‘जरा सा घी दे दे माई।
मारता टीस घाव मेरा
प्रभू कल्याण करे तेरा।
जरा सा घी दे दे माई।’
घरनिया निकली घर में से ,
‘बटोही, घाव हुआ कैसे ?’
‘सबै करनी का फल आही।
जरा सा घी दे दे माई।’
बड़ो ऊँचो-पूरो लरिका ,
किन्तु मुख पीड़ा से मुरझा ,
बात वह समझ नहीं पाई !
‘खून और पीप रिसा आता ,
बैद को जाकर दिखलाता।’
‘न,इसकी दवा नहीं कोई।
जरा सा घी दे दे माई।’
‘कहाँ से चोट मिली भइया ?
पुरानी कितनी, हे, दइया!
देख कर टूट रहा है जी!’
‘जरा सा घी दे दे माई।’
हुआ विचलित देखे से मन ,
कर रहा तू दिन-रात सहन
किसी को दया नहीं आई?’
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘न पूछो माँ, बस दे दो घी,
शान्त कुछ हो जायेगा जी!
व्याधि का पार नहीं कोई!
जरा सा घी दे दे माई।’
हथेली घी धर लौट चला ,
देखती घरनी गया चला!
हिया में करुणा भर आई।
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘कौन यह और कहाँ रहता
भयानक पीड़ा को सहता !
कोइ तो बतला दे भाई !’
‘जरा सा घी दे दे माई।’
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जरा सा माई दे दे घी !
‘अरे, ऊ अश्वत्थामा रहे ,
महाभारत का पापी अहै !
ज्योति-मणि थी मस्तक पाई!
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘द्रौपदी ने तो जीने दिया ,
किंतु अर्जुन ने दंडित किया !
काट शिरमणि ली ज्योतिमयी!
‘जरा सा घी दे दे माई।’
द्रौपदी के पाँचहु बारे ,
सोवते माँहि मारि डारे!
इहै गति है उस पातक की!
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘शाप है ई चिरकाल जिये ,
कोटि बरसों तक ये दुख सहे!
न आये इसको मृत्यु कभी!
‘जरा सा घी दे दे माई।’
जनावत नहीं नाम अपुनो,
कहीं पहचान न ले कउनो!
व्याधि का अंत कहाँ इहकी!’
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘अरे अब छिमा करौ ओहिका ,
प्रभो, करि देउ मुक्त लरिका !’
घरनियां ने अस बात कही।
‘जरा सा घी दे दे माई।’
‘कौन है इहाँ दूध का धुला ,
बड़े ऊँचे -ऊँचन ने छला।!
कलपती हुइ है मातु कृपी!’
‘जरा सा घी दे दे माई।’