“ममा, मैं सोनू बोल रही हूँ। सुन रही हो न! मैं यहाँ आ गई हूँ फ्रीमोन्ट में। मकान बदल लिया है। हाँ, हाँ सब ठीक है। चिंता मत करना। बेटू ठीक है। हाँ – राकेश भी। ममा, आप और पापा ठीक तो हैं बहुत याद आ रही थी आप लोगों की पर….”
कहते-कहते सोनू का गला भर आया – जैसे हल्की सी बदली गड़गड़ाई हो। सिसकियाँ रोक लीं वरना माँ को लगेगा कि परदेश में रहकर बेटी परेशान है। माँ का माथा ठनका… जरूर कोई बात होगी वरना उसकी आवाज में हमेशा की तरह हवा के झोंके सा उछाह क्यों नहीं है!
“सोनू ठीक तो हो? कुछ छुपा तो नहीं रही हो ?”
“नही मम्मा, नहीं। अच्छा पत्र लिखूँगी उसमें मेरा नया पता होगा। अपना ख्याल रखना… बाय… ममा बाय।”
माँ से बाय नहीं कहा गया। आँखों स बहती अश्रुधारा! फोन पर रुक-रुककर आती सोनू की आवाज उनकी छाती में घायल चिड़िया की तरह फुदक रही थी। सोनू कोई बात छुपा रही थी? वे भी तो कितनी बातें छुपा जाती हैं बेटी से… कि पापा दो बार एडमिट हो चुके हैं और बड़ा भाई एक बार भी देखने नहीं आया था… कि वे ऑफिस के इसी एक कमरे में रहने लगी हैं। इतनी दूर से सोनू तो आने से रही फिर व्यर्थ चिंता में डालने से क्या फायदा? वे बाहर निकल आर्इं। आसमान डूबती संध्या के रंग में रंगा था। पखेरु लौट रहे थे। सोनू ने मकान क्यों बदला! राकेश ने बात क्यों नहीं की? राकेश के बारे में पूछने पर वह चुप क्यों साध गई थी! उनके मन में तरह-तरह की आशंकाएँ काले धुएँ की तरह फैलने लगीं।
मन किया फोन लगाकर पूछ लें। यद्यपि यहाँ से फोन लगाना महँगा पड़ता है पर – इस समय बात पैसे की नहीं थी सोनू की स्थिति की थी। डायरी में लिखा नंबर पुराना था। नये घर का फोन नंबर उसने दिया नहीं था। पता नहीं कितनी देर तक वे डायरी के पन्ने पलटती रहीं। उन्होंने तो कभी नही चाहा था कि सोनू अपना देश छोड़कर जाये। बस इतनी सी कामना थी कि सीधा-सच्चा खाता-पीता परिवार मिल जाये जहाँ सोनू सुख से रहे। मगर बेटों की जिद के सामने उनकी एक न चली थी। लड़का इंजीनियर था। परिवार यहीं था। लड़का बहन की शादी में आया था। यह रिश्ता आनन-फानन में तय हो गया था। सगाई और शादी एक हफ्ते में। सारा जीपीएफ निकाल लिया था। मकान गिरवी रखकर बैंक से लोन लिया था। हरेक माँग, बिना संदेह के पूर्ण की थी। बाद में सोनू ने बताया था कि उसको चढ़ाया गया जेवर सास ने यह कहकर अपने पास रख लिया था कि विदेश में कौन सोना पहनता है? आखिर बात क्या है? वे बैचेन हो उठीं। कई दिनों से उनकी भी तबियत ठीक नहीं थी। लीवर में सूजन दर्द। कहीं भी जाने में असमर्थ पा रही थी।
“मम्मा, मैने कभी नहीं चाहा था कि मैं बाहर जाऊँ या विदेश में रहने वाले लड़के से शादी करूँ। आप लोगों का सारा पैसा खर्च हो गया? बुढ़ापे में कौन आपका साथ देगा? राकेश कहता है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी बोलनी नहीं आती है। मैंने कहा भी कि तुम्हें बता दिया गया था कि मैं अंग्रेजी विषय लेकर पढ़ी हूँ, कान्वेंट में नहीं। कहता है – तुम्हारी शक्ल देखकर मुझे प्यार करने की इच्छा नहीं होती। क्यों, ममा क्यों ! क्यों मेरा अपमान करवाया है आप लोगों ने! पापा का पद और पैसा देखकर झूम गये होंगे। सोच रहे थे खूब पैसा होगा पर… और आप लोगों को भी विदेशी दामाद का आकर्षण था मम्मा!” उन्हें लगा सोनू सामने खड़ी सवाल कर रही है। उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। फिर धीरे-धीरे सब अपनी दुनिया में व्यस्त होते गये थे। सोनू भी वहाँ सबसे अलग हो गई थी – छठे-छमाही चिट्ठी लिखती रहती। उसी से पता चलता था कि भारतीय परिवार यहाँ-वहाँ बिखरे थे। अगर परिवार थे भी तो अत्यधिक व्यस्त। राकेश वीक एंड में छुट्टी मनाने दोस्तों के साथ चला जाता और सोनू अकेली बच्चे के साथ परेशान होती रहती। घर का काम! बच्चे का काम! ऊपर से उसकी स्लिप डिस्क की पीड़ा। उसे लगता वह वर्षों से इसी तरह से रहती आ रही है। अनगिनत ताने। बेहिसाब उपेक्षा। अपने लोगों से दूर। असहाय… जैसे आकाश में टंगी कोई बदली हो। राकेश ने उसे अपने जीवन से निकाल ही दिया था और छोटी-छोटी बातों के अलावा उसके दर्द को लेकर भी वह झुँझलाता रहता था। तेज भागती जिंदगी में अंगों में ठहरा दर्द भी उसे स्वीकार नहीं था। वह क्या करती, जब तक सहन होता काम करती अन्यथा बिस्तर पर पड़ी वह एक गिलास पानी के लिए तरस जाती थी। बाद में सोनू को लगने लगा था कि यह तो बाहरी कारण था। आंतरिक कारण तो कोई और ही था। फिर भी वह जिम जाकर व्यायाम करती। स्वीमिंग करती। योग करती। दर्द निवारक इंजैक्शन लगवाती। पर दर्द था कि कुण्डली मारकर बैठा था और राकेश को उसे वापस भेजने का बहाना मिल गया था। उसे अपनी स्वतंत्रता प्यारी थी।