मैंने एक फिल्म देखी जिसमें नायक शादी से पहले ही नायिका से शरीर की मांग करता है। इस पर नायिका अपनी सभ्यता-संस्कृति को लेकर एक लम्बा-चौड़ा भाषण देती है। नायक प्रभावित होता है। उसका ह्मदय परिवर्तन देख नायिका और भी ज्यादा प्रभावित होती है। आखिरकार दोनेां एक-दूसरे से इतने प्रभावित होते हैं कि अगले गाने में कपड़े उतार कर एक दूजे से लिपट-लिपट कर नाचने लगते हैं। सभ्यता और संस्कृति के इस रुप से दर्शक तो इतना प्रभावित हो जाते हैं कि ऐसी फिल्में बार-बार देखने की प्रतिज्ञा करते हैं।
मैने एक कवि-सम्मेलन भी देखा। इसकी शुरुआत सरस्वती-वंदना से हुई। जैसे फिल्म की शुरुआत नामावली से होती है। तत्पश्चात चुटकलों सी सार्थकता लिए दो-तीन हास्य कवि आए व दर्शकों को अपनी सार्मथ्यानुसार हंसा कर चल दिए। अब एक वीर रस के कवि आए। इनकी वेशभूषा व भाव-भंगिमाएं बिल्कुल एक वीर कवि जैसी थीं। बस शरीर पर जिरह-बख्तर व हाथ में तलवार की कमी थी। मंच पर पांव पटक-पटक कर सिर का जोर-जोर से चारों तरफ झुलाते हुए इन्होंने जो कविता सुनाई उसमें ये अश्लील गीतों को लेकर एक फिल्म-निर्माता से काफी नाराज दिखते थे। इनके पांव पटकने और सिर झटकने से जो वातावरण पैदा हुआ उसके परिणाम स्वरुप बम्बई में बैठा फिल्म-निर्माता डर गया और उसने दो मिनट के लिए अपनी अगली फिल्म की शूटिंग रोक दी।
फिर एक गद्यकार आए और श्रोताओं को हंसाने लगे। श्रोता चूंकि घर से ही हंसने के मूड में चले थे इसलिए हंसने लगे। समीक्षकों ने अर्थ निकाला कि श्रोताओं को हंसाना ही एक-सूत्रीय उद्देश्य होता है। चाहे गद्य में हंसाना पड़े चाहे पद्य में। चाहे उछल कर हंसाना पड़े, चाहे मटक कर। चाहे कविता से खींचा-तानी करनी पड़े, चाहे अंग-संचालन की मनमानी। जब समीक्षक यह समझ गए तब गद्यकार ने अपनी हास्य रचना में मंच पर बैठी एक खूबसूरत कवयित्री का नाम बड़े गुदगुदाने वाले ढंग से इस्तेमाल किया। वीर रस के कवि समेत सारे गद्गद् हो उठे। सम्मेलन पूरी तरह जम चुका था। बराबर में लगे सर्कस मालिक ने अपनी खोपड़ी पर थप्पड़ मारा और कर्मचारियों को तम्बू-डेरा उखाड़ने निर्देश दिए।
इधर हास्य पर हास्य लुटाया जा रहा था कि बतौर ‘चेन्ज’ एक देशप्रेमी कवि का आगमन हुआ। कविगण साथी कवि का स्वभाव जानते थे अत: उन्होंने इनके कविता क्षेत्र के चारों तरफ दो-दो फुट जगह खाली कर दी। कवि महोदय ने झटके से ‘स्टार्ट’ लिया और लगे वे दनादन शब्दों के गोले दागने, सीमा पर मौजूद सिपाही की तरह। वीर रस के वीर कवि ने इनके गले में माला डाल कर इनका उत्साह बढ़ाया। यह देख कर ममता कुलकर्णी का उत्साह अपने आप बढ़ गया। उसने अपनी गरदन हाथ में माला लिए खड़े वीर रस के वीर कवि के आगे झुका दी। एकाएक दोनेां अपनी-अपनी सभ्यता और संस्कृति के साथ कहीं अन्र्तध्यान हो गए। दूर कहीं गोविन्दा और करिष्मा कपूर एक बार फिर खटिया-खटिया खेलने लगे। इधर देषप्रेमी कवि की कविताओं में वाक्योंं के इतने ज्यादा अर्थ निकल रहे थे कि कादर खान ने संवाद लेखन के काम से इस्तीफा देने का मन बना लिया।
अब उन कवि की बारी थी जिनकी वजह से दर्शकों को सारी रात रोका गया था। यह एक हास्य कवि थे जो विभिन्न आवाजों व अंदाजों में फिल्मी पैरोडियां गाते थे। अत: यहाँ भी गाई। श्रोताओं व दर्शकों को बहुत पसंद भी आई। यह दृश्य देख कर अमेरिका में स्टेज शेा कर रहे भारत के प्रसिध्द माइम कलाकार जॉनी लीवर की आँखें फटी रह गयीं कि मिमिक्री भी अब साहित्य की एक सम्मानित विधा है। उन्हें अपने ऊपर बहुत शर्म आई कि सालों से स्टेज शो करने के बावजूद अभी तक स्कूली किताबों में उनकी जीवनी क्यों नहीं शामिल की गई।
इस प्रकार कवि-सम्मेलन पूरी तरह सफल रहा। बस कल के अखबारेंा में इस सफलता की खबर आना बाकी थी।