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डोर
डोर- 2

डोर- 2

कलायन पत्रिका


डोर
उर्मिला शिरीष

उन्होंने सोनू की ससुराल में फोन लगाया। नंबर राकेश का ही था।
“क्या बात है बेटा ?… क्यों!… क्यों अलग रह रही है। वहाँ ले जाकर आपने ऐसा क्यों कया ?”

“यह आप उसी सी पूछिए।” कहकर राकेश ने फोन रख दिया था।

उनको लगा आसमान का कोई टुकड़ा हरहराकर गिर पड़ा हो। अवसन्न सी बैठी रह गईं। हाथ-पाँव सुन्न हो गये। यह क्या सुन रही हैं। रूप-रंग, बोल-चाल, उच्चशिक्षा, किस बात में कम है सोनू! राकेश का व्यवहार यहाँ कुछ और था और वहाँ एकदम भिन्न! वहाँ ले जाकर छोड़ दिया मँझधार में? उनका मन फड़फड़ा उठा। सामने उड़ती चिड़ियों को देखकर उनका मन कराह उठा, काश मैं पहुँच जाऊँ। लेकिन वहाँ जाने का मतलब था पासपोर्ट, वीजा, पैसों की व्यवस्था!
इतना बड़ा धोखा! अपने फायदे के लिए शादी की थी? पलंग पर पाँव समेटे बैठीं वे जैसे सामने सोनू से बातें कर रही थीं – “तुम्हारी डोर तो हमसे बँधी है। जब तक हम जिंदा हैं तब तक तुम्हारा यहाँ आना-जाना लगा रहेगा।”

डोर तो है पर कहाँ तक छोड़ती! हाथों का खिलौना बन गया है सोनू का भाग्य! पलकें मुँदी तो हल्की सी झपकी लग गई। फ्राक पहने बारह साल की लड़की सामने छुपा-छुपी खेल रही है। सेब से लाल-लाल गाल। दो चोटियाँ ! आँखों में गहरी चमक। वह चमक विदाई के समय आँसुओं में बह गई थी? उनकी आँखों से कैसे चूक हो गई। क्यों नहीं देख पार्इं वह बेटी की आत्मा का दर्द! आत्म पर पड़ा दबाव बढ़ता जा रहा था और कानों में गूँज रहा था…
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
अस्सी नब्बे पूरे सौ
सौ में लगा धागा
चोर पकड़कर भागा!

सोनू मेरी बच्ची। वे फफककर रो पड़ीं। “चोर निकलकर भागा” सोनू का विश्वास चुराकर ही भागा था राकेश। उस सोनू का जो पापा की लाड़ली थी, जिसको पापा हाथों पर रखते थे। किसी काम में हाथ नहीं लगाने देते थे कि यही तो उम्र  होती है खेलने-खाने की। मस्त रहने की। इस छोटी-सी उम्र में कैसे ग्रस लिया बेटी का हँसता-खेलता जीवन! क्या कसूर था उसका!

“समधी जी से बात करके देखो।” … एक अंतिम आशा उन्हीं से बँधी थी।

“हम क्या कर सकते हैं? पति-पत्नी के बीच का मामला है।” वे पराजित सिपाही की तरह पीठ फेरकर बात करने लगे! दयनीय मुद्रा में। रत्ती भर भी ग्लानि या संताप का भाव नहीं था। झूठी रिरियाहट अलबत्ता थी। धृतराष्ट्र की मूढ़ता… पुत्र प्रेम का भाव। सोनू के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी। उसके भविष्य की कोई चिंता न थी… न जिम्मेदारी का कोई बोध।

“आप जानते हैं न वह कितनी सीधी-सादी है। अकेली कैसे रहेगी? कैसे जियेगी? नौकरी का ठिकाना नहीं। बच्चे की जिम्मेदारी अलग! आपसे एक हीअनुरोध है कि राकेश से कहें कि उसे वापस भिजवा दें।”

बात करने से क्या बनने वाला था? मन में बार-बार एक ही बात उठती कि सुलह हो जायेगी। पर गुजरते वक्त के साथ आश्वासन सूखे पत्ते की तरह झरते जा रहे थे और बातें सूखी टहनियों की तरह होती गर्इं। जितने परिचित थे उनसे संपर्क किया। खबर भिजवाई। सोनू ने चिट्ठी लिखने का आश्वासन दिया था पर उसने भी चिट्ठी नहीं लिखी थी। उसका संपर्क सूत्र अब भी राकेश ही था।

“मैं कोई बात आपसे छुपाना नहीं चाहता। हमारा तलाक होने वाला है। सोनू ने आपसे झूठ बोला। इसमें मेरा क्या दोष?” राकेश इतनी बड़ी बात इतने हल्के मुँह से बोल रहा था जैसे संबंध न हो, कच्चा धागा हो? तो सच्चाई यह थी। बात यहाँ तक पहुँच गई थी!

वे बेटों के सामने खड़ी थी – “उसे वापस बुलाने का कोई उपाय ढूँढो। उसको वापस लाना जरूरी है।”

“अगर वह नहीं लौटना चाहती है तो आप क्यों जोर दे रही हैं? यह फैसला उसी पर छोड़ दो। उसे अपना जीवन जीने दो। आप कब तक हथेली लगाओगी?” बेटे की बात सुनकर उनका मन व्यथा से भर गया।

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