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हास्य व्यंग्य
गरीबी रेखा

गरीबी रेखा

कलायन पत्रिका

गरीबी रेखा


व्यंग्य:नील आकाश

अनमोल पत्थरों पर अनूठी नक्काशी, और इन दीवारों पर महँगी पेंटिंग्स, ए.सी., उत्कृष्ट कालीनों और आला दरजे के सोफा को देखकर ये क़तई नहीं कहा जा सकता था कि सख्त सिंह की राजशाही जीवन शैली, जहाँ से गरीबी रेखा नजर ही न आती होगी, गरीबी रेखा के नीचे यापन करने वालों से झूठे आश्वासनों के विशाल इंजेक्शनों के द्वारा चूसे गए उनकी भोली भाली आत्मा के ख़ून से निर्मित हुई थी।

क्या विडम्बना है हमारे भारत की भी के एक अँगूठा छाप तो मंत्री बन जाता है, और रात दिन एक करके आई.ए.एस. करने वाला डी.एम. बन के रह जाता है। डी.एम. अपने आप में एक उत्कृष्ट सेवा नायक, जिले का सर्वेसर्वा, मगर उस मंत्री का एक अदना सा गुलाम। क्या इसी को भाग्य कहा जाए?

सूखी रोटी के बदले हथियाया हुआ गरीबों के हिस्से का सेब चबाते हुए गेंडे के डील डौल वाला सख्त सिंह मोबाइल पर डी.एम. को घुड़कने के बाद अपने पी.ए. को घूरने लगा। पी.ए. ने थूक निगलते हुए एक पर्चा उसके आगे किया।

‘क्या है?’ उसने भरे मुँह से पूछा।
‘सर! आपका भाषण जो आज शाम आपको झुग्गी झोंपड़ी वालों को फैण्टा के मैदान में देना है।’ डरते डरते बताया उसने।

‘मेज पर रख दो।’ उसने कहा।

पी.ए. ने आज्ञा का पालन किया और हाथ जोड़कर ऐसे खड़ा हो गया जैसे बलि से पहले बकरा सहम कर खड़ा हो जाता है। चुनाव नजदीक थे इसलिए सख्त सिंह प्रेशर में था।

‘हरामी का पिल्ला मुझे कानून सिखा रहा है।’ सख्त सिंह जहरीले स्वर में बोला।

‘कौन कमबख्त है सर!’ पी.ए. ने चापलूसी वाला टुकड़ा जोड़ा।

‘तुम्हारा भतीजा डी.एम.’ वह झल्ला कर बोला।

‘ओह! वो! छोड़िए सर मैं उसे समझा दूँगा।’ पी.ए. ने साहस बटोर कर कहा।

‘समझा ही दो तो अच्छा है वर्ना साले की ऐसी जगह ट्रांस्फर कराऊँगा कि नानी याद आ जाएगी।’ उसी स्वर में सख्त सिंह ने कहा।

‘बैठो।’ फिर स्वयं को नार्मल करते हुए बोला। पी.ए. निकट ही पड़े सोफे पर बैठ गया।

‘झुग्गी झोंपड़ी वाले फटेहाल इसबार हमें सुनने आयेंगे भी या…’
असमंजस में पूछा सख्त सिंह ने।

‘क्यों नहीं आयेंगे सर? जरूर आयेंगे। भला आपको सुनने न आयेंगे तो और…’ उसने कुछ और कहना चाहा मगर…

‘पाँच साल में दस बार हमारे आश्वासन सुन चुके हैं वो…’ सख्त सिंह अंगूर का गुच्छा मुँह के ऊपर लाते हुए बोला।

‘लेकिन सर, दसों बार आपने भी तो नए से नए आश्वासन दिए हैं।’ समझाया पी.ए. ने। सख्त सिंह एकाएक कहकहा मार कर हँसा।

‘ठीक कहते हो। इस बार ग्यारहवाँ नया आश्वासन होगा… वैसे भी इन भिखमंगों को और चाहिए ही क्या। वैसे मंगू!’ उससे कहकर सख्त सिंह रुका, अंगूर मुँह में डाले और बोला,
‘क्या तुम्हें लगता है के ‘गरीबी रेखा’ नाम की कोई चीज है?’

‘जी!’ पी.ए. का मुँह अचरज से खुला का खुला रह गया।

‘तंग आ गया हूँ यार, ‘गरीबी रेखा’ – ‘गरीबी रेखा’ सुन सुनकर। मुझे तो कहीं गरीबी रेखा नजर नहीं आती। रहा गरीब, तो आजकल कौेन है गरीब। झुग्गी झोंपड़ी में भी कूलर, टी.वी. लगे हैं। क्या यही गरीबी रेखा है? मुझे तो बस एक बात समझ में नहीं आती है कि जो फटेहाल में भी संतुष्ट हैं वही गरीब हैं लेकिन ऐसों का कोई उन्मूलन नहीं हो सकता सिवाय उनके खात्मे के।’

सख्त सिंह दृढ स्वर में बोला। पी.ए. आदतन एक, बार फिर ‘जी’ करके रह गया।

सख्त सिंह दाँत भींचकर बोला, ‘मेरा बस चले तो ऐसे गरीबों को गहरे समन्दर में धकेल दूँ। जब यही न रहेंगे तो ‘गरीबी रेखा’ की चखमख अपने आप ही खत्म हो जाएगी और जान भी छूटेगी ‘गरीबी रेखा’ के नीचे वालेां के उन्मूलन के पचड़े से। मुझे भी क्या काम सौंपा है महामहिम ने, गरीबी रेखा के इश्यू तहत गरीबों को अपने फेवर में लो। धत् तेरे की, ये भी कोई एजेन्डे में एजेन्डा है। मुझे तो गरीब शब्द से ही घृणा है।’

शाम पाँच बजे प्रकृति के अनुरूप एक घण्टा लेट सख्त सिंह फैण्टा के मैदान में लगे स्टेज पर खड़ा भाषण दे रहा था,

‘भाइयो! एक बार फिर मैं आपके सामने झोली फैलाये खड़ा हूँ।

‘कटोरे बहुत हैं यहाँ।’ भीड़ में कोई चीखा।

सख्त सिंह ने इत्र से भीगा रुमाल लहराया और बोला,
‘आपको याद होगा पिछले साल जब में यहाँ आया था और आप लोगों के इलाके में घूमा था तो आपसे वादा किया था कि आप लोंगो के घरों को बिजली दिलवाऊँगा । देखोे आज आप लोगों के घरों में बल्ब रोशन हैं।’

‘ये तो हमने हाइडिल वालों को खिला पिला कर के पाई है।’ भीड़ से किसी ने नारा लगाया।
सख्त सिंह अपने पीछे बैठे अधिकारियों को देखकर निर्लज्जता से मुस्कराया। फिर बोलने लगा,

‘मैंने ये भी वादा किया था के आप लोगों के इलाके में खंजड़े को हटाकर सड़कें बिछवा दूँगा। देखो सड़कें कैसी चमचमा रहीं हैं।’

‘इब्रााहीम सेठ ने बनवाई हैं।’ भीड़ से एक तेज स्वर उभरा।

‘नेता जी! आपने हमारे घर सिमेंट के करवाने का वादा भी तो किया था? किसी ने भीड़ से हाँक लगाई।

वो बोला—
‘हाँ मुझे बेइंतेहा अफसोस है के वो मैं नहीं करा सका लेकिन इस बार सत्ता में हमें पूर्ण बहुमत आप लोगों की दयादृष्टि से मिला तो मैं आप लोगों से वादा करता हूँ के वो भी कराऊँगा।’

‘गरीबों को गरीबी रेखा से ऊपर पहुँचाने का वादा क्यों धरा का धरा रह गया, साहब!’ एक वृद्ध अपनी भर्राई आवाज में बोला।

उसने पूछा तो अचानक भीड़ से एक ‘हूहा’ का स्वर उभरा इससे पहले के सख्त सिंह कोई उत्तर देता, एक फटेहाल भीड़ से उठकर चिल्लाया, ‘मैं बताता हूँ… मैं बताता हूँ !’

‘ऐ पागल! बैठ जा, ये तेरा मुहल्ला नहीं है, फैण्टा का मैदान है और नेता जी भाषण दे रहे हैं।’ पास ही के कुछ लोगों ने समझाया। मगर पागल तो पागल था वो भला क्यों और कैसे रुकता। वह कहता रहा,

‘नहीं मैं बताऊँगा… नहीं मैं बताऊँगा।’

‘ठीक है ठीक है तुम्हीं बताओ।’ सख्त सिंह ने कहा। वैसे भी सख्त सिंह इस प्रश्न के उत्तर से बचना चाहता था। इसलिए उसने उसी पागल पर टाल दिया।

‘वो जो है न।’ उँगली आसमान की तरफ उठाकर वेा बोला। सारी भीड़ आसमान पर ‘गरीबी रेखा’ की संभावनाओं को तलाशने लगी। सख्त सिंह और अधिकारियों की आँखें भी आसमान पर टिक गइंर्।

‘कहाँ बे?’ सबने एक साथ पूछा।

‘अरे वो जो आसमान है न।’ वो एक झटके से बोला।

‘हाँ तो’ सबके मुँह से निकला।

‘वही तो है ‘गरीबी रेखा’। वही ‘रेखा’ जिससे ऊपर ये लोग गरीबों को उठाना चाहते हैं, हा हा…. हा हा हा…’

कहकर हँसता हुआ वो उछलता कूदता भीड़ से निकल भागा था।
सख्त सिंह वापस आ गया था। और वही क्या ऐसे सभी सख्त सिंह ऐसे अवसरों से सदैव वापस आ जाते हैं, वो भी संतुष्ट होकर, क्योंकि यही नेता गिरी है। परंतु वो भीड़ जहाँ थी वहीं है और वहीं से खड़ी-खड़ी आसमान पर खिंची ‘गरीबी रेखा’ को एकटक घूर रही है।

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