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कविता
निर्मल भारती के दोहे

निर्मल भारती के दोहे

कलायन पत्रिका

निर्मल भारती के दोहे


अंतर्द्वंद

सूरज घूमें अम्बर घूमें, थमा दिखे संसार ।
जो दीखे सब सच कहाँ, छुपी जीत में हार ।।
मनमा कपट जियामा उलझन, मुखपा रंग हज़ार ।
चादर मैली ओढे़ बैठ्ठयो, क्या सज्जा-श्रंगार ।।

लालच हियामा घर कियो, सरपे ख़ौैफ़ सवार ।
नईया तल्ले छेद रे, साजन हैं उस पार ।।

शीश नवाऊँ, तुझे रिझाऊँ, सुनियो पालनहार ।
मन अधीर मोहे धीर धरियो, कीजीयो नईया पार ।।

मानव और ईश्वर के बीच पतरी सी दीवार ।
नयन ह्मदय के खोलिए,़ मुमकिन हैं दीदार ।।

कौन सुने किससे कहें, सभई यहाँ हुशियार ।
“”निर्मल” चुप भी राखिए, ह़ँसी होइ संसार ।।

मानव रचना

लालच लिप्सा लोभ को, माया दूजो नाम ।
काया सो माया मिलै, बन जावे इंसान ।।
पाँच-रसायन देई के, कियो जगत कल्यान ।
त्रिषना उनमा आ मिली, जलन लगयो इंसान ।।

पाँच-विषए दा पींजरो, मनवा पँछी होए ।
कटै पंख फड़-फड़ करैै, आजीवन बंदी होए ।।

पुतला माटी को सही, कछु अंश मिलहि भगवान ।
करि काया सो माया परे, मिलहिं उन्हीं श्रीराम ।।

अच्छा बुरा ख़रा यो खोटा, झूट-सच्च अभिमान ।
“”निर्मल” भेद न कीजिए इन्हीं बनयो इंसान ।।

अंतर्ज्योति

शब्द चयन दी पद्धति, “”निर्मल” समझ न आए ।
जो दीजियो आकार जहाँ को, निराकार कहिराए ।।

निर्गुण के गुण गाईए, मन निर्मल हुई जाए ।
रूप कुरूप न भेदिए, दोनऊ मा हरि धाए ।।

कण कण में विद्यमान है,़ ह़र रूपमें वो मिलि जाए ।
एकहिं रूप अनेक हैं, एकहिं मा मिलि जाए ।।

आपहिं उरमा खोजिए, तनिक लेहि विश्राम ।
प्रीत ह्मदय उपजाईए, प्रीतहिं हरि को नाम ।।

हरि पद रज मोहे मिली, मिल्यो सकल संसार ।
मन दर्पन धूरी हटी, दिखयो सबल आधार ।।

परम सत्य की चाकरी, सर्व रूप को दास ।
मन मोहिनी उरमा बसी, “”निर्मल” कोऊ न आस ।।

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