Home
एक और…

एक और…

कलायन पत्रिका

एक और…


कहानी – पाराशर गौड़

धूप ढलने के बाद पहाड़ों की काली छाया मटियाली गाँव को अपने अँधेरे में दबोचने लगी थी। पहाड़ के गाँव में रात जाने क्यों जल्दी ही आ जाती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था मटियाली में।

धीरे-धीरे अँधियारा छाने लगा था। कुलदा अपने घर के नीमदरी में सजुली में तंबाकू भर कर गुड़गुड़ा रहा था। एक लंबी साँस लेकर तंबाकू के धुंए को कुछ देर मुँह के अंदर रखने के बाद बाहर छोड़ते हुए उसे एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।

मटियाली में पटवारी की चौकी थी जो वर्षों से पूरी पट्टी की कानून व्यवस्था की देख-रेख करती आ रही थी। सरकारी निवास होने के कारण वहाँ आये दिन कोई न कोई आता-जाता रहता था। मांस व दारु की गंध तथा हँसी ठहाकों की आवाजों से अड़ोस-पड़ोस पूर्व परिचित था। चौकी से आज फिर दारु व मांस भुनने की गंध पूरे गाँव में फैल कर बता रही थी कि आज वहाँ फिर कोई आया है, और फिर कुछ नया गुल खिलने वाला है।

कुलदा उठा। मकान के छज्जे के कोने में खड़े होकर उसने अंदाज लगाने की कोशिश की कि ये गंध पटवारी रवि दत्त के ही घर से ही आ रही है या फिर कहीं और से। उसका अनुमान सही निकला। गंध चौकी से ही आ रही थी लेकिन गंध के साथ-साथ आज वहाँ से किसी औरत का दर्दनाक स्वर भी सुनाई दे रहा था।

“भगवान के लिए मुझे छोड़ दो। मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ।”

ये शब्द सुनते ही कुलदा के कान खड़े हो गए। जिज्ञासा बढ़ गई कि हो क्या रहा है वहाँ। बढ़ती उƒा के कारण यूँ तो उन्हें दिखाई व सुनाई कम देता था, लेकिन रात के सन्नाटे को चीरता हुआ उस स्त्री का वेदना पूर्ण स्वर उसे साफ सुनाई दे रहा था, जिसे सुनकर कोई भी अंदाज लगा सकता था कि वहाँ क्या हो रहा है। थोड़ा और आगे जाकर उसने कानों पर हाथ रखकर गौर से सुनने का प्रयास किया।

‘हरामजादी तेरे खसम ने ब्लाक से पैसे उधार ले रखे हैं। हमें पता है वो तो चुका नहीं पायेगा। पर उसकी जगह तू तो चुका ही सकती है अपनी इस उठती मदमस्त जवानी से।’ कुलदा ने आदमी की आवाज तो पहचान ली थी कि ये रविदत्त है। लेकिन यह औरत कौन है। इतनी रात गए यहाँ क्या कर रही है।
वह दबे पाँव चौकी की ओर चल दिया। साँस थामे धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ कर उसने दरवाजे कीे दरार से अंदर झाँक कर देखा। दो-तीन आदमी एक औरत को घेरे खड़े थे जो रो-रो कर, हाथ जोड़े अपनी आबरू की भीख माँग रही थी। उसका असहायपन और उनकी बदनीयती का घिनौना रूप देखकर कुलदा की बूढ़ी आँखें भर आर्इं।

‘मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ, मुझे जाने दो।’ उस औरत ने कहा।

‘सिर्फ हाथ जोड़ने से काम नहीं चलेगा। काम तो काम करने से ही होगा।’ बगल में खड़े भवानी सिंह के ओर देखते हुए रविदत्त पटवारी ने कहा, ‘क्यों भवानी?”

‘ये ब्लाक के बड़े अफसर हैं, इन्हें खुश कर दो तो तुम्हारा सारा कर्ज माफ करवा देंगे।’

‘पटवारी जी, मैं आपकी बहन की तरह हूँ

‘पटवारी जी, मैं आपकी बहन की तरह हूँ।’

इतना कहना था कि रविदत्त का एक जन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर आ पड़ा। जितने जोर का थप्पड़ था, उससे ज्यादा भद्दी गाली देते हुए उसने उसे बालों से पकड़ कर घसीटते हुए पलंग पर पटका और कहा, ‘ले पंचम, सँभाल इसे। जब तक तू निबटता है मैं जरा चूल्हे में मुर्गी की टाँगें हिलाकर आता हूंॅ।”

इतना कहना था कि रविदत्त का एक जन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर आ पड़ा। जितने जोर का थप्पड़ था, उससे ज्यादा भद्दी गाली देते हुए उसने उसे बालों से पकड़ कर घसीटते हुए पलंग पर पटका और कहा, ‘ले पंचम, सँभाल इसे। जब तक तू निबटता है मैं जरा चूल्हे में मुर्गी की टाँगें हिलाकर आता हूंॅ।”

रात भर वो तीनों भेड़िये उस अबला की आबरू से खेलते रहे। कुलदा उनकी घिनौनी हरकतों को देख कर अंदर ही अंदर आक्रोेश से भरा जा रहा था। पर सरकारी तंत्र के आगे वह अपने को असहाय और कमजोर महसूस कर रहा था। जब उससे देखा न गया तो चुपचाप आकर अपने कमरे में चारपाई में लुढ़क गया।
सुबह ‘प्रभात का तारा’ धार में आ चुका था। घर की बहू-बेटियाँ उठकर कामकाज में जुटने लगी थीं। मंगली सिर पर गागर रख कर पानी के लिए गाँव से कुछ दूर गई थी कि उसने सामने पेड़ पर झूलती लाश देखी। मारे डर के वह उल्टे पाँव खाली गागर लिए घर लौट आई। सास के पूछने पर डर के मारे थर-थर काँपते हुए उसने कहा “पिंगला धार के खड़ीक के पेड़ पर किसीने फाँस खा रखी है।’
सास ने सख्त हिदायत दी, ‘सुन, तू किसी से मत कहना कि तूने किसी को पेड़ पर लटके देखा है। बेकार मेंे कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे।’
उसने अपने पति रामदयाल को नींद से जगाया और बताया कि पिंगला धार के खड़ीक के पेड़ पर किसी ने फाँसी लगा रखी है। फाँसी का नाम सुनते ही रामदयाल बिना हाथ मुंॅह धोए ही चल दिया पिंगला धार की ओर। थोड़ा-थोड़ा उजाला होने लगा था। पानी भरने वाले आने लगे थे। रामदयाल ने उन्हें बीच में ही रोक कर लौटा दिया। ‘कोई भी उधर न जाय, किसी ने फाँस खा रखी है।’
फाँसी की बात पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई। पूरा गाँव दहशत में था कि फाँस खाने वाली आखिर कौन हो सकती है। पिंगला धार पर लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी। रामदयाल से किसी ने पूछा ‘पता लगा कौन है।’
‘नहीं थोड़ा औेर उजाला हो जाए तो पता चल पायेगा।’ इतने में मुकेश हाथ में टार्च लेकर लाश की ओर बढ़ा। पास जा कर उसने जैसे ही चेहरे पर रोशनी डाली तो देख कर दंग रह गया। तभी बुथाड़ काका ने आवाज दी, ‘अरे मुकेश बेटा, पता लगा कौन है।’
‘गौरा भाभी है, काका।’
गौरा का नाम सुनते ही कुलदा कह उठे ‘कौन लूथी की बहू?’
‘जी काका जी ‘
रात का सारा दृश्य कुलदा के आँखों के सामने घूमने लगा। ‘तो ये थी वो अभागिन।’
‘लाश का क्या करें’ रामदयाल ने लोगों से जिज्ञासा बस जानना चाहा।
“गाँव की बात है। बेकार में सारे गाँव की फजीहत होगी। ऐसा करो लाश को नीचे उतारो। इसे लूथी के घर ले चलते हैं, फिर देखा जाएगा।” एक बुर्जुग ने सलाह देते हुए मुकेश से कहा ‘जा बेटा मुकेश पेड़ में चढ़ कर रस्सा काट औेर लाश को नीचे उतार।’
लाश को लेकर वे सीधे लूथी के घर चल दिए। आँगन में लाश को रखने के बाद लोगों ने लूथी को आवाज दी लेकिन लूथी वहाँ नहीं था। तभी बगल से दरवाजे की ओट से झाँकती बसंती बोली, ‘वो तो कल सुबह से अपनी दीदी के ससुराल गया हुआ है।’
इतना सुनना था कि लोग आपस में समस्या का हल ढूंढने में लगे। सुबह हो चुकी थी। गौरा की लाश को सफेद कपडे़ से ढक दिया गया। लोग चौक में बैठ कर प्रधान दीनदयाल व लूथी के आने का इन्तजार करने लगे। दीनदयाल आया और लाश को देखते ही उसने कहा, ‘मैं तुम लोगों से पूछता हॅूं, कानून को अपने हाथों में लेने को किसने कहा तुमसे?’
‘क्या मतलब!’ बुथाड़ ने कहा।
“मतलब ये कि जब तक पटवारी वहाँ न आता, लाश का पंचनामा न हो जाता, सबूत इकट्ठे न किए जाते, तब तक लाश जहाँ थी वहीं रहनी चाहिए थी। इस पर हाथ लगाने की कोई जरूरत न थी। अरे, तुम लोगों ने लाश के साथ छेड़छाड़ करके केस को कमजोर कर दिया है।”
‘अब क्या होगा?’ कुलदा ने प्रधान के पास जाकर पूछा।
‘लूथी को खबर भिजवा दी है या नहीं?’ प्रधान ने पूछा।
‘नहीं।”
“और पटवारी को ?”
‘हांॅ।’ बुथाड़ ने जवाब दिया। “अभी-अभी मुकेश वहाँ से आया है। चौकीदार भीखू ने उसे बताया कि पिछले दो रोज से पटवारी किसी सरकारी काम से पौड़ी गया है।”
पौड़ी के नाम सुनते ही कुलदा की बूढ़ी आँखों में खून उतर आया। मन हुआ कि सारी बात चिल्ला-चिल्ला कर सब को कह दे कि ये सब झूठ है। कल खुद उसने अपनी आँखों से पटवारी व उसके उन कमीनों को रात में गौरा की आबरू से खेलते देखा है लेकिन चुप रह गया।
प्रधान ने गाँव के एक दो लोगों को पौड़ी रवाना कर दिया पुलिस को खबर करने। इधर लूथी जब अपनी दीदी के ससुराल से वापस लौटा तो आँगन में लोगों का जमघट देख कर उसका मन बैठने लगा। पहॅंुचा ही था कि मुरुखुली काकी ने रोते हुए उससे कहा, ‘अरे निरभागी लूथी तेरे तो भाग ही फूट गए हैं रे। क्यों गया था तू बहू को अकेले छोड़ कर। अरे कल रात किसी ने उसे मार दिया रे।’
कहने के साथ ही ऊँची आवज में रोने लगी थी काकी। उसे काटो तो खून नहीं। आँगन में सफेद चादर में लिपटी गौरा को देख कर फफक कर रो उठा। ढाढस बँधाते हुए प्रधान जी ने कहा ‘ अपने को सँभाल लूथी।’
“हमने क्या बिगाड़ा था किसी का। अरे बदला लेना था तो मुझ से लेते। इस गौ जैसे देवी को मार कर पापियों को क्या मिला।”
‘लाश हमें चौकी से कुछ दूर पिंगला धार के खड़ीक के पेड़ पर लटकी मिली थी।”
इतना सुनना था कि आग बबूला होकर लूथी चीख उठा, ‘ये सब उस हरामजादे पटवारी रविदत्त की करतूत होगी।”
प्रधान जी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘ देख लूथी, इस गाँव में क्या पूरी पट्टी में, मैं तो कहता हूँ पूरे पहाड़ में ये इस तरह का पहला केस है। ऐसा न हो कि पूरा गाँव हवालात में बंद हो जाय। जरा सोच समझ कर बयान देना बेटा। सारे गाँव की नाक का सवाल है।”
‘नाक, कैसी नाक? मेरी गौरा पर अत्याचार हो रहा था तब कहांॅ गया गाँव और कहाँ गई थी गांॅव की नाक? कहाँ गए थे यहाँ के लोग।”
ये सुनकर सबके सिर झुक गए।
सूरज पहाड़ों की चोटियों से होता हुआ मटियाली के ऊपर आ चुका था। थोड़ी देर में गाँव के ऊपर पुलिस का दस्ता आता दिखाई दिया। लोगों में पुलिस का खौफ छा गया था। औरतें किवाड़ों के पीछे दुबक कर बैठ गई थीं। थानेदार ने सरसरी निगाह से लाश का मुआयना करते हुए कहा ‘इस गाँव का मुखिया कौन है?’
बिना कुछ कहे दीनदयाल उठकर हाथ जोड़े खड़ा हो गया।
‘तो आप हैं। आप इधर आइए।’ कहते हुए थानेदार उसे एक ओर ले गया और उससे पूछताछ की।
‘अरे कोई है जिसने कुछ देखा या सुना हो इस केस के बारे में।” पलट कर थानेदार ने कड़कती आवाज में पूछा।
सबकी जुबान पर जैसे ताले लग गए थे।
थानेदार ने प्रधान से कहा ‘ देखिए प्रधान जी ना कोई कुछ बोल रहा है और ना ही कुछ बता रहा है। ऐसी हालत में हमें अलग-अलग सबसे पूछताछ करनी पडे़गी।’ थानेदार ने अपने सिपाहियों से कहा ‘सुनो, सारे गाँव वालों को, बच्चे बूढ़े जवान लड़के लड़कियाँ बहू बेटियाँ, सबको यहांॅ पर हाजिर करो।”
कुछ बुजुर्गों ने समझाने का प्रयास किया कि बहू बेटियों को बख्शा जाए पर पुलिस वाले ठहरे, वो कहाँ थे सुनने वाले। थोड़ी देर में पूरा चौक गाँव के लोगों से भर गया था। सबकी जुबान खामोश और निगाहें झुकी-झुकी थीं। लूथी एक कोने में दुबक कर बैठा हुआ था। बेसहारा टूटा-टूटा सा।
थानेदार ने लूथी से सवाल किया ‘कैसी मरी रे ये?’
‘मुझे नहीं मालुम साहब’
डंडे से उसके चेहरे को ऊपर उठाते हुए थानेदार ने कहा ‘हरामजादे, लुगाई तेरी है और तू नहीं जानता। सच-सच बता वर्ना मार-मार के तेरी खाल में भूसा भर दूंॅगा।’
‘साब सच कहता हूंॅ मूझे नहीं मालुम।’ गिड़गिड़ाते हुए लूथी ने कहा। ‘मुझे कुछ नहीं पता साब। आप गाँव के लोगों से पूछ लो कल तो मैं घर पर था ही नहीं।”
‘कहाँ गया था।’ झटका देकर उसे दीवार की ओर फैंकते हुए थानेदार ने कहा।
‘दीदी के ससुराल साब। सुबह जब लौटा तो पता चला कि गौरा को किसी ने मार दिया है।’
चौक में खड़े गाँव के सब लोग लूथी पर थानेदार के बरसते थप्पड़ और भद्दी गालियों से अंदर ही अंदर क्रोधित हो रहे थे तो डर भी रहे थे।
तभी चौक पर आते हुए उमेश बोला ‘एक मिनट, एक मिनट इंस्पेक्टर।’
उसको ऊपर से नीचे तक घूरते हुए थानेदार ने व्यंग्य से कहा ‘आपकी तारीफ ?’
“मेरा नाम उमेश है। इसी गाँव का हूंॅ। गढ़वाल युनिवर्सिटी में पढ़ रहा हूँ और छात्र संघ का अध्यक्ष हूँ। इसके अलवा और कुछ पूछना चाहेंगे आप?’ थानेदार से आँख मिलाते हुए उसने कहा।
“सरकारी कामों में रुकावट डालने का अर्थ समझते हो ना।” थानेदार ने रौब जताते हुए कहा।
‘अच्छी तरह से जानता हूँ।” उमेश ने जवाब दिया।”
‘तो भलाई इसी में है जिस तरह से और गूँगे बने हैं तुम भी गूँगे बने रहो, वर्ना… ”
‘वर्ना क्या? मेरी खाल में भी मार-मार कर भूसा भर दोगे यही ना।”
“देखो, मैं नहीं चाहता कि तुम्हारा भविष्य खराब हो। अभी तुम पढ़ रहे हो। तुम…”
“चुप रहूँ यही चाहते हैं न आप !” बात को काटते हुए उमेश ने कहा। “इतना बड़ा हादसा मेरे सामने हुआ और मैं चुप रहूँ। एक निर्दोष पर आप ज्यादती करते चले जाएँ और मैं चुप रहूँ। एक बात कान खोल कर सुन लें, अगर एक हफ्ते के अंदर दोषियों को नहीं पकड़ा गया तो…”
‘तो जुलूस निकालोगे, हड़ताल करवाओगे, यही कहना चाह रहे हो तुम?” थानेदार ने कहा। “लीडरी का शौक लग गया है और लगेगा भी क्यों नहीं! अध्यक्ष जो ठहरे। क्यों मैं ठीक कह रहा हूंॅ न अध्यक्ष उमेश कुमार जी?”
‘शायद आप को मालुम नहीं इंस्पेक्टर कि मैं लॉ का छात्र भी हूंॅ।” उमेश ने उससे कहा।
लॉ का नाम सुनते ही थानेदार ने अपने रुख में थोड़ा परिवर्तन करते हुए कहा, ” देखिए उमेशजी आप ही हमारी कुछ मदद कीजिए न इस केस को सुलझाने में।”
उमेश ने उसके बदले रुख को पहचानते हुए कहा “क्यों, नहीं, क्यों नहीं। लेकिन क्या कभी आप ने यह जानने की कोशिश भी की कि इसके पीछे किसी और का भी हाथ हो सकता है।”
‘वही तो पता करने की कोशिश में था मैं, लेकिन कोई बताने को राजी ही नहीं।’
‘कोई होगा भी कैसे?े आपका पूछने का तरीका इतना गंदा है और ऊपर से हर बात में गाली, पुलिसिया रौब और सख्ती।”
“जहाँ तक सख्ती बात है तो जब तक हम सख्ती से काम नहीं लेते कोई बात उगलने को तैयार ही नहीं होता। और फिर हमें सिखाया भी तो यही जाता है।”
“देखिए इंस्पेक्टर साहब, मुझे इस हादसे के बारे में कुछ लोगों ने डरते-डरते यह बताया कि परसों दिन में पटवारी के यहाँ ब्लाक का आफिसर भवानीदत्त और यहाँ के एम एल ए चट्टान सिंह का साला पंंचम लूथी को खोजने यहाँ आये थे।”
‘क्यों ?’
“तीन साल पहले लूथी ने ब्लाक से बैल खरीदने के लिए 6000 रुपयों का कर्ज लिया था। शायद वसूली के चक्कर में आये होंगे।”
इतना कहना था कि भीड़ मे़ से मधुली ने साहस जुटाकर थानेदार से कहा ‘हाँ साब, परसांे दिन में पटवारी रविदत्त, ब्लाक का आदमी और चट्टान सिंह का साला पंचम लूथी को ढंूढते हुए उसके घर पर आये थे। लूथी घर पर नहीं था। वो तो अपनी दीदी के ससुराल गया हुआ था। उसकी औरत गौरा उस समय घर पर थी।”
‘तुमने देखा ये सब?’ थानेदार ने सवाल किया।
‘हाँ साब। गौरा ने भी ये सारी बातें मुझे पानी के पंदेरे में कही थीं जब हम पानी लेने गए थे। और कह रही थी…”
“क्या कह रही थी?” थानेदार ने जोर देकर पूछा।
“कह रही थी कि वे कि लूथी को वो उसकी दीदी के ससुराल से उठाकर चौकी में ले आयेंगे। तू उसे छुड़वाना चाहे तो चौकी में शाम को आ जाइयो, पूछताछ करके छोड़ देंगे।”
“अब कहानी थोड़ी-थोड़ी समझ में आ रही है।” थानेदार ने सिर से टोपी उतारते हुए कहा। ‘मेंरे ख्याल से उन्होंने गौरा को लूथी के चक्कर में उसे चौकी में बुलाया होगा और फिर उसके साथ जोर जबर्दस्ती की होगी। बाद में उन्होंने सोचा होगा कि कहीं राज न खुल जाए और वे तीनों बलात्कार के जुर्म में पकड़े न जाए। उन्हांेने उसे मार कर पेड़ से लटका दिया होगा ताकि हत्या कि जगह आत्महत्या लगे और वे साफ बच निकलें।”
‘इसीलिए तो कह रहा हूंॅ थानेदार साहब अगर केस दबाने की कोशिश की गई तो मैं इसे सीधे विधान सभा तक ले जाऊँगा।” एक प्रकार से धमकी देते हुए उमेश ने कहा।
‘अरररे, इतनी दूर तक की न सोचिए जनाब। मुझ पर यकीन रखिए, मैं न्याय दिलाकर ही रहूँगा।”
‘किसे ?’
‘लूथी को!’
“इस व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक सब के सब भ्रष्ट हैं। और भ्रष्टाचार में सब एक दूसरे से जुड़े हैं। हार जाओगे थानेदार साहब।”
“कौन क्या है ये मैं नहीं जानता। मैं तो सिर्फ इतना जानता हँू कि मुझे क्या करना है।” अपने आदमियों से लाश को पौड़ी पोस्टमार्टम के लिए ले जाने का आदेश देते हुए उसने कहा, “तुम लोग चलो मैं चौकी होते हुए आता हूंॅ।” उसने मधुली से कहा, ‘मधुली तुम्हें कोर्ट में आना होगा बयान देने।’
कोर्ट का नाम सुनते ही मधुली काँप उठी और बोली, ‘नहीं साब मैं नहीं आऊँगी। मैंने जो सुना वो कह दिया।’ कहकर गाँव के लोगांें के चेहरे देखने लगी जैसे मानो उसने गौरा की कही गई बात को कह कर एक बड़ा गुनाह कर दिया हो।
थानेदार ने ढाढस बँधाते हुए मधुली से कहा ‘देखिए आप के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा जो गौरा के साथ हुआ। मैं वादा करता हँू। मैं मानता हूँ कि पुलिस वालों पर से लोगों का विस्वास उठता जा रहा है लेकिन सब पुलिस वाले एक जैसे नहीं होते।”

 

आगे पढ़े

Powered By Indic IME