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डाँ रामनारायण सिंह ‘मध’ु

भीषण गर्मी के बाद बरसात बड़ी सुखद लगती है। भोजन में जो स्थान चटनी और आचार का है, मौसम में वही स्थान बरसात का है। सारे खेत बंजर से पड़े थे और बच्चे ‘काले मेघा पानी दे’ की गुहार करते हुए धूल में लौट रहे थे। मेघों ने सुन ली, दौड़ पड़े ठट्ठ के ठट्ठ पानी घर्षण और वर्षण करते हुए। झड़ी लग गयी। अब आलम यह है कि ऊपर जल, नीचे जल, जल ही जल। नदियां भदभदा गई, नाले उमड़ पडे, बाढ़ आ गई। जो जल पीने को तरसते थे, जल से खेलने लगे। जो सूखे से त्रस्त थे, वे बरसात से त्रस्त हो गये।
मिनिस्टर साहब ने बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र का हवाई सर्वेक्षण किया, फिर भाषण दिया। भाषण देते-देते रोने लगे। दोनेां आँखों से गंगा यमुना की जलधारा प्रवाहित होने लगी। बाढ़ पीड़ित उनका अपार दु:ख देख अपना दु:ख भूल गए, कहने लगे ”सचमुच दीनबंधु हैं।”
लोगों ने समझाया ”आप क्येां रोते हैं, रोने के लिए हम लोग पर्याप्त हैं।” मगर आँसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ”मिनिस्टर हो तो ऐसा, जो जनता के दु:ख को ओढ़ ले।” उनकी जय जयकार की। रोते रोते उन्होंने घोषणा की ”आपके दु:ख से सरकार दु:खी है। सरकार नहीं चाहती कि बाढ़ आये, फिर भी निर्लज बाढ़ आ ही जाती है। बाढ़ न आने देने के लिए सरकार कृतसंकल्प है। कल ही मंत्रिमंडल की बैठक हेागी, जिसमें बाढ़ रोकने के उपायों पर विचार किया जाएगा। अगले वर्ष से बाढ़ नहीं आयेगी, अगर आयेगी तो हम उसे बीच में ही रोक देंगे। इस बाढ़ में जो मर गए, अनका दु:ख नहीं जो बचे हैं, उनका ही दु:ख है। जय हिन्द।” और वे देखते देखते हेलीकाप्टर पर बैठ फुर्र से उड़ गये। नीचे जल लहरा रहा था, ऊपर हेलीकाप्टर। सचमुच बड़ा अदभुद दृश्य था।
बाढ़ नदी नालों में ही नहीं आती, कवियोंं एवं प्रेमियों के दिलों में भी आती है, शायद इसीलिए बरसात का मौसम कवियेां एवं प्रेमियों का मौसम कहा जाता है। उधर आकाश में काली घटा उमड़ी, इधर कवियों के मन में भाव उमड़े और प्रेमी प्रेम करने के लिए छटपटा उठे। मेरे एक कवि मित्र हैं, जो बरसात में ही कविता लिखते है, और दूसरे मौसम में चुप हो जाते हैं। वैसे ही जैसे बरसात में मेंढक बहुत टर्राते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।
”आषाढ़स्य प्रथम दिवसे” आषाढ के पहले दिन कालिदास के यक्ष को अपनी प्रिया की याद आई थी और वह रो पड़ा था। मुझे अपने उस बरसाती कवि मित्र की याद आती है और में भी रो पड़ता हूँं कि अब वह बरसाती कविताएँ सुना-सुनाकर मुझे मार डालेगा। उसे देखकर नदी में छलांग लगाने की इच्छा होती है, परन्तु उमड़ते पानी को देख सहम जाता हूँ। वे बरसात के मौसम में बिना नागा किए शाम को चार बजे आते हैं और रात ग्यारह बजे बड़ी मुश्किल से अपने घर जाते हैं। इस बीच बादल, बिजली, जुगनू, में बोर करते और पूछते भी हैं – ”कैसी लगी?” ”अच्छी लगी” कहना पड़ता है।
वह खुश होकर और जोर से गाने लगता है ”आकाश में छा गये बादल, पर तुम नहीं आई, मन हुआ जा रहा पागल, पर तुम नहीं आई।”
मैं मन मसोस कर रह जाता हँू। इस पागल से मुझे कौन बचाएगा !
बर्षा और मच्छरों में गहरी आत्मीयता है। मुझे बादल मच्छरों के स्तूप के समान लगते हैं, और डरता रहता हँू कि मलेरिया के कीटाणु अब गिरे, तब गिरे। एक रात घर के बाहर खाट निकालकर सो रहा था। सेा क्या रहा था, सुहाना सपना देख रहा था- अप्सराओं से घिरे इन्द्र के सिंहासन पर विराजमान हूँ। देवगण हाथ जोड़कर खड़े हैं और तिलोत्तमा मुझसे कह रही हैं – ”महाराज, आज रात में आपकी सेवा में रहूँगी।” मैं हर्षोन्मत हो उसकी और हाथ बढ़ाना ही चाहता हूँ कि टप-टप बुंदें गिरने लगीं। नाश हो गया, तिलोत्तमा वहाँं कहाँ थी, बिस्तर अवश्य गीला हो गया था।
बर्षा ने जोर मारा। गिरते-पड़ते खाट उठाकर अंदर भागा। कमरे में मच्छरों की विकट वाहिनी मेरे ऊपर टूट पड़ी। कहॉें जाऊँ बाहर मेघों की झड़ी भीतर मच्छरों की लड़ी। इस विपत्ति से छुटकारे का उपाय सोच ही रहा था कि खपरैलों के बीच से बूंदों ने प्रवेश कर तीक्ष्ण वाणों से मुझे भेदना शुरु कर दिया सारी रात भाग दौड़ में बीती। जिधर जाता, मच्छर और बुंदें पीछा करतीं।
मौसम साफ देखकर टहलने निकला। घूमते-घूमते कम्पनी गार्डन आ पहुँचा। मौसम खुशगवार था। एक बेंच पर बैठ कर सोचने लगा- ”अरस्तू और सुकरात ने भी इस अंदाज से कभी कुछ नहीं सोचा होगा। मेरे जीवन की उपयोगिता क्या है। लोगों को देखो, वे मक्खी मार रहे हैं़ या प्रेम कर रहे हैं। ‘मधुर’, तुम कुछ नहीं कर सकते, दुनिया तुम्हारे बस की नहीं। तब तुम जी क्यों रहे हो? बहुत सोचा, पर जीने का कोई कारण समझ में नहीं आया। इतने में बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी किसी ने सच कहा है – ”बरसाती बादलों का कोई भरोसा नहीं।” जल्दी-जल्दी से चलने लगा कि बगीचे के घने कुंज से फुसफुसाहट की आवाज आई कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की प्रशंसा कर रहा था। तुम्हारी रेशमी जुल्फें काली घटा के समान हैं तो मंाग बिजली के समान। रजनीगंधा की सुरभि सी तुम्हारी साँस, बेला की कलियों के समान तुम्हारे उरोज हैं। और तुम्हारा मुख बादलों के बीच छिपे चन्द्रमा के समान है।
प्रेमी कविता में बहक रहा था, परन्तु प्रेमिका यथार्थवादी थी। उसने कहा- ”तुम्हारी ऊल-फजूल बातें मेरी समझ में नही आतीं। बेकार में देर हो रही है और बारिश भी होने वाली है।”
उस दिन शाम से जो बारिश शुरु हुई, रात आठ बजे भी नहीं रुकी। मैं खिड़की से जल प्लावन का दृश्य देख रहा था। चतुर्दिक पानी ही पानी। वर्षा का पहरा लगा था, चाहकर भी बाहर नहीं निकल पा रहा था। उर्दू कविता की वह पंक्ति याद आ रही थी, जिसमें नायिका ने बादल से निवेदन करते हुए कहा था- ”हे बादल, बरस पर थोड़ा थमकर बरस, जिससे मेरा प्रेमी आ जाए और उसके आने के उपरांत इतना जमकर बरस कि वह जा न पाये।”
सुनता हँू बरसात में बहुत – से पुल टूट जाते है सैकडों लोग काल कवलित हो जाते है। इस पर कुछ लोग अफसोस करते हैं और कुछ लोग आक्रोश। अब उन्हें कौन समझाए, पुल टूटने से जनसंख्या कम होती है। ठेकेदार, ओवरसीयर, इंजीनियर काम पाते है, आवागमन रुकता है, जिससे प्रेमियों की भरी बरसात में विरह-ताप से जलना नहीं पड़ता।
मानना ही पड़ता है, भीगने, मच्छरों के आक्रमण और कवि मित्रों के प्रलाप सहने आदि असुविधाओं के बावजूद, प्रेमी जनों के लिए बरसात बड़ी सुखद है। बड़ी सुहावनी है। आओ मिलकर गाएं – ”बरसात में हमसे मिलो तुम सजन, तुमसे मिलेंं हम।”