी सन्नाटे को तोड़ ती हुई बुआजी की तीखी आवाज आई
”अरे बबुनी! सच बात सुनते ही क्यों आग-बबूला हो जाती हो! सारे दिन तो बच्चे स्कूल में पड़े रहते हैं। यों तब तो बड़ी गुनगुना-गुनगुना कर फुरकियां मारती हो! कलेजे में ठण्डक जो पड़ती है। अरे राम! जैसे ही बालकों ने घर की चौखट लांघी नहीं कि तुम्हारे सिर पहाड़ टूटा… बस, रहने दो, हमसे मत बनो।”

उसके मुंह का स्वाद एकदम कड़वा हो गया। अन्दर जाये या लौट जाय। वह इसी अनिश्चय की स्थिति में था कि नीला का निचुड़ा-सा स्वर सुनाई दिया,

”क्या बोल रही हैं, बुआजी! कुछ तो सोचा करिये, बोलने से पहले! हमेशा जली-कटी। कभी प्यार की बात नहीं…”

इस बार तो बुआजी दहाड़ उठीं,

”अरे, यों क्या सामने खड़ी तबला सा मुंह खोले बोली-ठोली मार रही हो! जरा-सा कुछ कहते ही हाथ धोकर पीछे पड़ जाती हो। सब जानते हैं हम। यों उपदेस घोलकर मत पिलाओ। तिरिया चरित्तर बहुत देखे हैं…”

बुआजी अभी और कुछ कहने जा रही थीं लेकिन उस पर नजर पड़ते ही झटके से मुड़ी और चटाई पर सूखती बड़ियों को उलटने-पलटने लगीं।

उसका मन बड़ा खिन्न हो उठा। दफ्तर के तनाव और थकान से पहले ही दिमाग शून्य हो रहा था, रहा-सहा इस घर के माहौल ने तोड़ दिया। पूरा घर उसे आग की भट्ठी की तरह लगा। तीनों बच्चे आंगन के कोने में सहमे-से खड़े थे। एक तरफ चौकी पर उन लोगों के बस्ते बेतरतीब पड़े हुए थे।

वह उखड़ा-उखड़ा सा दालान में दाखिल हुआ और स्टूल पर पांव टिका कर जूते के फीते खेालने लगा। रसोई से कप-प्लेटें खटकने की तेज आवाज आई। इस कर्ण-कटु आवाज से ही उसने अन्दाजा लगा लिया कि नीला बड़े सत्यानाशी मूड में चाय-नाश्ते की तैयारी में उलझ रही थी। उसके सिर की नसें और कस गई। क्या होगा इस चाय-नाश्ते का? उसे शरीर की सारी शिरायें बुखार में तपती-सी लगीं। आंखों में जैसे कंटीला जंगल उतर आया था। पूरा ही वजूद एक जलता हुआ तंदूर हो उठा था।

पेट में कहीं कड़कड़ाहट-सी हुई। भूख का अहसास। पहले क्या करे! थोड़ा लेट जाये या यों ही इस मनहूस घर में प्रेत बना खड़े रहे! वह नल की ओर बढ़ा और पूरी धार खोलकर सिर के ऊपर ले ली। आंखे, माथा, गर्दन… सब शांत… बड़ी राहत। कई घूंट पेट में उतार लिये। खाली आंतों में जाकर लोहे की नुकाली कीलों की तरह पानी चुभ गया।

उसने छाती की पूरी शक्ति लगाकर पेट में हवा भरी। नीला को आवाज दी, लेकिन उत्तर नहीं मिला। तीनों बच्चों की तरफ देखा तो उन्होंने नजरें चुरा कर मुह बिसुर लिया। झुझलाकर नंगे ही पैरेां वह रसोई की तरफ गया। चाहने पर भी बुआ से बोलने की तबीयत नहीं हुई। गीले बालों से पानी अब भी पलकों पर टपक रहा था। पोंछा नहीं। अच्छा लग रहा था। कहीं तो भीगापन मिले! वर्ना स्साली जिंन्दगी।

कमाल हैं! वह रसोई के दरवाजे पर पूरे डेढ़ मिनट से खड़ा है और यह नीला नाम की ओरत उसे नकारे जा रही हैं। हद है जुनून की भी। कुढ़-कुढ़ कर घुल रही हैं। पूछो भला क्यों! टपने को शायद सुपीरियर सोचती होगी! बाकी सब फुलिश। बड़ा घमंड है उसे, कि वह काम में खटती है और तो सब जैसे निठल्ले हैं, निकम्मे हैं! सोचे, किसी का क्या लेगी! कभी सोचती है कि ये स्साला, जो गधा बना खड़ा है, उसकी भी कुछ ओकात हैं! लेकिन इसकी नजर में तो ये उल्लू हैं इसे क्या पता कि दफ्तर की मशीनों में कितना खून जलाना पड़ता हैं फाइलों की कब्रा में कितने घंटे अपने को दफताना पड़ता हैं वो साली मेज भी साहब के कमरे से चिपकी हुई रहती है हर समय नंगी तलवार कंधे पर छीकों तो एटिकेठ का खयाल तेज बोलो तो असभ्य कुर्सी सरकाओ तो फूहड़पन उबासी आये तो लेथार्जिक अंगड़ाई आ जाये तो गंवार खुलकर हंस पड़ो तो जंगली पूरा माडौल साला अंग्रेज मगरमच्छ का एकदम खुला जबड़ा पूरे वक्त सौ झिड़कियां। बनर्जि ठीक ही कहता है कि अफसर को गधे-घोड़े की तरह समझा। आगे भी टक्कर और पीछे भी दुलत्ती! दफ्तर बंद होते ही सभी बाबू लोग कैसी उमंग से घर की ओर भागते हैं, और वह।।।!

नीला की पीठ पर मछलियां-सी तैरीं रो रही है क्या उसके विचारों को झटका लगा स्टोव पर चाय खौलते-खौलते काली पड़ती जा रही थी उसने खुद केतली उतार कर नीचे रख दो नीला जैसे सपने से जागी आंखसें में बाढ़-सी तैर रही थी बोली, ”चलो, यहां क्या खड़े हो! मैं चाय ला रही हूं।”

मन में आया कि यह दे भाड़ में जाझे तुम और तुम्हारी चाय एक बेढ़ंगी-सी गाली आते-आते रह गई वह आकर कमरे की खरैरी खाट पर पड़ गया अब बरामदे में ने बुआ थी, न बच्चे जरुर पूजा की कोठरी में होंगे और बुवाजी उसने नल के ऊपर वाले पत्थर की ओर झंाकर देखा वहां तुलसी-दीप नहीं जलाया गया था इसके मायने यह रहे कि वो भी दिया-बत्ती किये बिना कोपभवन में जा चुकी थी मरो सब! उसने भी कमरे की लाइट नहीं जलाई ये घर हैं! एकदम बकवास बच्चे भी एकदम ईडियट बनेंगे।

चूडियां खनकीं बेमन से गर्दन घुर्मा चाय-नाश्ता आ गया था अदरक-तुलसी पड़ी हुई, कलईदार गिलास में, बुआजी के लिये, खालिस दूध की चाय थी उसने गिलास लेकर रुमाल से लपेटा और बुआ के कमरे की ओर गया।

”लो बुआ! उठो, चाय लो”

”रहने दो लल्लू! चाय बिना मरे नहीं जाते हैं” आवाज में जैठ की दोपहरी की नपन थी।

”क्या बात है बुआ! ये रेाज खट-पट यही तुम्हारी बहु है अब तो आओ या जाओ, एक ही हाय-हाय मनहूसियत छाई रहती है तुम लोगों की कायं-कायं में ये बच्चे और तीन कौड़ी के हुए जा रहे हैं नीला सारे घर का काम करती हैं तुम्हारी सेवा से लेकर बच्चों की देखभाल तक जाने तुम्हारा रुख क्यों नहीं मिलता उससे!” उसने खाट की पाटी पर बैठते हुए कहा।

”देखो लल्लु! बहू तो खैर तुम्हारी मेहनती है और सब ठीक है, लेकिन बालकों को पूरा मन नहीं दे पाई हैं जितना खिलाती-पिलाती है, उतना ही उन्हें त्रास देती है। आंखों से ही दम खींच लेती है। बाध-भेड़िये की तरह छाती पर सवार रहती है। तुम तो सवेरे के निकले सांझ पड़े घर में घुसते हो तुम्हें क्या पता कि हम इसकी कितनी कड़ी निगाह सहते हैं और ममता होगी भी कहां से! कौन अपने हैं!” बुआजी ने अपना पूरा जहर उगलते हुए कहा।

जाने क्यों उनके कहने का ढंग उसे बहुत बुरा लगा यह समझौते वाली बात कहां हुई! उलटे पानी में आग लगाना हुआ वह चाय का गिलास वहीं जंगले पर रख कर बिना चाय-नाश्ता किये बाहर निकल गया नीला पहले तो दोनों की बात-चीत पर कान दिये बैठी रही जब आवाज आनी बंद हो गई जो उसने प्यालों में चाय डाली एक मिनिट दो मिनिट ये क्या! बच्चों के पापा आये कयों नहीं! अचानक कुछ याद कर वह रसोई में गयी और दुध को जाली में रखा, वरना बिल्ली गिरा गई या पी गई तो बुआजी के वाक्य फिर बेरहमी से चल पड़ेंगे लौटकर देखा, कुर्सी खाली पड़ी थी। कहां गये! बड़े लड़के से पूछा, ”पप्पू! तुम्हारे डैडी कहां गये!” वह स्लेट पर कुछ लिख रहा था नीची नजर किये ही दरवाजे की ओर उंगली से इशारा कर दिया वह काठ की तरह निश्चत हो गई मन हाहाकार से भर उठा यौं ही थके-हारे बिना कुछ खाये जो कहां चल दिये!

वह बुआजी के कमरे में आई उनकी चाय भी यों ही पड़ी थी उसने जैसे ही चाय पीने को कहा कि ज्वालामुखी फूट पड़ा, ”अरे शरम करो बबुनी! आई चाय पिलाने! सारे दिन हाड़तोड मेहनत करने वाले आदमी को तो भूखा निकाल दिया सड़कों पर, और हमें यहां खड़ी चलित्तर दिखा रही हो हाय! जाने विनोद कहां भटक रहा होगा हमने तो ऐसे रंग-ढंग न देख, न सुने आदमी कहां तक बरदाश्त करे लद गये अच्छे दिन लिछमी थी, वो तो गई मरद, बाल-बच्चे और घर सब बारहबाट हो गये कबूलपुर वाले भाई से पहले ही कहा था कि मत कर इसका ब्याह-सगाई यहां पढ़ी-लिखी सहरी बहू अपनी चामचिटटी चमकायेगी या इन्हें देखेंगी! बालक अनाथ होके माटी हो जायेंगे पर कौन सूने था मेरी बात! अब तो फोड़ो तकदीर उमर भर!”

दिल का गुबार निकाल कर वे झपाके से उठकर बरामदे में आकर कमरे की चौखट पर बैठ गई वह भी उनके पीछे आकर खड़ी हो गई माथा तप गया था यह अच्छी रही! सरे दिन कोल्हू के बैल की तरह पिसी और फिर इतना बेइज्जत होना पड़ता हैं सभी की अकल को यहां तो गंज लग गयी है अभी क्या है जिन्दगी की शुरुवात है कैसी चलेगी जाने रात-दिन होम कर डाला लेकिन इनकी भौंहें खिची ही रहती हैं।

बुआजी ने अपनी जबान में मिठास घोल कर पप्पू को आवाज दी, ”अरे बेटा! चलो तुम सब आ जाओ चाय-पानी लेा देखो तो अंाखे कैसी धंसी पड़ी हैं! क्या! नहीं खा-पी रहे हो तुम लोग! बोलती भी नहीं हैं नासपीटे नहीं खाना-पीना हो तो ला री छुटकी, इधर देदे मुझे अन्न देवता में डालने को हैं क्या मैं ही मुंह में डाल लूं तुम तो बर्बाद करने पर तुल हो कमाओ तो पीर जगे” वे बड़बड़ाती रहीं ओर खा-पीकर अपने कमरे में चादर-तानकर सो गई रह गई नीला, मूर्खों की तरह खड़ी हुई भरे बाजार में जैसे किसी ने चांटा मार दिया हो मन में आया कि दीवारों में सिर फोड़े, चीखे या कहीं भाग जाये क्या समझा है इन लोगों ने! सभी जानवर हैं या पत्थर!

बच्चों का अच्छा-बुरा सोचना, इन्हें सीधी बात बताना कोई जुल्म हैं क्या! हर समय छाती पर हथैड़े चलती रहती हैं ”मौसी हुई नं! सौतेली जो ठहरी! प्लेट भरकर खाली करती तो दर्द की मरोड़ पहचानती” कितना गंदा विश इन मासूम बच्चों के दिमाग में पूरती हैं वे भी भला चुप क्यों रहते हैं! फटकार कर कह नहीं सकते कि बुआ ऐसा मत कहो यह तो बच्चों से सगी मां से भी ज्यादा प्यार करती हैं तुम्हारी सेवा शारदा से भी अधिक करती हैं शारदा! पहले वाली बहूरानी बच्चों की अपनी मां उनके पिता की सुग्रहिणी! ओह दीदी! आप तो चलीग गई मुझे किस आफत में डाल गई! ओह! जाने किस पाप का दण्ड भुगतने के लिये इस चक्र में भगवान ने उसे दिया हैं।

वह जाने तक यों ही पत्थर की तरह बुत बनी सोचता रही आंसुओं की लड़िया अंाचल भिगोती रहीं देर बाद तंद्र टुटी आठ बजने वाले थे जूठे बर्तन उठाये काम करने को मन नहीं हो रहा था कमर और घुटनों का दम-सा निकला जा रहा था वह भी क्यों न मुंह बांध कर सेा जाये! लेकिन ये बच्चे! ठन बेचारों का क्या दोश भूखे ही सो गये तो उसके मन का दर्द कौन जानेगा! उल्टे ”सौतेली-राक्षसी” ही सुनने को मिलेगा।

भारी मन से खाना बनाया एक-एक बच्चे को प्यार-दुलार से खिलाया कमरे में लाकर सुलाने से पहले उन्हें अपनी बांहों के घेरे में लेकर प्यार से एक कहानी सुनाई छोटे गुड्डू ने उसकी गीली आंखंे देख लीं और अपनी नन्हीं-नन्हीं हथोलियों में उसका मुंह लेकर कहा, ”क्या हुआ नई मां! आप रेाती क्यों हैं!”

सुनकर उसके पेट में अटेरनी-सी चल पड़ी यह कमबख्त ”नई मां” का सम्बोधन इस जीवन में तो शायद ही पीछा छोड़े! उसने वैसी ही भरी-भरी आंखों से पप्पू की तरफ देखकर कहा, ”क्यों दियाकरते हो मौका सभी की जली-कटी सुनने का! तुम्हीं सबसे ज्यादा समझदार हो मैं जो भी कहती हूं, डांटती-फटकारती हूं, तो तुम लोंगों की भलाई के लिये ही तो! अगर तुम्हारी मर्जी पर छोड़ दूं तो कैसे अच्छे बच्चे बनोंगे! मेरी इच्छा हैं कि बड़े होकर खूब पढो अच्छे अफसर बनो अपने पापा को खूब आराम दो क्यों मेरा क्या है! खेलो गन्दे बच्चों के साथ मत जाओ स्कूल मत पढ़ों किताबें उटपटांग चीजें खाकर करो अपना नुकसान पड़ो बिमार सोचों, क्या होगा! फेल हो जाओगे अच्छे बच्चे तरक्की करके आगे निकल जायेंगे सभी यही कहेंगे कि देखो सगी मां होती तो बच्चों को बिगड़ने नहीं देती तुम लोग भी बड़े होकर यही सोचोगे कि हमारा ख्याल नहीं रखा अच्छा, बहुत रात हुई, चलो सो जाओ।”

तीनों में से ऐक भी सोया यों ही बैठे रहे।

”अरे क्या हुआ! क्यों नहीं सोते हेा!”

”पहले आप खाना खायेंगी, हंसेगी, तब हम सोयेंगे।”

”अच्छा ऐक शर्त रही आज से तुम लोग मुझे नई मां नहीं कहा करोगे मां कहकर बुलाया करोगे क्या कहा करोगे!”

”हम सभी ”मां” कहा करेंगे अब खाना खा लो मां” पप्पू ने भोलेपन से कहा।

”बस, अब मैं खुश हूं बेटे! तुम लेाग सो जाओ अभी तुम्हारे डैडी भी आये जाते हैं उनके आने पर ही तो खाऊंगी अच्छे बेटे लोग हैं मेरे लो परियों की एक कहानी और सुनो।”

थोड़ी देर बाद सब बच्चे सो गये उसका मन गद्गद् हो रहा थासारा विवाद धुल गया था अभी बच्चे हैं आगे चलकर सब समझेंगे जानलेंगे कि इस मां ने हमारे लिये क्या-क्या सहा है, किया है! उसके शरीर में उत्साह भर गया फिर भी किसी कोने में एक कांटा-सा चुभता रहा।

घड़ी में ग्यारह बजने जा रहे थे बच्चों के डैडी अभी नहीं आये थे।

पिछले वर्श भाई की शादी थी उसके पैर भारी थे पहले तो ये भेज ही नहीं रहे थे, लेकिन वह जिद करके चली गई थी वह नहीं चाहती थी कि जल्दी मां बन जाये घर में पहले ही तीन छोटे बच्चे थे गुड्डू तो बहुत ही छोटा था उसका बच्चा भी आ गया तो बड़ी दिक्कत हो जायेगी इनके पालने-पोसने में यही सब सोचकर उसने अपनी नीहखाली नसीबन दाई से सलाह ली थी वह बड़ी होशियार थी पहले तो बिदकी, लेकिन जब सारी बातें समझाई तो उसने आठ गोलियों दीं उस समय तो छुटकारा मिल गया, पर पूरे शरीर का और स्वास्थ्य का सत्यानाश कर डाला दो-तीन गोलियों में बात बन गई थी, लेकिन उसने सारी खा ली थीं पेट में तभी से बराबर दर्द बना रहता हैं पिछले हफ्ते जब डाक्टरनी बहन को दिखाया तो उन्होंने बताया कि अब वह जीवन भर मां नहीं बन सकेगी मन में खुशी और सन्तोश की लहर जगी कि चलो मां बनकर सौतिया डाह के जलील इलजाम से वह जीवन भर बची रहेगी।

द्ारा यों ही सूना पड़ा था घड़ी की सुइयां सरक रही थीं आंगन में कोई आहट नहीं जागी थी।

पांच वर्ष उसकी आंखों के आगे तैर उठे शादी का लाल जोड़ा पहन कर जब वह विदा हुई थी तब मां ने कहा था, ”बेटी, सबकी सेवा करना और उलटकर जवाब मत देना बुआसासा को मेरी जैसी मां ही समझना जैसा मिले, कबूल करना बच्चों को नेह-प्यार देना” मां की सीख को उसने पल्लू में बांध लिया था जब ट्रेन चलने में थोड़ा वक्त था तो बाऊजी भरे गले से बोले थे, ”बेटा नीलू, जा रही है अब बू! कुछ ज्यादा तेरे लिये नहीं कर सका बस तसल्ली यहीं है कि तुझे पढा-लिखा दिया खुद दुख पाकर तुझे अच्छी तरह रखा बेटा! मेरी मजबूरी समझ या अपनी तकदीर मान, कि मै चाहकर भी तुझे अच्छे-बड़े घर में नहीं दे सका माफ करना बेटी, कि तुझे एक ऐसे आदमी के साथ भेज रहा हूं, जिसके तीन बच्चे तेरी बाट देख रहे हैं करता भी क्या! जहा भी गया, बेटे वालों के इतने चौड़े मुंह मिले कि धन से मैं इन्हें पाट नहीं सका ले बेटी, सीटी दे दी हैं रेल ने देख बिटिया, मेरी गरीब इज्जतको शर्मिन्दा मत करना बुआ को असली मां का प्यार देना” धोती का छोर लपकर बाऊजी हिलक उठे थे उसका मन पागल-सा हो उठा था कुछ कहती कि रेल बेरहमी से उसे सबसे दूर खींच ले गई थी।

मां, बाऊजी ने जो भी कहा था, उसे वर्श से निभाती आ रही थी पूरे घर कर बोझ, बच्चों का लालन-पालन, बुआजी की सेवा, पति के हर संकेता का ध्यान सभी कुछ तो हंसकर कंधों पर उठा लिया न कोई शिकायत, न कोई अफसोस फिर यह क्या सजा है सगी मां की तरह इन बालकों का ध्यान रखा है तभी तो अच्छी बात पर प्यार करती है, तो गलत बात पर मारती भी हैं, चिल्लाती है अब यह सौतेली मां का कांटों भरा सेहरा उसके सिर पर है तो वह कया करें घर की देखा-देखी पास पडोस की ओर रिश्तेदार महिलाएं भला कुछ में क्यों पीछे रहेंगी!

तभी रसोई की दीवार पर एक लम्बी छाया उभरी उसने देखाए बच्चों के डैडी दोनेां किवाड़ों पर बांहें फेलाये खड़े थे एकदम उदास टूटे-से चेहरे का खून जैसे किसी ने बिलकुल लिया था आंखें जैसे किसी वेदना से छटपटा रही थी उन्हें ही उसका सारा आक्रोश पिघल गया ओह! जाने कितना अपने आपसे लड़कर, जूझकर और जाने कहां-कहां भटक कर आ रहे हैं!

वह उठी और बड़े स्नेह से हाथ पकड़ कर अपने पास ही शीतल-पाटी पर बैठा लिया और माथे पर झूलते, बिखरे बालों को दिया, जैसे यह भी कोई इसी घर का बच्चा हा। उसी सरल स्वर से बोली, ”चलो बहुत हुआ, अब खाना खाओ।”

विनोद क्षण भर जाना कैसी दृष्टि से देखता रहा। बड़े अनमने भाव से बोला, ”देखो, सिर बड़ा भारी हो रहा है। तुम खालो!”

पति की थकी-हारी आवाज ने उसके मन में फिर दर्द घोल दिया। बोली, ”यह कैसे हो सकता है! न तो चाय पी, न कुछ आराम ही किया। पहले ही दिन भर के थके-मांदे हो। थोड़ा-सा खाकर गर्म दूध ले लो, नींद अच्छी आ जायेगी।”

इस बार विनोद की बड़ी सीधी और पैनी नजर उसने भीतर तक उतरती महसूस की। लगा कि जैसे शिकारी अपने शिकार पर टूट पड़ने से पहले अपनी ताकत तोल रहा। वह उसी गम्भीरता से बोला, ”सच तो यह है नीलू, कि मैं तुम्हारे इस घर से और यहां की रेाज की हाय-हाय से बहुत परेशान हो गया हूं। बुआजी जाने क्या कहती हैं और तुम भी जाने क्या चाहती हो! बीच में जीवित पिस रहा हूं मैं! कुछ भी तो नहीं समझ पाता। ये बच्चे आफत बन गये हैं। तुम अलग परेशान रहती हो इन्हें लेकर। मुझे लगता है कि तुम्हें लाकर मैंने शायद कोई भूल कर दी हैं। तुम्हें भी मैं अधिक क्या कह सकता हूं। कहो तो इन तीनों को होस्टल में भर्ती करा दूं। क्या ठीक है, तुम्हीं बताओ! यों भीतर-ही-भीतर सुलगना भी भला क्या अर्थ रखता हैं! मेरी समझ में कुछ नहीं आता।”

नीला का मन आहत पक्षी-सा कराह उठा। क्या उत्तर दे वह! उसकी आंखों में इस गीलापन नहीं तैरा। एक चमक उभरी और दृढ़ता से बोली, देखो जी, आपको कुछ भी नहीं करना है। बस इतना ही जान लो कि मैं इनकी मां हूं। अच्छी तरह सुन लो कि मैं न मौसी हूं, न नई मां, केवल मां हूं। सगे-सम्बन्धी कितनी भी बाहरी ममता वारें, लेकिन मेरा रुप बाहरी दिखावे का नहीं हैं। इन बच्चों की भलाई आप और मैं ही सच्चे मन से चाह सकते हैं। मुझे और आपमें कोई बुनयादी फर्क नहीं है, सिवा इसके, कि आप इनके लिये बाहर मेहनत करते हैं और मैं घर में रहकर इन पर नजर रखती हूं। यदि आप पिता के नाते अपना कर्तव्य पालन करते हो, तो मैं भी मां के दायित्व के प्रति सजग हूं। अच्छा, आप ही बतायें कि आप इन्हें कुछ भी कहें, कितना भी मार-पीट लें, कुछ नहीं कहा जाता, और मैं इनके भविश्य को ध्यान में रखकर थोड़ा भी कह दूं तो सौ तरह के गलत अर्थ लगाये जाते हैं।”

”क्या कह रही आज तुम! कौन लगाता है गलत अर्थ!”

”आप सभी लगाते हैं। सिर्फ इसलिये, कि मैंने इन्हें पैदा नहीं किया हैं। आप लोगों के लिये पैदा करना ही सब कुछ है न! लेकिन मैं पूछती हूं कि जन्म देने वाली मां, जन्म देकर क्या इन्हें यों ही बेलगाम छोड़ देती और कुछ न कहती आप बताइये, क्या गलत कह रही हूं मैं। सब कुछ आप पर निर्भर करता हैं। यदि आप सख्त होकर कह दे कि ये जो भी कहती हें, बच्चों की भलाई के लिये कहती है, तो सच कहती हूं कि किसी की हिम्मत नहीं जो मेरे लिये बुरे विचार प्रकट करे। आज आप और बुआजी इसलिये नाराज हैं न, कि मैंने पप्पू को चांटा क्यों मारा! सुनो, वह आवारा बच्चों के साथ ताश और कंचे खेलता हैं। आज भी गली में गोलियां खेल रहा था। इन्हें योंे ही आवारा बनने दूं क्या! आंखों देखते बिगड़ने दूं बुआजी तो केवल प्यार का पक्ष जानती हैं, दूसरा नहीं। प्यार अलग है और बालक को जीवन की राह में ढ़़ग से चलाने में मदद देना अलग बात है। जाइये, कह दीजियेगा बुआजी को कि मैं बच्चों की देखभाल एक सगी मां के नाते ही करूंगी। जो उचित होगा, वही उनसे करने को कहा जायेगा। और… और ऐसा यह भी जान लो कि मैं जीवन भर मां नहीं बन सकती। ऐसा मैंने स्वयं अपनी मर्जी से, इन्ही बालकों की भलाई के लिये, किया है।” बोलते-बोलते वह हांफ उठी थी।

मन का पूरे दिन का भराब आंखे की राह झर उठा। विनोद अवाक होकर उसे देख जा रहा था। जाने कब से बुआजी भी वहां आकर खड़ी हो गई थी। उनके होंठ कांप रहे थे और उनका रोम-रोम जैसे आशिर्वाद बन गया था। क्षण भर में ही सारी घटनाएं साफ हो गई थी।

समाप्त

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