संसार के झंझावातों से प्रताड़ित बाहरी द्वन्द्वों और जीविकोपार्जन निमित्त संघर्षों से आलोड़ित; मोह-माया के मिथ्या प्रपंच से विमोहित; सप्तधातुमय मांस-पिण्ड की इच्छाओं और अन्त: प्रेरणाओं से संत्रस्त; उच्चतर जीवन और योग की आशा-आकांक्षाओं से आन्दोलित; अनेक आसक्तियों से विमदिर्त मनुष्य परम आत्मीय शांति के लिए;आह्लाद के लिए; मानसिक संतुष्टि के लिए; बौद्धिक संतुष्टि के लिए; वैचारिक समता के लिए; आध्यात्मिक पुष्टि के लिए और स्वस्वरूप बोधन के लिए भटकता है; आकाशवाची शब्दों में आत्मालाप-एकालाप करता है क्योंकि उसे कहीं से भी रास्ता नहीं सूझता; कहीं से भी आशा-प्रकाश की किरण नहीं दिखाई देती; कहीं से भी जिज्ञासाओं का शमन नहीं होता; कहीं से भी वैयक्तिक, चैत्तिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं मिलता; तो मरुस्थल में जल की आशा से भटक रहे हिरण की भाँति, माँ को तलाशते हुए गुम बच्चे की भाँति वह उस दिव्य चेतना सम्पन्न उदारमना अखिल ब्रह्माण्ड व्यापक सद्गुरु को तलाशता है चूँकि वह जानता है कि सद्गुरु के अन्त:करण मंे करण में करुणा का अथाह सागर लहराता है, प्रेम की दिव्य आनन्ददायिनी पुण्य-प्रकाशिनी गंगा सद्गुरु के हृत्तल में निवसित है; अहैतुकि आशीर्वाद के अनेक कल्पवृक्ष मनुष्य का कल्याण करने के लिए उनके वरद्पाणि से उद्भूत होते हैं, वहाँ राजनीति का कल्मषता नहीं है बल्कि आत्मीयता की गोदावरी है; वहाँ स्वार्थान्धता का द्वेष नहीं है बल्कि परदु:खकातरता का प्रकाश है, वहाँ दोषदर्शन का कालकूट विष नहीं अमृत दायिनी अन्त:सांेतस्विनी है; कुटिलता का सर्पदंश नहीं बल्कि अन्तरंगता के कमल की कोमल सुगन्ध है, प्रदर्शन का प्रचण्ड पाखण्ड नहीं बल्कि आत्मदान का प्रभुमय संकल्प है, तो सभी प्रकार से संतप्त और संत्रस्त प्राणी को गुरु शरण में वात्सल्य स्नेह, आत्मीयता, करुणा, ज्ञान, विमल प्रकाश, सहानुभूति और कोमलता की शीतलता प्राप्त होती है, चूँकि वह जान चुका है जगत चर्चा, लोक निन्दा, आत्मप्रशंसा की प्रवंचना, अविवेक और घमण्ड का अन्धकार, द्वेष, अपवित्रता, असत्याचरण अशुचि का संग विहंग वैसी शांति और सुख नहीं दे पाते जो परमशांति गुरु वचनों में, गुरु संगति में, गुरु कृपा और सान्निध्य मंे, गुरुपदेश, गुरु स्पर्श और गुरु संदर्शन में उपलब्ध होती है।
एकमात्र गुरु ही परमानन्द के परमश्रोेत परमेश्वर के साक्षात्कार को संभव करते है। जैसे प्राणवायु के अभाव में जीवन संभव नहीं है उसी प्रकार गुरु बिना ज्ञान संभव नहीं है, अन्तरशक्ति का विकास संभव नहीं है, अंधकार का नाश संभव नहीं है, भवरोग का विनाश संभव नहीं है, अविद्या जनित अहंकार का विसर्जन संभव नहीं है। अत: गुरु मित्र से, पुत्र से, बन्धु से, शास्त्र से और पत्नी से भी अधिक आवश्यक है, अपना है।
परमेश्वर को अनुग्राहिका शक्ति का निवास गुरु में है। इसीलिए गुरु के भोग और योग प्राप्त होता है, बोध प्राप्त होता है, भक्ति फलवती होती है, प्रेम पूर्णत्व को प्राप्त करता है, कर्म मंे निष्कामता आती है, जीवन को सार्थकता मिलती है और व्यक्ति को परम स्वातंत्र्य।
संभवत: इसीलिए वेद कहता है ‘उदुत्तमं मुमुग्धि नो विपाशं मध्यमं चृत अवधामनि जीवसे’। ऋग्वेद का ऋषि प्रार्थना करता है कि शिर के, उदर के, पैरों के पाश को काट दो ताकि सारा जीवन मुक्त हो जाए, ताकि सारा जीवन बन्धनहीन परमसत्ता से संयुक्त हो जाए।
तो आईए! परमसत्ता से संयुक्त होने के लिए अपने परमपूज्य परमसंत सद्गुरु से प्रार्थना करें ताकि मुक्त आकाश में निर्द्वन्द्व उड़ते हुए पक्षी की उड़ान का आनन्द, अस्तित्व के अखण्ड बोध के साथ अनुभव कर सकें। मुक्ति कभी भी पलायनवादिता नहीं होती निसर्ग का आनन्द होती है। यहीं जीवन है और यही जीवन यात्रा की सार्थकता है।