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स्ूचना का अधिकार

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कलायन पत्रिका

स्ूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पर एक आलोचनात्मक दृष्टि


महेश चंद्र द्विवेदी

देश की जनतांत्रिक व्यवस्था में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम-2005’ जुड़ जाने से संपूर्ण देश के मीडिया, अघिवक्तागण, न्यायविद्, बुद्धिजीवी, एवं मानवाधिकारवादियोंें में एक ज्वार सा आ गया है – और क्यों न आये, जब इस अधिनियम के अनुसार देश के निरीहतम नागरिक को समस्त विभागों में नामित ‘सेंट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर’ से केवल दस रुपये का ड्राफ्ट लगाकर यह प्रश्न करने व तीस दिन में उत्तर प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो गया है कि किसी प्रकरण में क्या, किसके द्वारा एवं किस विधि से कार्यवाही की गई है, और समय से सही उत्तर न देने पर संबंधित सेंट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर पर पच्चीस हज़ार रुपये तक का जुर्माना ठुकवाने का अधिकार भी प्राप्त हो गया है?

‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ के अंतर्गत विभागों को यह भी आवश्यक हो गया हैं कि वे अपने रिकाड्र्स को चार माह में कम्प्यूटरीकृत करके इस प्रकार रख लें कि सूचना खोजने व देने में विलंब न हो। शासन एवं प्रशासन में व्याप्त विलंब, स्वच्छंदता, एवं भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता के हाथ में यह कानून एक अमोघ अस्त्र सा प्रतीत होता है और प्रारंभिक अनुभव के अनुसार यह कतिपय प्रकरणों को प्रशासन द्वारा द्रुतगति से निपटवाने में कारगर भी साबित हुआ है।
इतना स्वीकार करने के पश्चात् मैं यह कहना चाहूँगा कि मेरे विचार में स्वतंत्रता के उपरांत भारतीयों को इतने अघिक अधिकार या तो उपलब्ध करा दिए गए हैं अथवा अपनी जुगाड़ से उन्होंने स्वयं ओढ़ लिए हैं कि जनसाधारण अधिकारग्रस्त एवं अघिकारत्रस्त हो रहा है। यहाँ छात्रों को पढ़ने के बजाय राजनीति करने, ठेकेदारी करने और जबरिया नकल को जन्मसिद्ध अधिकार मानने का अधिकार है एवं राजनैतिक नेताओं को उन्हें यह सब करने हेतु खुलेआम भड़काने एवं प्रश्रय देने का अधिकार है, माननीय सांसदों को घूस लेकर संसद में अपना मत देने का अधिकार है, राजनैतिक दलों को गुंडों व माफिया को चुनाव का टिकट देने का अघिकार है, पुलिस को अपने समक्ष अपराधी द्वारा की गई अपराध-संस्वीकृति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का कानूनी अधिकार नहीं है परंतु व्यवहारिक रूप में अपराधी को तथाकथित एन्काउंटर में ‘एलीमिनेट’ कर देने का अधिकार उपलब्ध है, वकीलों को अपराधियों को बचाने हेतु झूठी-सच्ची गवाही प्रस्तुत करने एवं हर संभव तिकड़म अपनाने का अघिकार है, कुख्यात अपराधियों को मंत्री बनने का अधिकार है, आई. ए. एस. अधिकारियों को महाभ्रष्ट घोषित होने पर मुख्य सचिव बन जाने का अधिकार है तो कर्मचारियों को हाथ चिकना होने पर ही फाइल को आगे बढ़ाने का अधिकार है।
माननीय न्यायाधीशों को अपनी सही अथवा गलत किसी प्रकार की आलोचना न किए जाने का अधिकार है। मीडिया को तथ्यों को येन केन प्रकारेण ‘सेंसेशनल’ बना देने का अधिकार है। धरातलीय स्थिति यह है कि अपराधियों एवं दोषी व्यक्तियों को उपलब्ध कानूनी एवं व्यवहारिक अधिकारी के आधिक्य के कारण हमारी दण्ड-प्रणाली लगभग निष्प्रभावी हो गई है और शासकीय व्यवस्था पर अपराधियों का वर्चस्व स्थापित हो गया है जिससे जनसाधारण का नियम-कानून पर से विश्वास उठ गया है। अत: यह आशंका निराधार नहीं है कि ‘सूचना का अधिकार’ भी केवल प्रारंभिक दिनों में जनसाधारण के हाथ में शासन/प्रशासन की ज्यादतियों को जानने हेतु एक सशक्त माध्यम रहेगा, परंतु शीघ्र ही यह भी सबलों के हाथ की कठपुतली बन जाएगा।
भविष्य मेंें ‘सूचना का अधिकार’ के कानून का जनसाधारण को कितना लाभ मिल सकेगा यह बड़े सोच-विचार का विषय है, और उससे कहीं अधिक सोच का विषय इसके क्रियान्वन में आने वाली कठिनाइयाँ एवं इसके दुरुपयोग की संभावनाएँ हैं। प्रथमत: यह मानकर चलना कि हमारे अधिकारी व कर्मचारी सचिवालय एवं प्रशासकीय विभागों में कूड़े की भाँति पड़े हुए सूचना के अपार भंडार को इकट्ठा कर तरतीब से रख सकेंगे, उनकी कार्यक्षमता की सीमा का हास्यास्पद रूप से उच्च-आकलन करना होगा; और यह मान लेना कि वे ऐसा करना चाहेंगे सरासर पागलपन होगा। वहीं दूसरी ओर यह मान लेना कि भ्रष्ट कोटि के नेतागण, अधिकारी एवं वकील इस अधिकार का भ्रष्टों को बचाने एवं सत्यनिष्ठ की नींद हराम करने हेतु सफलतापूर्वक उपयोग नहीं कर पायेंगे, भ्रष्टों की चतुरता पर गंभीर परंतु निराधार आक्षेप होगा। अधिकार के दुरुपयोग के उदाहरणस्वरूप पाठकों को याद दिलाना चाहूँगा कि कुछ दिन पूर्व अहमदाबाद के एक मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रपति के नाम वारंट ज़ारी कर दिया था। संभवत: पाठकों को यह भी ज्ञात होगा कि हरिद्वार, मथुरा जैसे तीर्थस्थलों में अपने शत्रुओं को तंग करने के उद्देश्य से उनके विरुद्ध किसी दूर की कोर्ट का वारंट ज़ारी करवा देना सर्वविदित प्रक्रिया है – और इस ‘नेक’ कार्य हेतु महंतों द्वारा सुदूर प्रांतों में रहने वाले चेलों की सेवाएँ प्राप्त की जातीं हैं। अनेक प्रशासनिक निर्णयों में नियम कानून के अतिरिक्त अधिकारियों को अपने विवेक का भी उपयोग करना पड़ता है – बस अपेक्षा यह की जाती है कि विवेक का उपयोग जनहित में किया जाएगा। इस विवेक के उपयोग पर उँगली उठाना किसी के लिए भी बहुत आसान है और हर अनुभवी व्यक्ति जानता है कि लूट और घूस के पैसे से बने धन्नासेठों के पास सत्यनिष्ठा से लिए गए निर्णयों पर प्रश्न कराने का समय व साधन प्रचुरता से उपलब्ध रहेंगे जबकि सत्यनिष्ठ व्यक्तियों को अपने बचाव हेतु न तो पर्याप्त समय मिलेगा और न साधन जुटेंगे।
‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ जनसाधारण को सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है एवं समय से सूचना न देने पर विभाग के नामित सेंट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर पर 25000 रुपये तक का आर्थिक दण्ड लगवाने का अधिकार देता है। यह सेंट्रल पब्लिक इन्फ़ार्मेशन आफिसर प्राय: विभागाध्यक्ष नहीं होता है। अत: प्राय: सेंट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर को उस कर्मचारी, जो उसके समक्ष सूचना प्रस्तुत करने में विलंब करे, को स्वयं दण्डित करने का अधिकार नहीं होता है। ऐसी स्थिति में प्राय: ऐसा होगा कि कोई भी पहुँच वाला कर्मचारी यदि सेंट्रल पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर से अप्रसन्न है तो जानबूझकर सूचना प्रस्तुत करने में बहानेबाज़ी करेगा और पिं्रसिपल इन्फार्मेशन आफिसर पर इन्फार्मेशन कमिश्नर द्वारा आर्थिक दण्ड ठुकवा देगा। बहानेबाज़ी कर सूचना देरी से देने वाला कर्मचारी यदि थोड़ा भी दमदार है तो साफ बच जाएगा क्योंकि शासकीय कर्मचारियों को दण्डित करने की प्रक्रिया में आरोपी को इतने अधिक अधिकार उपलब्ध हैं एवं भ्रष्टों को बचाने हेतु इतने अधिक नेता, वकील, एवं अधिकारी तत्पर रहते है कि उन्हें दण्डित करने का प्रयत्न वही अधिकारी करता है जो अपने सिर पर क़फन बाँध कर नौकरी कर रहा हो।*
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि केवल उन कार्यालयों में रिकार्ड ठीक से रखा जाना संभव हो सकता है जहाँ मंत्री, अधिकारी एवं कर्मचारी आदेश लिखित देते व लेते हों और तभी किसी प्रकरण की सही सूचना उपलब्ध हो सकती है। धरातलीय स्थिति यह है कि अधिकतर मुख्यमंत्री, मंत्री एवं अनेक उच्चाधिकारी भी प्राय: मौखिक आदेश देते हैं और अनुचित आदेशों को तो मौखिक ही देते हैं। फिर वे किसी अधिकारी द्वारा अनुचित आदेशों का मौखिक अथवा लिखित विरोध करने पर विरोध करने वाले अधिकारी से शत्रुता मानने लगते हैं। अत: अधिकारीगण या तो मंत्रीगण से मिलीभगत के कारण अथवा उनके भय के कारण प्राय: चुपचाप उन आदेशों का पत्रावली पर झूठा-सच्चा औचित्य बनाकर उनका पालन कर देते हैं। कतिपय होशियार अधिकारी भविष्य में अपनी बचत के उद्देश्य से पत्रावली पर चुपचाप यह नोटिंग भी कर देते हैं कि मंत्री महोदय की अपेक्षानुसार यह कार्य किया जा रहा है। चूँकि इस नोटिंग पर मंत्री के हस्ताक्षर नहीं होते हैं अत: न तो इसके तथ्यात्मक होने की गारंटी होती है और न किसी जाँच के दौरान संबंधित मंत्री को इसे स्वीकार करने की बाध्यता होती है। ऐसे मंे प्राप्त की जाने वाली सूचना की उपयोगिता भी क्या होगी? फिर यदि आप किसी मंत्री के दुष्कर्मों के विरुद्ध सूचना एकत्र कर भी लें परंतु उस सूचना को जानने के पश्चात् जनता उसे और अधिक वोट देना चाहे तो आप उसका क्या बिगाड़ लेंगे?; इसी प्रकार यदि आप किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के भ्रष्टाचार के विषय में सूचना एकत्र कर लें और उसे जानकर शासन उसे और अधिक कमाऊ पोÏस्टग देने को कटिबद्ध रहे तो आप उसका क्या बिगाड़ लेंगे? ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ जनता को सूचना प्राप्त करने भर का अधिकार देता है- दोषी व्यक्ति को दण्ड दिलाने का अधिकार नहीं देता है।
भारत में लगभग 105 करोड़ लोग रहते हैं ओर इनमें से यदि एक प्रतिशत लोग एक माह में औसतन एक प्रश्न पूछें तो प्रतिमाह एक करोड़ से अधिक प्रश्न बनेंगे जिनका उत्तर तैयार करने में प्रशासन की इतनी व्यस्तता हो जाएगी कि अन्य प्रशासकीय कार्य हेतु आवश्यक समय बचा पाना अत्यंत कठिन हो जाएगा। ऐसे में उत्तरों में इतनी देरियाँ तथा त्रुटियाँ होंगीं कि सेंट्रल पब्लिक इन्फ़ार्मेशन आफिसर तो अपनी पत्नी के ज़ेवर बेचकर भी उस पर लगने वाला जुर्माना नहीं भर पायेगा।

अत: ‘हर सूचना दस रुपये में बिकती है बोलो जी क्या क्या खरीदोगे?’ बड़ा लुभावना गीत होते हुए भी काफी डरावना सा लगता है। मेरी तुच्छबुद्धि में आज इस देश को ‘नागरिकों के कर्तव्य- अधिनियम’ की कहीं अधिक आवश्यकता है।

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