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और रातों की तरह एक और रात

और रातों की तरह एक और रात

कलायन पत्रिका

और रातों की तरह एक और रात


कहानी – शशि देशपांडे । अनुवाद – सुनीता कट्टी

वह मेरी ‘हैलो-हैलो’ तक सीमित पड़ोसन थी। पर शायद अपने आप को मेरी रहनुमा मानती थी। इसलिए हैरत, फिकर और अजीब से सुकून के साथ कहे जा रही थी, ”एक जाना पहचाना आदमी… और किसी और औरत के साथ। आप तो जानती हैं ऐसे में लोगों का अमूमन क्या रिएक्शन होता है। पर मैंने सोचा, हर कोई यही सोचेगा कि मुझे क्या पड़ी है, मैं क्यों बताने जाऊँ। पर लोगों के इसी रुख के कारण बीवियाँ ऐसी बातें सब के बाद जान पाती है।”

वह कहती चली जा रही थी, आवाज में जीत का हल्का सा पुट लिये। ” … यह इसलिए भी होता है कि हम बीवियाँ पतियों पर जरुरत से ज्यादा भरोसा करती हैं। हम भरोसा तब तक करती रहती हैं जब तक ऐसी कोई छुरी की तरह पतली, नुकीली आवाज उसे चीर कर नहीं रख देती।”

”आप तो जानती ही हैं कि मैं हमेशा सीधी-सच्ची बात पसंद करती हूँ। सच्चाई को जान लेना बेहतर भी है। आपको नहीं लगता?”

”जी, ठीक कहती हैं आप।” मैंने रुखाई से कहा।

इसके साथ ही, पहली बार उसकी आँखों में उसकी मेरे प्रति नापसंदगी, नफरत साफ-साफ दिखाई दी। पल भर में ही मैंने इस बात को तीव्रता से महसूस किया।

मेरी रुखाई से उसके चेहरे की रंगत अचानक बदल गई। इतनी देर तक उसकी वाणी में हमदर्दी की नमी थी। वह अचानक ही भाप बन कर उड़ गई। और आवाज में ईर्ष्या की कड़वाहट घुल गई।

”आपको यकीन नहीं आता? अजी, सोलहों आने सच्ची बात है यह। सिर्फ एक बार देखा होता तो मानती कि मेरी आँखों ने धोखा खाया है। आपसे जिक्र भी नहीं करती। पर क्या बताऊँ! मैंने उन दोनों को इकट्ठा दो-चार बार देखा। तब सोचा, यह बात आपके कानों में डालना ही मुनासिब होगा।”

” खैर, ठीक ही किया आपने…।” मैंने उससे कहा। कितनी खोखली आवाज में कह रही थी वह। दो बार!! आदमी की पूरी जिंदगी को देखते हुए, दो बार की बात कितनी बेमानी, महत्वहीन लगती है।

”और नहीं तो क्या।” मुझे सांत्वना देते हुए सी बोली, ”वैसे कसूर उनका नहीं है। यानी आपके पति का। आदमी तो होते ही सीधे हैं।” ये शब्द हमदर्दी या गुस्से से नहीं बल्कि कड़वाहट से कहे गये थे। क्यों हो गयी थी वह ऐसी कड़वी? कॉफी के कारण?

”और कितनी चीनी डालूँ कॉफी में?” अच्छी गृहणी की तरह मैंने अपनी मेहमान से तत्परता से पूछा।

”नहीं। बस। आधे चम्मच से ज्यादा मैं कभी नहीं डालती। फिगर को मेनटेन करने का यही एक तरीका है।”

… जी हाँ। फिगर को मेनटेन करना है। पर किस कीमत पर? आँखों में अँधेरा। आँखों के नीचे काले साये। इससे अच्छा है कि थेाड़ी और चीनी ले लो और अपनी कड़वाहट को अपने तक ही सीमित रखो। मेरे ऊपर मत उगलो।

”क्या कह रही थी मैं? हाँ। आपके पति के बारे में। मेरा मतलब था कि शायद उस लड़की ने ही उन्हें फाँस लिया हो। मुझे मालूम है ये लड़कियाँ कैसी होती हैं। खासकर ये नौकरी पेशा लड़कियाँ । बाप रे बाप। बड़ी ही ढीठ होती हैं जी।”

…ढीठ न हो तो भी ठीक है, पर क्या वे सीधी-सादी बनी रह सकती हैं? शायद नहीं…

”इतना ही नहीं जी, मैं तो कहती हूँ… ” कॉफी के कप को खिसकाकर वे बेसब्री से बोलीं।

” बिस्कुट लीजिए न।” मेरा आग्रह।

” नहीं बस। लंच के बाद मैं कभी कुछ नहीं खाती।”

शायद हमें और कोई कहावत गढ़नी पड़ेगी। जैसे कि नाश्ता करो कड़वाहट दूर करो। …सोचा और मुझे अपने आप पर शर्म आई। घर आयी मेहमान के बारे में कैसा भद्दा मजाक कर रही थी मैं। सच देखा जाए तो उसी क्षण से मैं उससे नहीं बल्कि अपने आप से नफरत करने लगी। अव्वल तो मुझे उसकी बात सुननी नहीं चाहिए थी या फिर सुनते ही उसे चले जाने के लिए कह देना चाहिये था। पर मैं तो उसकी बात सुनती रही। ठीक उसी तरह जैसे बच्चे का मन उसी किताब को पढ़ने के लिए मचले जिसे पढ़ने के लिये मनाही हो।

”उनकी ढीठाई भी मैं बर्दाश्त करती। पर वे बेशर्म भी हैं। उसे ऐसी पोषाक में देखा मैंने कि क्या कहूँ।”

”दिखने में कैसी है वह?” बरबस मुँह से निकल ही गया हालाँकि बाद में इसके लिए मैं पछताई भी।

”खासी लम्बी है। उनके कान तक आ रही थी।”

… मैं उनके कंधे तक ही आती हूँ।

”पर सावँली है।”

… मुझे हमेशा गोरी कहा जाता है।

”और मजे की बात यह है कि मेकअप-वेकप भी नहीं करती। कम से कम ऐसा दीखता तो है नहीं।”

…मैं भी कहाँ मेकअप करती हूँ।

” उस दिन साड़ी पहनी थी उसने। यहाँ से… ” उसका हाथ कमर से नीचे तक गया।

” और स्लीवलेस ब्लाउज। यहाँ तक गला था।” फिर एक बार हाथ का उठना और गिरना।

” सब कुछ दिखाई दे रहा था। वैसे ज्यादा कुछ है ही नहीं दिखाने को, बस हड्डियों का ढाँचा है। मैं तो कहूँ, वह तो टी शर्ट और स्लैक्स में ही ज्यादा अच्छी लगती है। दूसरी बार मैंने देखा तो वह वही पहने हुए थी।”

टी शर्ट और स्लैक्स! छोटी सी कमर। शायद चौड़े बेल्ट से और भी नाजुक लगती हो। सख्त, छोटे स्तन। टी शर्ट में से साफ दिखाई देते होंगे। कूल्हे चपटे ताकि पीछे से लड़के का भ्रम हो। पर वह तो फी सदी लड़की थी। और मैं? बीसियों बार किए वजन घटाने के, डाइटिंग करने के निश्चय याद आये। कितनी ही बार मैंने मक्खन, घी, चीनी को परे हटाया था और उतनी ही बार बेसब्री से हाथ बढ़ाकर उन्हें गले भी लगाया था। मैं तो साड़ी को छोड़ और कोई पहनावा पहन ही नहीं सकती। शुक्र है कि कम से कम यह लिबास औरत की सारी खामियों को ढक लेता है। झूठ क्यों कहूँ, किसी छरहरी युवती को देख मेरा भी जी करता है कि आँखे सेंक लूँ। फिर मर्द तो आखिर मर्द है।

”उस दिन पिक्चर देखने गयी थी तभी दोनों नजर आये थे। एक पल के लिए लगा कि आप ही उनके साथ हैं। मैं उस तरफ चली ही थी कि मैंने देखा कि वे मुस्करा रहे हैं। मैं हैरान हो गयी। अपनी पत्नी पर कौन ऐसी मुस्कुराहट बिखेरता है।”

…पर तुम्हें क्या पता कि वे मेरी तरफ कैसे देखते है, कैसे मुस्काते हैं। और वैसे भी तुम उन्हें या मुझे जानती ही कितना हो। सिर्फ अपने पति को छोड़, तुम और किसी आदमी को जानती भी हो? वह पति, जिसने तुम में इतनी ज्यादा कड़वाहट भर दी है कि वह तुम्हारे मन के प्याले से बाहर आ आकर छिटक रही है, दूसरे आदमियों पर, पतियों पर… ”और वह भी… उसकी तरफ मुस्करा-मुस्करा कर देख रही थी। एक-दूसरे के साथ बहुत खुश लग रहे थे दोनों।” उसके स्वर में मानो तेजाब उफन रहा था।

और पहली बार, पहली बार मेरा मन गुस्से से भर उठा। लगा कि फौलादी नोंकदार चाकू ने शरीर को चीर दिया हो और उसमें मर्मव्यापी वेदना का लावा उबल रहा हो। मेरा मन नफरत से भर गया। नफरत उस औरत के प्रति, नफरत जो दूसरों की खुशी के बारे में इस तरह की बेहूदगी से बोल सकती है। पर अपने इस मनोभाव को मुझे छिपाना पड़ा। उसके सामने मैं कतई उसे प्रकट करना नहीं चाहती थी।

बड़ी मुश्किल से अपने स्वर को संयत कर मैं बोली, ”ओह! पर मुझे नहीं लगता कि यह कोई बहुत गंभीर मामला है। आखिर आदमी को मौज-मस्ती की, मनोरंजन की भी तो जरूरत होती है। और अकेला तो वह जा नहीं सकता। आप तो जानती ही हैं कि मैं ज्यादा बाहर नहीं निकलती। आशा के जन्म के बाद तो मैं मानो घर से बँध गई हूँ। चाहूँ तो भी कहीं आ-जा नहीं सकती। जरूरी तो नहीं कि वे भी हर वक्त मेरे साथ यहाँ बँधे रहें।”

”जी आम तौर पर ऐसा ही होता है। आप घर में पड़ी रहती हैं। अपना सब कुछ बच्चों के लिए त्याग देती हैं और वे चले जाते हैं बाहर रंगरलियाँ मनाने।”

उसका वह बिचका हुआ मुँह। हमेशा के लिए चेहरे पर टिका तनाव। हर खुशी, सुख से वंचित औरत का चेहरा। क्या मैं भी कभी इसी तरह दिखाई दूंगी? पर क्या सचमुच कोई मुझे उस सुख से वंचित कर सकता है, जो मैं, सिर्फ मैं ही रच सकती हूँ?

”जिंदगी कभी औरतों का साथ नहीं देती” वह मानो पुरुषों के विरोध में छिड़ी जंग का ऐलान कर रही थी। फिर जैसे अपने आप पर रीझकर उसने सवाल दागा, ”क्यों ठीक ही कहा ना मैंने? देखो ना। आप अपने आप को समर्पित कर देती हैं। पूरी जिंदगी आप त्याग करती रहती हैं अपने पति के लिए… बच्चों के लिए…”

समर्पण? त्याग? किस बात का त्याग किया है मैंने? शुरू से ही मुझे शादी करने की तमन्ना थी, बच्चों की परवरिश करने का शौक था। मुझे जो कुछ चाहिए था, वह मुझे मिल गया। इसके बिना जिंदगी कितनी बेमानी, नीरस होती। मुझे यह सब अच्छा लगता है। तो फिर मैंने किस बात का त्याग किया? किसकी खातिर त्याग किया?

”…और आखिर में आप देखती हैं कि इस सबके बावजूद आपके पास कुछ भी नहीं बचा है।”

कुछ भी नहीं? क्यों भई? अभी भी मेरे पास अपनी जिंदगी है। वह तो मेरी अपनी ही है। वह तो किसी ने नहीं छीनी मुझसे?

”आप ही की बात लीजिए। जो कुछ भी हो रहा है, उसमें आपका कोई देाष नहीं है फिर भी…”

”पता नहीं।” मुझे जबरदस्ती कहना ही पड़ा, ”क्या कोई पूरी तरह निर्दोष भी हो सकता है?”

… वे भी तो जानवर नहीं हैं। कई और आदमियों की तरह वे भी आदमी हैं। उनमें भी कितनी सारी अच्छाइयाँ हैं। कुछ बुराइयाँ भी हैं। पर उससे क्या ?

”क्या आप में जरा भी स्वाभिमान, आत्मसम्मान नहीं है?” उसने हिकारत भरे स्वर में पूछा। शायद मेरी प्रतिक्रिया से उसे घोर निराशा हुई थी। स्वर में और जहर घोलते हुए बोली,

”आप उस आदमी की छलना, प्रवंचना सह लेंगी? चुपचाप रहेंगी? बस इसलिए कि आप अपनी सुरक्षा को दाँव पर नहीं लगाना चाहती? सुख चैन पर आँच नहीं आने देना चाहती?”

उसकी आवाज सचमुच ही छुरी की तरह पैनी थी। पर सच हमेशा ही पैना, नुकीला होता है। क्या मैं सचमुच अपनी सुख सुविधा, सुरक्षा के लिये सत्य से मुँह मोड़ रही हूँ? ना। नहीं यह सच नहीं है। इतने वर्षों से हम दोनेां इकट्ठा रह रहे हैं। दोनों ने मिलकर अपनी एक दुनिया बसाई है। रोजमर्रा की जिंदगी को अर्थ देने वाली दुनिया। और अब यह आवाज डंके की चोट पर कह रही है कि वह झूठी थी। सब मायाजाल था। सच था तो सिर्फ अपने-अपने स्वार्थों का, इच्छाओं की पूर्ति का। सुख। सुविधा। आराम। अचानक उसे लगा कि उसने घिनौने दल-दल में पाँव रखा हो।

”पता नहीं।” मैंने बेजान सी आवाज में कहा। ”समझना मुश्किल है। आपने आकर मुझे यह सब बताया। अपने कर्तव्य का पालन किया। अब कृपया आप चली जाइये।”

…जिंदगी को बनाने के लिए साल लग गए और उजाड़ने के लिए बस कुछेक मिनट। पर उसका चेहरा… लगा कि मेरे व्यवहार ने उसे आहत किया। शायद उसको मुझसे कुछ और उम्मीद थी या फिर वह सचमुच ही समझ रही थी कि यह सब बताकर उसने मुझ पर उपकार किया है।

”आपने जो कुछ मुझे बताया उसके लिये मैं आपकी आभारी हूँ।” मैं कुछ और नरमी से बोली, ”मानती हूँ कि सच्चाई को जान लेना बेहतर है…”

सच्चाई? क्या कभी कोई जान भी सकेगा कि सच्चाई क्या है?

”मुझे आपसे बहुत हमदर्दी है। और आपके छोटे-छोटे तीन बच्चे! बेचारे! पर ऐसा ही होता है हमेशा, खैर।” एक आह भर कर मेरी हितैषी पड़ोसन चली गई।

जैसे ही वह चली गई, मैं दौड़कर आइने के सामने पहुँच गई अपने आपको यथार्थ के तराजू में तोलने। यह चेहरा… यह शरीर… क्या यही सब कुछ ”मैं” हैं? जब वे मुझे ‘मेरी पत्नी’ कहते हैं तब क्या सिर्फ इसीकी तरफ उनका इशारा होता है? हमने अपने बीच जो कुछ सँजोया है, जो कुछ बनाया है, उसे कोई भी तेज तर्रार औरत नकार सकती है? क्या वह ‘कुछ’ इस चेहरे पर, शरीर पर ही आधारित है? प्यार… क्या ही अच्छा होता कि मैं इस शब्द को जान जाती, पूरी तरह।

…पालने में कुछ हलचल हुई। घर की खामोशी में वह और ज्यादा मुखर हुई। उस हलचल ने उसे जता दिया कि उसे दूध बनाकर तैयार रखना चाहिए। दूसरे दो भी नर्सरी स्कूल से अभी लौटेंगे। उनका खाना भी टेबल पर तैयार रखना चाहिए। यह समय जीवन की व्याख्या करने का नहीं बल्कि उसे चलते रहने देने का है। जिए जाना पड़ेगा, इसी तरह।

बच्चे को दूध पिलाकर मैंने उसके कपड़े बदले और उसे फिर से सुला दिया। स्कूल से लौटे बेटों को खाना दे दिया। और तब कहीं मैंने फोन उठाया।

दूसरी तरफ से आवाज आयी ”आई एक सॉरी वे कमरे में नहीं है। कान्फरेन्स में है। क्या कोई मैसेज देना है? क्या मैं जान सकती हूँ कि आप कौन बोल रही हैं?” बँधे बँधाये शब्द, पर कुछ इस तरह से कहे गये थे मानो बात कुछ और ही हो। आवाज भी पेशेवर ठंडी नहीं बल्कि शोख, चंचल थी। जैसे चुटकी ले रही हो। शायद वह मुस्करा रही थी। उसे देख सकती तो मैं भी मुस्करा देती, क्योंकि मुझे यकीन था कि वह मुस्कराहट ऐसी होगी जो दूसरे को मुस्कराने पर विवश करे।

”कह दीजिए कि उनकी मिसेज ने फोन किया था। फ्री हो जायें तो घर पर फोन करें।”

”ओह।” उस तरफ की आवाज लड़खड़ा सी गई। मैंने मन ही मन उसके चेहरे से उस मुस्कराहट को, आत्मविश्वास को गायब होते देखा। अब वहाँ बची होगी एक चकित, हैरान युवती।

”जी, मैं बता दूंगी।”

रिसीवर नीचे रख, मैं सोचने लगी कि अब आगे क्या करें? दौड़कर इस होड़ में शमिल हो जाएँ? जल्दी से इस पुरानी, सूती साड़ी को बदल, कोई और अच्छी सी साड़ी पहन लें? ढीली, बिखरी चोटी को उधेड़ सुन्दर सा जूड़ा बना लें?

अपने गुमराह पतियों को फिर से राह पर लाने के लिये, उनका मन जीतने के लिए, ऐसे ही कुछ नुस्खे महिला पत्रिकाओं में दोहराये जाते हैं। ”आप में जरा भी स्वाभिमान, आत्मसम्मान नहीं?” वह पैनी आवाज कानों में गूँज गई। है क्यों नहीं? मुझमें आत्मसम्मान है और बेहद ज्यादा है, तभी तो कुछ नहीं हो सकता। मैं हमेशा ऐसी ही रहूँगी। यही रहूँगी। निश्चिंत अनगढ़़। आलसी, बेतरतीब। लोगों से मिलने-जुलने से कतराती। यह बात नहीं है कि मैं यह सब नहीं कर सकती। पर यह तय है कि मैं यह सब नही करूँगी। मैं जो हूँ, वैसे ही उन्हें मुझे स्वीकारना है। सो मैं रोज ही की तरह अपने काम करती रहूँगी।

थोड़ी देर के लिए मैं सो गई। उठकर रोज की तरह मैंने थोड़ा बहुत पढ़ा। फिर बच्चों के साथ खेली। उन्हें फिर से खिलाकर साफ सुथरे कपड़े पहना कर खेलने के लिए बाहर भेज दिया।

…बाहर की तरफ से दरवाजे का सेल्फलॉक खुल गया। उनकी सीटी की आवाज सुनाई दी। ऐसे लगा कि मानो सब कुछ रोज की ही तरह है। जैसे कि सवेरे जो कुछ भी सुना, जाना, वह कोई दु:स्वप्न हो। वास्तव तो सिर्फ यही है। यह घर जिसे हम दोनों ने मिलकर बनाया है, जिन्दगी जो एक साथ जीते आ रहे हैं। पर फिर वह लड़की? मैंने हँसकर अपने मन से पूछा, ”कौन सी लड़की? कैसी लड़की ?”

”कैसा रहा तुम्हारा दिन?” चेहरे को साबुन से रगड़ते हुए उन्होंने पूछा।

”दिन? ओह। जैसे रोज रहता है।” लड़कों की जूठी प्लेटें और दूध के प्याले सिंक में रखते हुए मैंने कहा। ”चाय चाहिए?”

”नहीं। पी ली है। बच्चे कहाँ हैं?”

”नीचे, खेलने गये हैं। बेबी बेडरुम में है। ”

वे बिटिया के पास चले गये। मैं सुन रही थी, उनका उसे पालने से उठाना। गुदगुदी करना, उसकी हर्षोत्फुल्ल किलकारियाँ।

महरी ने आकर रसोई सँभाली। वह बर्तन माँजने लगी। तब मैं बेडरूम में आयी। बालों में कंघी करने बैठ गई। अभी भी बालों में कंघी फँसाये थी कि वे आ गये, बच्ची को बाहों में उठाए। मेरी तरफ देख उन्होंने पूछा, ”तुमने फोन किया था? ”

”हाँ”

”आई एम सॉरी। मैं तुम्हें फोन नहीं कर सका। बहुत बिजी था। किसलिए किया था तुमने फोन? क्या कोई बहुत जरूरी बात थी? ”

यह हमारी रोजाना की जिंदगी का आम हिस्सा था। छोटे-छोटे प्रश्न, जिनके उत्तर मिलना उतना जरूरी भी नहीं होता। इधर-उधर की बातें। बीच-बीच में चुप्पी।

अपने आप में बेमानी, महत्वहीन थीं ये बातें। अब अचानक महसूस किया कि यह हमारा संवाद, संबंधसूत्र था, जो आश्वासन देता था कि इतने घंटो के अंतराल के बाद भी हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। …नहीं! यह नहीं हो सकता। मैं इस तरह आम दिनों की जिंदगी में शरीक नहीं हो सकती। यह तो एक तरह से उन्हें भुलावा देना है। इससे तो वे यही मानेंगे कि मेरे लिए आज का दिन भी आम दिनों की तरह ही था। यह तो किसी मासूम, असावधान पशु पर आक्रमण करना होगा। इस कल्पना मात्र से मेरा मन आत्मघृणा से भर उठा।

और फिर बिना किसी प्रस्तावना या हिचकिचाहट के मैंने उनसे वे सब बातें बतार्इं जो सुबह मेरी पड़ोसन बता गई थी। उन्हें मेरी आँखों में धूल झोंकने तक का समय नहीं मिला। मेरे सीधे सरल शब्दों ने उनके चेहरे पर पड़ा नकाब झट से उतार दिया। अब वहाँ सच्चाई मुँह झुकाये खड़ी थी। वे भ्रमित, बौखलाए, ठगे-से खड़े थे। जैसे वे वे न हों, हमारा छोटा बेटा हो जो गलती करने समय हठात् पकड़ा गया हो।

”किसने कहा यह सब तुमसे?” किसी बुद्धू की तरह उन्होंने पूछा था।

मैंने उन्हें जानकारी देने के लहजे में सब बता दिया। साथ में न गिले-शिकवे थे, न आँसू ही। गुस्से का तो कहीं नामोनिशान भी नहीं था। मेरी पथरीली भावहीनता से उनके पसीने छूट गये। वे बिना कुछ बोले, गुमसुम मेरी तरफ देखते रहे। रंगमंच पर खड़े किसी अभिनेता की तरह जो आगे के संवाद भूल चुका हो और इस बारे में कोई क्लू न पा रहा हो।

अब करूँ तो क्या करूँ मैं? मन ही मन गुस्से से बौखला उठी। उन्हें इस अजीब स्थिति से उबारने के लिए जार-जार रोऊँ या उनसे कुछ और कहूँ? नहीं! मैं कुछ नहीं कह सकती, कुछ नहीं कह सकती।

शायद मेरी चुप्पी उन्हें डरा रही है। उन्हें लग रहा है कि मैं उनसे दूर चली जा रही हूँ। इस डर ने उन्हें इतना आतंकित कर दिया कि उनके मुँह से शब्दों की झड़ी लग गयी। स्पष्टीकरण, कारण, समर्थन, अपने आप को कोसना और वादे। बिना आगा-पीछा देखे उन्होंने मुझसे कई वादे किये। आजीवन मेरे प्रति एकनिष्ठ रहने के वादे। फिर से इस तरह की भूल न करने के वादे। तरह-तरह से, अलग अलग शब्दों में। पर मैंने देखा कि वे एक बार भी ‘प्यार’ शब्द जबान पर नहीं लाये। और मैं समझ गयी कि अगर पहले कभी उन्होंने मुझसे प्यार किया था, तो अब भी करते हैं। और फिर वे बोल उठे, ”मेरे लिए वह कुछ भी नहीं है। कुछ भी नहीं। बच्चे और तुम यही मेरी सच्ची जिंदगी है। तुम ही सब कुछ हो मेरे लिए।”

फिर एक बार महसूस किया कि यह सच ही है। पर मन में एक टीस सी उठी। उस लड़की के लिए जिसे उन्होंने चाय में पड़ी मक्खी की तरह इतनी आसानी से अपने मन से बाहर फैंक दिया, जिसे उन्होंने इतनी जल्दी भुला दिया। इतनी जवान, अपने आकर्षण के प्रति इतनी आश्वस्त। कैसे सह सकेगी वह यह आघात? कल अगर मैं फोन करती हूँ तो क्या वही मीठी खनक होगी उसकी आवाज में? या वह खनक, चुलबुलाहट सदा के लिए उसकी आवाज से मिट जाएगी?

…आज की शाम कुछ और ही तरह की थी। उनके मन पर हल्की, मुलायम खुशी की परत थी मानों किसी बहुत बड़े संकट से वे बाल-बाल बच गये हों। वैसे तो वे बच्चेां में उलझे हुए थे पर मैं महसूस कर रही थी कि थेाड़ी-थोड़ी देर में उनकी निगाहें मेरी तरफ उठ रहीं थीं। मेरी आँखों को पकड़ने की कोशिश कर रही थीं। जैसे उन निगाहों के जरिये वे बच्चों पर और मुझ पर कोई जादुई जाल बिछाना चाहते हैं। बाकी सभी को उस जाल की परिधि से बाहर रखना चाहते हों। आज रात वे बहुत प्यार जताएँगे। मेरे मन में ख्याल आया और इसीके साथ मन में गुस्से की पहली लहर उठी। उस समय कोई साया सा हम दोनेां के बीच में होगा। क्या उसे मैं सह सकूंगी?

पर हैरत की बात। हम दोनों के बीच जैसे मुझे लगा था वैसा कोई साया नहीं था। मानो वह लड़की सचमुच की नहीं बल्कि कल्पनालोक की कोई चीज थी और हमारे प्यार के जोश ने, कोई मंत्र फैंक उसे गायब कर दिया था। बाद में वे हमेशा की तरह करवट बदलकर सो गये। हथेली पर सिर टिकाये।

और मैं लेटी रही। चुपचाप घर मैं फैली खामोशी को सुनती, जागती रही। कान बच्ची के रोने की प्रतीक्षा में थे। और रातों की तरह एक और रात। पर क्या सचमुच यह और रातों की तरह ही एक और रात थी ! नहीं ! मन में कुछ था जो इस बात को तीव्रता से इनकार कर रहा था। मेरे दिन कभी और दिनों की तरह नहीं होंगे, न रातें ही और रातों की तरह होंगी। मन में कुछ चटख गया था। पर उसका संबंध इनके किसी और पर डोरे डालने की खबर से न था। इनकी आशिकी से न था। उन्होंने मेरे प्रति उनकी भावनाओं का इजहार फिर उसी गर्मजोशी से किया था। मन की इस उथल पुथल का कारण कुछ और ही है। मैंने उस चीज को पकड़ने की कोशिश की। लगा कि मैं काँप रही हूँ, किसी नई खोज की संभावना से। पर अभी सब कुछ धुँधला, बिखरा-बिखरा सा लग रहा था।

सामाप्त

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