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कविता
स्वीकार

स्वीकार

कलायन पत्रिका

स्वीकार


इला प्रसाद

आकुल, मौन स्वरों में
मैं अब भी तुम्हें पुकारती हूँ
लेकिन मेरे स्वर
अब तुम तक नहीं पहुँचते।

उन्हें कोई शैाक भी नहीं रह गया है
तुम तक पहुँचने का
हवाओं से टकराने का
लोभ भर है।

तुम…
जो उन स्वरों के अक्स ढूँढ़ते हो अक्सर
मेरे चेहरे पर,
भूलते हो
कि स्वर किसी की प्रतीक्षा नहीं करते
आगे बढ़ जाते हैं।

गहरे, और गहरे उतरते हुए
मन की अतल गहराइयों में
लौट कर खेा जाते हैं।

तब भले ही वे तैरते हों अक्सर
विकल हो होकर
हवाओं पर
उनके अक्स नहीं उभरते
किसी के चहरे पर

वे किसी तक पहुँचते भी नहीं।
किसी तक पहुँचने की
उनकी यात्रा नहीं होती
पुकारनेवाले को
एक विवश स्वीकार तक
पहुँचा भर देते हैं।

द्वीप

आस्था की नदी में
विश्वास का द्वीप था।
उसी द्वीप पर तो मैं
चुनौती देती निगाहों को
निरस्त करती,
अकेली खड़ी थी ….

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