सभ्य समाज में आदर झटकने के जो कुछेक तरीके मुझे जँचे हैं उनमें से एक है किसी का दामाद हो जाना। जिस घर के आप दामाद हो गए, अगर थोड़ी देर के लिए उस घर को हम राष्ट्र मान लें तो समझिए कि उस घर में आपकी हैसियत राष्ट्रपति जितनी हो जाती है। भारत के राष्ट्रपति जैसी नहीं कि जिसके पास ताम-झाम तो होता है पर काम-धाम नहीं होता। आप तो कम से कम अगला दामाद आ जाने तक, अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह होते हैं जिसे कि भरे-पूरे अधिकार भी प्राप्त होते हैं।
आप सिर्फ दामाद ही नहीं होते, आप जीजा जी भी होते हैं। भारत में जीजा जी होना यानी कि हवा के घोड़े पर सवारी गाँठना। यानी कि जलवों के हलवों पर जीभ लपोरते रहना। यानी कि भले ही पूरी दुनिया में आपको कोई न पूछे मगर एक घर सदा ऐसा होता है जो लाल कालीन बिछाए आपके स्वागत को सूखता रहता है। वहाँ घुसते ही आप महान हो जाते हैं। क्रिकेट की भाषा में कहें तो पिद्दी से पिद्दी बल्लेबाज के लिए भी दुनिया में कम से कम एक पिच तो ऐसी होती है जहाँ खेलना शुरू करते ही उसके जीवन की पारी जम जाती है।
जीजा जी होने की सुविधापूर्ण स्थिति को तो बड़े-बड़े कवियों ने भी कल्पनाओं तक के कद्दू-कस में कस कर खूब लच्छे बनाए भी हैं और बेचे भी हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति के अनुसार नारी की मर्यादा की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देने वाले कई बुजुर्ग कवियों ने सालियों की सुंदरता, उनके स्वभावों की चपलता, उनके साथ अपने सभी प्रकार के संबंधों की स्वायत्तता, स्वतंत्रता, उनकी विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों में कर्मठता, अपने जीजाओं के प्रति उनकी निष्ठा आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए अत्यंत सुंदर व सार्थक साहित्य का सृजन किया है।
यानी कि साली न हुई आपकी गली के पिछवाड़े की दीवार हो गई। जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में आपने ही लोगों के सामने लिखा है ‘यहाँ पोस्टर लगाना मना है’। फिर अकेले में आप ही हैं कि लगाए जा रहे हैं। तिस पर साहित्य में सार्वजनिक रूप से अपने दुष्ट-कर्म का महिमा-मण्डन भी कर रहे हैं। इधर लोग भी आपके लिखने और आपके लगाने पर समान भाव से तालियाँ बजा रहे हैं।
लगता है कि आपके भीतर के लिखने वाले को भी पता है कि कितना भी लिख लो मगर लगाने वाला लगाने से बाज नहीं आएगा। और अपने व्यवहार के इश्तहार से इस लिखे को मेट कर ही दम लेगा। और इधर लगाने वाला भी जानता है कि यह लिखने वाला फिर-फिर लिखता रहेगा और मैं बार-बार लगाता रहूँगा। यही इस दीवार की नियति है।
वहाँ पर चार दीवारें एक खास स्थिति में इकट्ठी खड़ी होने के कारण एक घर जैसा बन गया है जहाँ कि मैं रहता हूँ। एक दिन, जब सोचने को और कुछ न बचा तो मैंने सोचा कि एक महिला कर्मचारी रख लूँ जो खाना बना दे, कपड़े धोए, बरतन माँजे व अन्य छोटे-मोटे काम कर दे। पर जब मित्रमल से बात हुई तो कहने लगे कि क्यों दो-चार सौ रुपये महीने खर्चते हो। इससे तो अच्छा है शादी कर लो। पत्नी के पद पर नियुक्त महिला मुफ्त में सारा काम तो करेगी ही साथ में दहेज लाएगी सो अलग। ऊपर से ससुरालियों से रोजाना मिलने वाली भेंटें, नकदी, आदर, सम्मान, जलपान वगैरह … …. …।
बात मेरी समझ में आई और मैं तैयार हुआ। पत्नी पद की उम्मीदवार से बातचीत चली तो मैंने बताया कि कैसे मित्रमल के सुझाव पर मैं इस नेक ख्याल पर अमल के लिए तैयार हुआ। इतना सुनना था कि वे हत्थे से उखड़ गर्इं। कहने लगीं कि आप पत्नी और नौकरानी में कोई फर्क नहीं मानते। मेरे भी पसीने छूटने लगे, कि तभी मेरे दिमाग में एक पुराने विचार का नवीनीकरण हुआ और स्थिति सँभल गई। मैंने उन्हें समझाया कि मशहूर अँग्रेज विद्वान जॉर्ज बर्नाड शा के विचार भी पत्नियों के बारे में ऐसे ही थे। इतना सुनना था कि उनका ह्मदय परिवर्तन हो गया और वे बड़े आदर भाव से मुझे निहारने लगीं।
यही वह पल था जब मेरे दिल में यह ख्याल आया कि आदर हथियाने का यह उपाय भी कोई बुरा नहीं कि अपने लूले-लँगड़े विचारों को भी महापुरुषों के उद्धरणों की बैसाखियों के सहारे पार करा दिया जाए।
वैसे इन दोनों के अलावा भी अन्य कई तरकीबों से मैंने आदर बटोरा है। अगर साथ ले जा सका तो इसे साथ ले जाऊँगा नहीं तो वसीयत में अपने आदरणीय संबंधियों, मित्रों को बराबर-बराबर बाँट जाऊँगा।
आपको इस लेख में कोई बात अटपटी या आपत्तिजनक न लगे इसके लिए बता दूँ कि यह लेख कई बड़े लेखकों के साहित्य और महापुरुषों की जीवनियों में से काट-छाँट कर बड़ी मेहनत व लगन से लिखा है।
क्या अब भी आप इस लेख को व मुझे आदर नहीं देंगे?