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हिन्दी नाटक और रगमंच

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कलायन पत्रिका

हिन्दी नाटक और रगमंच


स्वातंत्र्योेत्तर हिन्दी नाटक और रंगमंच – लोकधर्मी प्रयोग

नाटक को पाँचवाँ वेद माना गया है। भरत मुनि के “नाट शास्त्र” के आरंभ में एक कथा दी गई है। एक समय जब भरत मुनि शांत भाव से बैठे हुए थे, आत्रेय आदि मुनियोंं ने उनसे जाकर प्रश्न किया कि भगवन्! आपने जो वेद सम्मित ‘नाट वेद’ ग्रंथित किया है, वह कैसे उत्पन्न हुआ और किसके लिए बनाया गया? उसके अंग, प्रमाण और प्रयोग किस प्रकार होते हैं, यह बताने की कृपा करें।

भरत मुनि ने बताया कि वैवस्वत मनु के समय त्रेता युग आरंभ हुआ। काम और लोभवश लोग ग्राम्य-धर्म की ओर प्रवृत्त हो गए तथा ईष्र्या और क्रोध से मूढ़ हो कर अनेक प्रकार के सुखों-दु:खों से ग्रस्त हो गए। लोकपालों द्वारा प्रतिष्ठित जम्बूदीप जब देवों, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों और नागों से समाक्रान्त हो गया, तब इन्द्र आदि देवताओं ने ब्राहृा से जाकर कहा- ”हे पितामह! हम ऐसा कोई ‘क्रीडनीयक’ या ‘खेल’ चाहते हैं जो दृश्य भी हो और श्रव्य भी हो। जो वेद व्यवहार है, वह शूद्र जाति को सिखाया नहीं जा सकता, अतएव आप सब वर्णो के योग्य किसी पाँचवें वेद की सृष्टि कीजिए।”

ब्राहृा ने एवमस्तु कहकर सब देवों को विदा किया। उन्होंने समाधिस्थ होकर चारों वेदों का स्मरण किया। और संकल्प किया कि मैं धर्म, अर्थ और यश का साधन, उपदेशयुक्त, शास्त्र-ज्ञान-समन्वित, भावी जनता को समस्त कर्मों का अनुदर्शन कराने वाला, समस्त शास्त्रार्थों से युक्त, सब शिल्पों का प्रदर्शक, इतिहासयुक्त नाट नामक वेद बनाऊँगा।

उन्होंने ऋग्वेद से पाठ अंश लिया, सामवेद से गीत का अंश, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रसों का संग्रह किया। नाट वेद का निर्माण करके ब्राहृा ने प्रचार के लिए उसे देवताओं को दिया। परन्तु इन्द्र ने उनसे निवेदन किया कि देवता लोग इस नाट कर्म के ग्रहण, धारण, ज्ञान और प्रयोग में असमर्थ हैं। इस काम को वेदों के रहस्य जानने वाले संशित-व्रत मुनियों को देना चाहिए।

ब्राहृा ने इसके बाद भरत मुनि को बुलाकर आज्ञा दी कि तुम अपने सौ पुत्रों के साथ इस नाट वेद के प्रयोक्ता बनो। पितामह की आज्ञा पाकर भरत मुनि ने अपने सौ पुत्रों को इस “नाट वेद” का उपदेश दिया। इस प्रकार यह “नाट वेद” पृथ्वी तल पर आया। 1

यह कथा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। पहली बात यह कि वेदों से भिन्न पाँचवाँ वेद होते हुए भी “नाट वेद” के मुख्य अंश चारों वेदों से लिये गये हैं। दूसरी बात यह कि मूल तत्व वेदों से गृहीत होने के बाद भी यह स्वतंत्र वेद है, और अपनी प्रमाणिकता के लिए किसी दूसरे का मुखापेक्षी नहीं है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वेद अन्य वेदों की तरह केवल ऊँची जातियों के लिए ही नहीं है, बल्कि सार्ववर्णिक है। चौथी बात यह कि वेदों के बहुत बाद अर्थात् त्रेता युग में इस शास्त्र का निर्माण हुआ।

उपर्युक्त विवेचन से एक तथ्य उभर कर आता है कि “नाट वेद” की रचना सामान्य जन के लिए की गयी। यह “वेद” ज्ञानियों, पंडितों और देवोपम जातियों की अपेक्षा लोक के ज्यादा निकट है। “नाट शास्त्र” नाट धर्मी रूढि़यों का विशाल ग्रंथ है। दीर्घकाल से प्रचलित अनेक प्रकार की रूढि़याँ इसमें संग्रहित हुई हैं। इसीलिए “नाट शास्त्र” का जो लक्ष्यीभूत श्रोता है, उसे लोक और शास्त्र का बहुत अच्छा ज्ञाता होना चाहिए।

“नाट शास्त्र” के पन्द्रहवें अध्याय में दो रूढि़यों की चर्चा है – एक नाट धर्मी दूसरी लोक धर्मी। (15-69)
लोकधर्मी, लोक का शुद्ध और स्वाभाविक अनुकरण है। यद्यपि “नाट शास्त्र” नाटधर्मी रूढि़यों का विशाल संग्रह-ग्रन्थ है, तथापि वह मानता है कि नाटक की वास्तविक प्रेरणा-भूमि और वास्तविक कसौटी भी लोक चित्त ही है। भरत मुनि ने इस तथ्य पर बड़ा जोर दिया। लोक में न जाने कितनी प्रकार की प्रकृतियाँ हैं। नाटक चाहे वेद या आध्यात्म से उत्पन्न हो, तो भी वह तभी सिद्ध होता है, जब वह लोक सिद्ध हो; क्योंकि नाट लोक स्वभाव से उत्पन्न होता है। इसलिए नाट प्रयोग में लोक ही सबसे बड़ा प्रमाण है –

वेदाध्यात्मोपपन्नं तु शब्दच्छन्द: समन्वितम्।
लोकसिद्धंं भवेत् सिद्धं नाटं लोकस्वभावजम्।
तस्मात् नाट प्रयोगे तु प्रमाणं लोक इष्यते। (26-113)

उन्होंने यहाँ तक कहा है कि जो शास्त्र, जो धर्म, जो शिल्प और जो क्रियाएँ लोक धर्म प्रवृत्त हैं, वे ही नाट कही जाती हैं-

यानि शास्त्राणि ये धर्मा यानि शिल्पानि या: क्रिया।
लोकधर्मप्रवृत्तानि तानि नाटं प्रकीर्तितम्।

स्पष्ट है कि “नाट शास्त्र” से ही लोक तत्व का समावेश किया गया है। लोक-प्रवृति नाटक की सफलता की मुख्य कसौटी मानी गयी है।

नाटक और रंगमंच के पारस्परिक एवं सर्वसापेक्ष सम्बन्ध स्पष्ट हैं। नाटक और रंगमंच अन्योन्याश्रित हैं। नाटक अंग है और रंगमंच उसका अंगी है। छविनाथ पाण्डे का मत है कि ‘नाटक और रंगमंच का परस्पर सम्बन्ध केवल इसी बात पर ही आश्रित नहीं है कि नाटक को खेलने के लिए रंगमंच का होना आवश्यक है। वास्तव में नाटक की रचना पर भी रंगमंच के आकार, स्वरूप, प्रकृति, उपादान, परम्परा, उपचार, अभिनय-पद्धति तथा साधनों का प्रभाव पड़ता है। सभी युगों और देशों में लिखित नाटक और रंगमंच का इतना घनिष्ट तथा अन्योन्याश्रित संबंध रहा है कि रंगमंच के बिना नाटक और नाटक के बिना रंगमंच की कल्पना ही नहीं की जा सकती।’ 2

नाटक के अभिनीत समय से ही यह सवाल उठता रहा है कि नाटक के अनुरूप रंगमंच का निर्माण हो या रंगमंच को ध्यान में रखकर नाटक लिखे जाएँ। जयशंकर प्रसाद के नाटक रंगमंच के लिए चुनौती हैं। यह भी कहा जाने लगा था कि प्रसाद के नाटकों के लिए रंगमंच बना ही नहीं। प्रसाद ने स्वयं रंगमंच के विषय में लिखा है – ‘रंगमंच की बाधकता का जब हम विचार करते हैं, तो उसके इतिहास से यह प्रकट होता है कि काव्यों के अनुसार प्राचीन रंगमंच विकसित हुए और रंगमंचों की नियमानुकूलता मानने के लिए काव्य बन्धित नहीं हुए अर्थात् रंगमंचोें को ही काव्य के अनुसार अपना विस्तार करना पड़ा और यह प्रत्येक काल में माना जाएगा कि काव्यों के अथवा नाटकों के लिए ही रंगमंच होते हैं। काव्यों की सुविधा जुटाना रंगमंच का ही काम है।’ 3

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल नाटक और रंगमंच विषयक अपना मत प्रकट करते हुए कहते हैं – ‘नाटक में कहा नहीं जाता, किया जाता है और किया भी एक बार नहीं, बार-बार जाता है। एक बार तो नाटककार के संग, दुबारा निर्देशक, प्रस्तुतकर्ता, अभिनेता व दर्शक के साथ किया जाता है। इसलिए नाटक लिखा नहीं जाता, उसकी रचना होती है। वह रचना है और तभी इसकी सारी कठिनाई है – इसका रचना बोध।4

वे एक जगह लिखते हैं कि – ‘नाटक में नाटक की आत्मा की अनुभूति और उसके प्रत्यक्ष दर्शन के लिए हमें रंगमंच का सत्यभाव चाहिए।’ 5

यह तथ्य साफ है कि नाटक और रंगमंच का शरीर और आत्मा जैसा सम्बन्ध है। नाटककार नाटक में रंगमंच के माध्यम से समकालीन मानव संघर्ष के सुनियोजित तत्वों को सामाजिकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। इस प्रकार नाटक का अर्थ – अभिनय, संवाद, पात्र, वस्तु आदि की सीमाओं तक व्याप्त है। नाटक का आरंभ रंगमंच से ही होता है और अवसान भी रंगमंच में ही होता है।

हिन्दी नाटक और रंगमंच ने अपनी लम्बी यात्रा तय की है। संस्कृत की समृद्ध नाट परम्परा के संस्कार भारतीय जनमानस और रचनाकार के पास थे। साथ ही लोक नाट की जीवन संस्पर्शित शैली भी थी। आधुनिक काल में, बाबू भारतेंदु हरिश्चन्द्र के ‘अंधेर नगरी’ नाटक सहित अन्य नाटकों ने, जीवन की विविध आयामी प्रस्तुति के साथ-साथ स्वाधीनता आन्दोलन और नवजागरण में क्रांतिकारी भूमिका निभायी है।

स्वाधीनता के बाद हिन्दी नाटक बहुत व्यापक रूप से जीवन के क्षेत्रांे में पहुँचा, जिसमें परम्परित रंगमंच की अपेक्षा, रंगमंच को लेकर नये-नये प्रयोगों की महती भूमिका है। ‘आज का रंगमंचीय प्रदर्शन मंच पर नाटक की पंक्तियों का साभिनय पाठ मात्र नहीं, प्रत्युत उसके साथ ही अन्य कई दृश्य मूलक माध्यमों और आयामों का समन्वित रूप हो गया।’ 6

हिन्दी रंगमंच को लोक नाटों से रुाोत मिलता रहा है। अलग-अलग भाषा, बोली, क्षेत्रों के लोक नाटों के तत्व, हिन्दी रंगमंच में प्रयोगशीलता और विकास का आधार बने हैं। उत्तर भारत का ‘नौटंकी’, अवधी, ब्राज, ख़डी बोली की ‘रामलीला’, ब्राज का रास या रहस, बंगला का ‘जात्रा’, मराठी का ‘तमाशा’, गुजराती का ‘भवाई, गर्बा’, भोजपुरी का ‘विदेशिया’, राजस्थानी का ‘रासो’, लोक के मनोरंजन का माध्यम रहा है। उसी तरह उत्तरप्रदेश की ‘रामलीला’, बुन्देलखण्ड का ‘स्वाँग’, छत्तीसगढ़ का ‘नाचा’, मालवा का ‘माच’ निमाड का ‘खम्म’ और ‘गम्मत’, महाराष्ट्र का ‘तमाशा’, पंजाब का ‘गिद्दा’, दक्षिण का ‘बुर्राकथा’, ‘हरिकथा’ एवं ‘विधि नाटम्’ आदि ने भी हिन्दी रंगमंच को नित नूतनता देने का कार्य किया है। जो कलाकार, निर्देशक और नाटककार जिस क्षेत्र से आये, उन्होंने रंगमंच को उस क्षेत्र के लोक नाट का थोड़ा-बहुत रंग अवश्य दिया। ‘विलासिका या लसिका रूपकों में हास्य विनोद पर विशेष बल दिया जाता है और इसका उद्देश्य मनोरंजन करना होता है। विलासिका का विषय प्रेम होता है। छत्तीसगढ़ी ‘नाचा’ के अन्तर्गत इसे करमा एवं ददरिया में सहज ही देखा जा सकता है।’ 7

हिन्दी रंगमंच को लोकरंग से मंडित करने वाले रंगकर्मी हबीब तनवीर ने नाटक और रंगमंच को लोक सम्पृक्त नयी दिशा दी है। छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को लेकर वे महानगरों में आये। लोक में प्रसरित प्रतिभा को एकत्र कर उन्होंने रंगमंच को विषयवस्तु, अभिनय, संगीत, साज-सज्जा, ध्वनि, प्रकाश, बैठक आदि सबमें नयी प्रयोगशीलता दी। ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘चरणदास चोर’, ‘आगरा बाजार’, ‘बहादुर कलारिन’ आदि नाटक रंगमंच की दृष्टि से मील के पत्थर हैं।

दूसरा नाम है – बा.बा. कारंत का। कर्नाटक की लोक शैली, पूर्वांचल की नाट परम्परा और भारतीय लोक रंग की परम्पराओं से उन्होंने नाटक एवं रंगमंच को अनूठा मोड़ दिया। यह मोड़ उच्चवर्गीय साज-सज्जा की अपेक्षा लोक की सहजता के ज्यादा नजदीक है। भारत भवन एवं देश के कोने-कोने में बा.बा. कारंत द्वारा निर्देशित नाटकों की अपनी अलग और सकारात्मक पहचान बनी है। इसी प्रकार लोक संस्कृति को अपनाकर उसे थियेटर की विशेषता बना देने वाले व्यक्तियों में रतन थियम और पणिक्कर का नाम उल्लेखनीय है। रतन थियम मणिपुर की परम्पराओं को लेकर रंगमंच पर आगे चल रहा है। पणिक्कर मलयालम की चीजों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर स्वयं एक साक्षात्कार में इस लोकधर्मी नाट-तत्व के रंगमंच पर प्रयोग के विषय में कहते हैं – ‘जब शुरू में हम छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को लेकर आये थे, तो फिदा, माला वगैरह फिल्मी गाने जानती थीं और हमारे यहाँ थियेटर में भी जो लोग थे, वे थियेटर की कुछ शैलियों थीं, उनके नाच गाने जानते थे। हमने उसमें कर्मा, ददरिया और रामसत्ता के जो गाने हैं, और जो गौरी-गौरा जो चौरे में होता है, उसकी परम्परा जो फसलों में गाये जाते हैं, और जो मेहनत करते हुए लोग गाते हैं, मरते वक्त, बच्चे के पैदा होने के वक्त। ये तमाम जो संस्कार हैं हमारे, इनकी चित्रकारी थियेटर के अन्दर पहले नहीं हुई थी। ये मैं लेकर आया। इसका असर फिर यह हुआ कि चारों तरफ छत्तीसगढ़ में इसका प्रयोग होने लगा।’ 8

रंगमंच को लेकर ‘इप्टा’ ने अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनायी है। ‘इप्टा’ ने रंगमंच को सामयिकता से जोड़ा। उसे आडम्बरहीन बनाया। उसके बैनर में खेले गये नाटक वृहत्तर मानवीय सन्दर्भ सहित होते हैं। ये सन्दर्भ वर्तमान को दृश्य में तब्दील करने वाले होते हैं। जीवन-सत्य अपने वर्तमान के साथ ‘इप्टा’ के नाटकों में अभिनीत होता है। इसी सन्दर्भ में राष्ट्रीय नाट विद्यालय ने रंग कर्म को लेकर अधुनातन प्रयोग किये हैं। इस संस्था ने पूरे राष्ट्र में रंगमंच को लेकर केन्द्रीय भूमिका निर्वहन की है। अब हिन्दी नाटक बहुत आगे बढ़ गया है। पुराने रंगमंच से नया रंगमंच, अपने विषय और शैली दोनों भिन्न है। आगे है।

भारतीय रंगमंच को जमीन पर विस्तृत और सर्वसुलभ आयाम देने की दृष्टि से सफदर हाशमी का योगदान अविस्मरणीय है। भारतीय लोक नाट गाँव की जिस चौपाल, चौराहा, मैदान से शुरू हुआ था और आज भी है, उसी परम्परा के विकास में वह आज हमें नुक्कड़ नाटक के रूप में प्राप्त हुआ है।

लोक का स्वाँग, खम्म, गम्मत, तमाशा ये अपने आदिम स्वरूप से आज तक यथावत् बने हुए हैं। उसी का महानगरीय संस्करण नुक्कड़ नाटक के रूप में जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना हुआ है। रंगमंच जीवन को अभिनय के माध्यम से प्रस्तुति देने वाला सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है, इसलिए जिस प्रकार जीवन बहुत पुराना होते हुए भी चिरनूतन है, उसी प्रकार रंगमंच भी नित नूतनता की टेक स्वयं में लिये हुए है।

अपनी-अपनी भूमिका में है। यह नाटक अनादि काल से चल रहा है और चलता रहेगा। मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं –
बन्द नहीं होते हैं अब भी
नियति नटी के कार्यकलाप,
पर कितने एकान्त भाव से
कितने शान्त और चुपचाप।

सन्दर्भ :- :-
1 – नाट शास्त्र की भारतीय परम्परा : आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ 2. 2.
2 – नागरी पत्रिका : हिन्दी रंगमंच, शतवार्षिकी अंक (6-7) पृष्ठ 45-47.
3 – काव्य कला तथा अन्य निबन्ध – जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ 103. 103.
4 – नागरी पत्रिका : हिन्दी रंगमंच, शतवार्षिकी अंक (6-7) पृष्ठ 49.
5 – पश्चिम का थियेटर तथा भारत का नाट और रंगमंच : डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, पृष्ठ 53.
6 – रंग दर्शन : नेमीचन्द जैन, पृष्ठ 49.
7 – चौमासा : मार्च-जून 96, पृष्ठ 77.
8 – कला समय : अप्रैल-मई 98, पृष्ठ 24.

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