Home
कविता
1.होली 2.चितचोर

1.होली 2.चितचोर

कलायन पत्रिका

1.होली        2.चितचोर


हरि कृष्ण “परेशान”

1. होली

यौवन से गदराई हमजोली1 मुखरित कर गई हँसखोली।2 रति स्नेह रंग में3 पति के संग खेल गई होली।।
यौवन की मदिरा पिए1 बहक उठी वह मतवाली।2 नायक ने होली के खेल में3 देह सारी झकझोर डाली।।

लाल ललाट कपोल लाल-लाल 1 पकड़ कर फेर गये गुलाल।2 चकित चितवन ने ली अँगड़ाई3 प्यासे अधरों को रह गया मलाल।।

निमिष हुये बंद, लज्जा ली ओढ़1 उन्माद भरे समीर ने हद खोली।2 खुल गये बहुरंगी पंख3 होली के रंग में रह गई ठिठोली।।

होली के रंग में घुल गया मकरंद1 अधरों की प्यास का न हो पाया अंत।2 होली के रंग में प्रियतम से बोली3 घुल-घुल जाऊँ रंग में जीवन पर्यन्त।।

2. चितचोर

नील नयन में झाँकत चितचोर, नील गगन में नाच गये मोर।
नील नीर में झलकत है मीन
सरिता जल में छलकत नभ नील।

नील नयन में झाँकत चितचोर, नीलकंठ भी हो गये चितचोर।

नीलकंठ की झाँई पढ़त
उमा देह हो गई नील।
नीलकमल दल मुखरित हो गये
रवि पोंछ गया नभतल नील।

नील नयन में झाँकत चितचोर, नील बदन में केश घटाएँ घोर।

नील सागर में डूबत है मनुहार
साँझ पहर हरि लागत हैें नील।

नील नयन में झाँकत चितचोर, नील पलक में बंद हो गये चितचोर ।

Powered By Indic IME