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हास्य व्यंग्य
सदी का संकट – मोटापा

सदी का संकट – मोटापा

कलायन पत्रिका

सदी का संकट – मोटापा


व्यंग्य : प्रेमपाल शर्मा

इस जमाने के संकट भी निराले हैं। निराले के साथ-साथ भयानक भी। इसीलिये टेलीवीजन हो या अखबार, पत्नी हो या पड़ोसन हर कोई त्राहिमाम, त्राहिमाम चिल्ला रहा है।

‘यह संकट का समय है। यह संकट की सदी है।’ यह सुनते सुनते एक सदी ही पूरी हो गयी। कौन जाने अगली सदी की शुरुवात ये फिर उसी धुन से करें। दरअसल इनके लिये संकट है ही नहीं इसलिये खूब जोर-जोर से चिल्ला सकते हैं। जो वाकई करोड़ों ठठरियाँ संकट में है, वे गले-गले तक इतने संकट में डूबी हैं कि चिल्ला भी नहीं सकतीं।

अब मैं अपना संकट या कहो महासंकट बयान करता हंू।

पत्नी को किसी ने भरमा दिया कि वे मोटी हो गयी हैं। कोई भी हो सकता है भरमाने वाला आशिक, नेट-इन्टरनेट से लेकर टीवी सैट तक।

‘सुनो जी मेरा वजन बढ़ रहा है।’

‘ये तो अच्छी बात है। यानि कि स्वास्थ ठीक हो रहा है। अच्छी सेहत के लक्षण हैं।’ मैं और कया कहता। मैंने बिना अखबार से मुँह हटाये जवाब दिया।

‘अच्छा? ये अच्छी बात है?’ उन्होंने झपटकर अखबार का चूरमा बना दिया।
उनकी आवाज वाकई गम्भीर थी।

अब मुझे संकट का अहसास हुआ। ‘अरे किसने क्या कहा आपको?’

‘मुझे पता है। मेरा वजन बढ़ रहा हैं।’ जैसे कोई संत बताता है कि हमें पता है कि कलयुग आ गया है।

मैं संकट में डूब गया कि आखिर किसने अपनी पारो के कान भरे हैं। अपने को गदराई-गदराई महिलाएें भाती हैं। उनकी गाली तक गोल-गोल लगती है, और गोल-मोल लगते हैं गाल कचौड़ी से। पड़ोसन हमें क्यों भाती है, इसीलिये तो! खंपचसी महिलाओं की मीठी बातें भी घास-सी चुभती हैं। ऐसा न हो कि यह वाइरस पत्नी से होकर पड़ोसिन तक पहुंच जाये। इसे तुरंत यही खत्म करना हेागा। मैंने निश्चय किया।

‘तुम कही पगला तो नहीं गयींं? तुम कोई मोटी हो?’

‘मुझे पता है या तुम्हें ? हर बात में अपनी चलाते हो।’

इससे आगे कोई क्या बोले।

‘मैं हैल्थ क्लब की सदस्य बनने की सेाच रही हूं। और तुम कुछ बोलोगे नहीं।’
हमने गुस्से को काबू किया और प्यार से समझाने का रास्ता पकड़ा। ‘सुबह मेरे साथ घूमने चला करो। सब ठीक हो जायेगा।’

‘तुम्हारे साथ। और घूमने ? लड़ने के लिये!’

‘लड़ भी सकती हो। वह भी वजन घटाने का अचूक नुस्खा है। शरीर की चर्बी के साथ-साथ दिमाग की चर्बी भी कम हो जायेगी। डाक्टरों का कहना है लड़ने से, गाली देने से फालतू कैलोरी बाहर निकल जाती है।’

‘ये तुम्हारी मैनजमैंट की क्लास नहीं है जो कुछ भी बोल दो।’

अपन को सांप सूंघ गया। डर भी गया कि आखिर इन्हें कैसे पता चला कि मैनेजमेंट की क्लास में कुछ भी बोला जा सकता है।

‘देखेा तुम मेरी कोई बात गंभीरता से नहीं लेते। मिसेज कुमार भी मेाटी हो गयी थी पर उन्होंने तो तुरंत कंट्रोल कर लिया।’

‘मिसेज कुमार! उन्हें मोटी किसने कह दिया? हे राम। वो भी कोई मोटी हैं।’

‘अच्छा वो मोटी नहीं हैं। तुम्हें तो सिर्फ मैं मोटी नजर आती हंू। ऐसी पेट पर खाल लटक आयी थी उनके। और तो और उनके बच्चे तक कहने लगे थे ‘मम्मी। तुम्हें क्या हो गया है!’
मेरी बोलती बंद। बच्चे जो अभी टीनेज में भी नहीं पहूँचे हैं, वे माँ का माप ले रहें हैं।

‘मिस्टर कुमार तुम्हारी तरह नहीं हैं जो हर काम में अड़गें लगायें। तुमको पता है, उन्हेांने भी क्लब ज्वाइन किया हुआ है। और अब से नहीं, आठ महीने से। स्मार्ट वैसे ही नहीं बन जाते।’ उनकी आखों मे सी. बी. आई. सी चमक थी।

‘लेकिन तुम घर पर ही कुछ क्यों नहीं करतीं ?’ मैं हकला गया, ‘जैसे कुछ व्यायाम, कुछ काम —- झाडू, बुहारी, बच्चों की मालिश—-‘

‘अच्छा। मेरे बाप ने तुम्हारे घर की झाडू बुहारी के लिये मेरी शादी की थी?’

‘तुम समझती नहीं हो। मैं तो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये कह रहा हंू। झाडू-पेाछा लगाने में एड़ियों पर चलना, झुकना व उछलना पड़ता है। पूरे शरीर की एक्सरसाइज हो जाती है। यहाँ तक कि कपड़े भी धोओ —- हमारे नहीं सिर्फ अपने।’

‘मुझे नहीं सुननी तुम्हारी ये बकवास। झाडू लगाये मेरा ठेंगा। मैं बाई नहीं हूँ जो कपड़े धेाऊँगी तुम्हारे और तुम्हारी औलादों के।’ वे सुर्ख होती जा रही थी।

‘तुम्हारी मर्जी। शारदा बाई को देखो। कैसी स्मार्ट बनी हुई है। झाडू-पोछे के जरिये ही न। कौन से स्मार्ट क्लब जाती है वो?’

‘मुझे पता है तुम्हारी सारी हरकतें। शारदा बाई भी तुम्हें स्मार्ट लगती है और पी ़ए भी।’ वे नौ-नौ आँसू रोने लगीं। फिर झटके से आँसू पोंछ कर बोलीं ”मैंने मिसेज कुमार को कह भी दिया। कल से साथ साथ जायेंगे स्मार्ट क्लब।”

‘चलो तुम प्रसन्न रहो। उनका साथ भी ठीक रहा।’ मजबूरी का नाम सहमति की ही- ही- ही।

‘बच्चे निकल जायेंगे सुबह आठ तक, तुम नौ बजे। हम दस बजे निकलेंगे और दो बजे वापस। फिर आराम करके शाम को पांच बजे जायेंगे। शुरु में दो शिफ्टों मे बुलाते हैं। सर का कहना है कि एक्सरसाइज के बाद और पहले शरीर को आराम भी पूरा मिलना चाहिये, वरना नुकसान हो सकता है।’

‘हो सकता है नहीं, डार्लिंग। हो गया।’ अपन ने मन ही मन कहा और सर के नाम से दांत पीसे, स्साला।

लैाटते लैाटते उन्हें रात हो जाती है आजकल।

‘क्या बताऊँ, एक-एक चीज इतनी मेहनत से करातें हैं सर। दो सौ सीढ़ियाँ तीन मिनट में चढ़नी होती हैं — ऐसे भारी-भारी बाट उठाकर चलवाते हैं —- फिर मालिश, कमर —- फेशियल, आई ब्राो—-

‘वो तो लग ही रहा हैं तुम्हारी भृकुटियों से – मेरा मतलब आई ब्राो से।’

पत्नी की भृकुटियाँ वास्तव में तन गयी।

‘मिसेज गुप्ता बड़ी क्यूट लगती हैं तुम्हें। मिसेज बनर्जी को उƒा जाने कहाँ ठहर गयी है? तनेजा के चेहरे पर अभी भी कैसा ग्लो है!’ उन्होंने बिराबिराकर कहा। ‘ऐसे ही हो जाते हैं स्मार्ट। स्मार्ट बनने के लिये कुछ करना थोड़े ही पड़ता है।’

घर में सन्नाटा छा गया।

हम पिटे से अपने बिस्तर पर आ लेटे।

माँ का चेहरा याद आया जो अपने बेटे को मोटा देखने की हसरत लिये दुनिया से चली गयी।

यार लोग, मीडिया, नये जमाने की स्मार्ट लहर जो न कराये थोड़ा है। शोर मचा हुआ है, ‘मेरा वजन, मेरी खाल, मेरे बाल यह नहीं खाना है, इसमें ज्यादा कैलोरी होती है। इससे कोलेस्ट्रोल बढ़ जाता है।’

महानगर में मिठाइयाँ लोग दुश्मनी निकालने के लिये सामने रखते हैं। खाइये न। प्यार का इजहार भी और खाईएगा तो चुपके से बदला भी। वजन करने मशीनें घर घर पहुंच गयी हैं और पायदान की जगह रख दी गयी हैं। घर घुसते ही वजन, निकलने के पहले वजन।

घर में आजकल नये से नये उपकरण आ रहे हैं। फीते, मीटर, साईकिल, डाई, दवाई, टॉनिक, शैम्पू, बारह तरह की क्रीम, चौबीस शेड़ों की लिपस्टिकें। जैसे-जैसे वे पतली होती जा रही हैं श्रृंगार-मेज मोटी होती जा रही है। इतनी मोटी की अब तो सारा घर ही श्रृंगार-मेज बन गया है।

पत्नी हैल्थ क्लब गयी हुई हैं। स्मार्ट क्लब के नियमित सदस्यों के लिये विशेष पखवाड़ा है ये। इसलिये और भी देर से वापसी होती है। निढाल, मानेा पत्थर तोड़कर लौटी हैं।

मैंने तुरंत पानी दिया और पंखा सीधे पांच पर।

‘कुछ अन्तर लगता है आपको?’ उन्होंने तस्सली चाही।

कैसे बताऊँ कि उनका चेहरा किसी भूत से कम नहीं लगता आजकल। बदन की क्या गत बना डाली है। मानो अभी-अभी अस्पताल से आयी हों या भर्ती की तैयारी में हों।

पता नहीं किस शैतान ने इस खेलती खाती मस्त सदी को ‘स्मार्टनैस’ का शाप दे डाला।

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