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किस मुँह से !

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कलायन पत्रिका


किस मुँह से !

के. पी. सक्सेना ‘दूसरे’

गाँव से बड़े भइया का संदेश आया कि बाबूजी का स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है, हम लोग चाहें तो समय रहते उनसे आखिरी बार मिल लें।

बाबू जी दो वर्ष पहले पक्षाघात के शिकार हुए और तब से बिस्तर पर ही थे। उनकी सेवा शुश्रूसा बड़े भइया और भाभी गाँव की खेतीबाड़ी देखने के साथ-साथ जैसे-तैसे निभा रहे थे। छोटा भाई हालाँकि रहता गाँव में ही था लेकिन पढ़े-लिखे बेरोजगारों की ऐसी मर्दुमशुमारी में आ गया था जिनका घर से वास्ता सिर्फ खाने और सोने का ही रह जाता है। भइया पिछली बार बता रहे थे कि अब तो वह रोज आता भी नहीं और जब आता है तो सीधे बाबूजी के पास बैठकर उनके हाथ-पैर दबाता है और वहीं सो जाता है। अब तो सुना है कि अपने जैसों की एक टोली बनाकर कभी-कभी रंगदारी भी वसूलने लगा है।

मैं गाँव से 500 किमी दूर अपने परिवार के साथ, शहर में नौकरी कर रहा था और धीरे-धीरे गाँव से वास्ता घटता जा रहा था। बड़े भइया ने एक दो बार मुझे इस बात का आभास अवश्य कराया था कि कमाऊ पूत होने के नाते कुछ दिन मैं बाबू जी को अपने पास शहर में रख कर अच्छे से इलाज कराऊँ, किंतु मैं ही हर बार किसी न किसी बहाने से बात टाल देता।

लेकिन इस बार के समाचार से तो पत्नी भी हिल गई। उसने मुझे रात की ही गाड़ी से जाने का सुझाव दिया साथ ही चलते वक्त 5000 रुपये देते हुए कहा, “बड़े भइया का हाथ तंग होगा। खर्च के लिए दे देना और यदि आ सकने की स्थिति में हों तो उन्हें लेते आना, कुछ दिन हम लोग भी देखभाल कर सकेंगे।”

मैंने पत्नी से कुछ नहीं कहा। औरतों का स्वभाव, जरा सी बात हुई नहीं कि लगीं जाने क्या-क्या सोचने। अरे भौजी ने भइया को भर दिया होगा कि हमीं लोग दिन-रात खटते रहते हैं। लल्ला को खबर करो, कुछ उनका भी फर्ज बनता है कि नहीं। ये भौजी को ही दरअसल हमारा सुख से रहना कभी नहीं सुहाया। खैर, जाना तो पड़ेगा ही। कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो जिंदगी भर कहने को हो जाएगा कि खबर देने पर भी देखने नहीं आए।

गाँव पहुँचा तो लगा कि वास्तव में हालत नाजु़क है। जब मेरे पैर छूने पर भी उन्होंने कोई हरकत नहीं की तो भौजी ने उनके कान के पास जाकर जोर से कहा, “मझले आए हैं।”

भौजी के दो बार पूरी ताकत से बोलने के फलस्वरूप उनकी आँखों की कोर से दो बूँद आँसू लुढ़कते दिखे। बस इसीसे ऐसा लगा कि सूचना उन्होंने पा ली।

दोपहर को खेत से बड़े भइया आ गए, छोटा भी समाचार पाकर आ गया था। खा पीकर जब सब बैठे तो भइया ने बात निकाली, “देख मझले, हमसे जेतना होइ सकत रहा हम करेन अब हियाँ गाँव माँ डाक्टरौ ढंग के नहीं आँय। उहै दवाई अदलत-बदलत रहत हैं। सरपंच कहत रहें कि तहसील म जाँयके कुछ जाँच और होइ जाय तो शायद दवाई बदलै, अउर फैदा होय। लेकिन येमा चार-पांच हजार लग जई उआ हमरे पास अबे नहीं आय। रुपिया दो तो हम कलई बाबूजी को ले जाके सब जाँच करा लें और प्रायवेट डाक्टर को दिखाके अच्छी दवा के लिए बात करें।”

मैं जानता था कि इससे कुछ फायदा होने से रहा। अन्य रोग, सब बिस्तर में पड़े रहने के कारण बढ़े होंगे, जो इस उम्र में अब जाने से रहे। ये लोग मुझे देखकर कुछ पैसे हथियाने के चक्कर में हैं। मैं फालतू पैसा बरबाद करने के पक्ष में नहीं था अत: बोला, “मुझे तो खबर शाम को मिली और मैंने तुरंत ट्रेन पकड़ ली। रुपयों का बंदोबस्त करने का समय ही नहीं था इसलिए अभी तो कुछ नहीं हो पायेगा। हाँ, मैं वहाँ पहुँच कर कुछ व्यवस्था जरूर करूँगा।”

मेरी बात सुनकर उन तीनों के चेहरे बुझ गए। छोटा, आता हूँ कहकर बाहर निकल गया, भौजी उपले पाथने चली गई और भइया वहीं तखत में ऊँघने लगे। मैं कपड़े बदल कर भइया के बगल में लेट गया।

शाम को घर का वातावरण बड़ा दम-घोटूँ लगा। बाबूजी के कमरे में ऐसी गंध समा गई थी कि ज्यादा देर बैठा नहीं जा रहा था, अत: टहलने निकल पड़ा। गाँव में तो लगभग सभी परिचित ही होते हैं। सबका रटा-रटाया वाक्य कि, “अब आ गए हो तो कुछ दिन थोड़ा बाप की सेवा कर लो”, सुनकर चिढ़ होने लगी। सी.एल. तो कई दिन की शेष थी लेकिन लगा कि इस वातावरण में अधिक नहीं रह पाऊँगा।

घर लौटा तो भौजी ने खाना लगा दिया पर बोलीं कुछ नहीं। मैंने भइया को खाने के लिए बुलाया तो वे बोले, “तुम खा लो, मेरा पेट कुछ गड़बड़ है।” छोटू तो मुझे देखते ही बाबू जी की कोठरी में घुस गया था।

 

समाप्त  

                                                                                                                                                   आगे पढ़े

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