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कविता
पहाड़ों के जाडे़

पहाड़ों के जाडे़

कलायन पत्रिका

पहाड़ों के जाडे़


प्रीति पांडे

पहाड़ों में छिपे जाडे़, ओ जाडे़
नस नस में समा रे, हाँ समा रे!
आँखों में तेरी वो नूर बसा है जो
धूप को तिरछी छत में छुपा
चीड़ की बाँहों में झूल गया
हाय कैसा नटखट है भला सा
पगला रे, पगला रे
रूठी रजाई किस पल संग आई
उजड़ी अँगीठी ने क्यों माँग सजाई
दरवाजे भोलेे, चुप हैं, अनखोले
चूल्हे का पानी मिसरी सी घोले
मितवा रे, समझा रे
पहाड़ों में छिपे जाड़े, ओ जाड़े

पड़ी नजर तेरी, गई सिहर
छू भी ले पानी तो लागे है डर
बादल ढका ना, चंदा छिपा ना
भोली पवन को ऐसे जला ना
छलिया रे, न सता रे
पहाड़ों में छिपे जाड़े, ओ जाड़े

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