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ललित निबंध
ºसंस्कृति का संवाहक – रंगोली

ºसंस्कृति का संवाहक – रंगोली

ºसंस्कृति का संवाहक – रंगोली


कुंकुम गुप्ता

रंगो का सुंदर संयोजन कर आकर्षक स्वरूप या आकार देना रंगोली है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ यहाँ तक सीमित नहीं है बल्कि रंगोली हमारी संस्कृति, हमारे धार्मिक प्रतीकों एवं भारतीय सनातन परंपराओं की संवाहक भी है।
भारतीय चिंतकों ने नारी को सम्मानीय स्थान दिया है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उसे लक्ष्मी तुल्य माना गया है। हर गृहलक्ष्मी चाहती है कि उसका घर सुंदर, आकर्षक तथा विशिष्टता लिए हुए हो। घर के नाम से ही एक संतुष्टि का भाव, एक सहज स्नेह का भाव, एक आदर का भाव मन में समाहित हो जाता है। केवल दीवारों से बने कमरे को घर नहीं कहा जा सकता है। जब तक घर के प्रति आत्मीयता का भाव नहीं होता है तथा भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता है तब तक हम घर की वास्तविक परिभाषा से कोसों दूर रहते हैं।

त्यौहारों या उत्सवों पर अपनी खुशियों को व्यक्त करने की एक परंपरागत शैली रंगोली या अल्पना बनाना है। भारतीय संस्कृति में तुलसी को देवता माना गया है तथा उसके (तुलसी घर) आगे रंगोली बनाकर पूजा का शुभारंभ करना भी एक पारंपरिक विधान है। महाराष्ट्र में अधिकांश घरों में प्रतिदिन ही छोटी-छोटी रंगोली या धार्मिक प्रतीक चिह्नों को प्रवे”ा द्वार पर अंकित किए जाने की परंपरा है। इन धार्मिक प्रतीक चिह्नों का अपना वि”िाष्ट महत्व है। कुछ प्रमुख धार्मिक प्रतीकों की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है।<न धार्मिक प्रतीक चिह्नों का अपना वि”िाष्ट महत्व है। कुछ प्रमुख धार्मिक प्रतीकों की संक्षिप्त जानकारी <स प्रकार है।

स्वस्तिक
जिस तरह अपने आराध्य की पूजा करते समय सर्वप्रथम गणपति जी (गणे”ा जी) का स्मरण करने का बात हमारे प्राचीन वेद, शास्त्रों में कही गई है, उसी तरह कोई भी शुभ काम करने से पूर्व स्वस्तिक चिह्न अंकित करना आव”यक माना गया है। इसकी चार भुजाएँ है जो चारों आश्रमों का प्रतीक मानी गई है। ये आश्रम हैं ब्राहृचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम । हर आश्रम का अपना महत्व है। किसी को कम या ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं आँका जा सकता है।< है, उसी तरह को< भी शुभ काम करने से पूवÇ स्वस्तिक चिह्न अंकित करना आव”यक माना गया है। <सकी चार भुजाएँ है जो चारों आश्रमों का प्रतीक मानी ग< है। ये आश्रम हैं ब्राहृचयÇ, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम । हर आश्रम का अपना महत्व है। किसी को कम या ज्यादा महत्वपूणÇ नहीं आँका जा सकता है।


यह शब्द संपूर्ण सृष्टि का मूल तत्व है। <समें ब्राहृा, विष्णु और महे”ा समाहित हैं। हर स्वर का उच्चारण करने के पूर्व <स शब्द को उच्चारित किया जाता है। “आ” कार का अर्थ उत्पत्ति से “उ” कार का अर्थ स्थिति से तथा “म” कार का अर्थ विलय से माना गया है। जिन पाँच तत्वों से मानव शरीर निर्मित हुआ है उन पाँच तत्वों का प्रतीक “ॐ” चिह्न है। “ॐ” चिह्न है।

श्री
यह शब्द समृद्धता का बोधक है। श्री” का अर्थ लक्ष्मी से है* सभी के मन में सुख, समृद्धि {ाूर्ति हेतु धार्मिक अनुष्ठानों में”श्री” शब्द या “शब्द या” को सिंदूर से (सिंदूर को घी में मथकर) दीवारों {ार लिखा जाता है ताकि समृद्धि बनी रहे।

कलश
मंगल कलश या घट परिपूर्णता का प्रतीक माना जाता है। उसमें जल, आƒापत्र तथा दूर्वा डालकर ऊपर से नारियल रख देते है। ऐसी मान्यता है कि पूजन के समय देवताओं का आह्वान किया जाता है तो यह मंगल कलश में आकर विराजमान होते हैं।

शंख
महाभारत काल में युद्ध के समय शत्रुओं को पांचजन्य” शंख का उपयोग कर कौरवों को युद्ध के लिए ललकारा था। शंखनाद से दुष्प्रवृत्तियाँ दूर होती हैं तथा सच्चाई, धर्म एवं सत्प्रवृत्तियों को विजय श्री प्राप्त होती है।

कमल
सभी पुष्पों में कमल का अपना विशिष्ट महत्व है क्योंकि कमल पुष्प पर विष्णु और लक्ष्मी जी विराजमान होते हैं। कमल को पंकज भी कहते हैं, क्योंकि कमल पुष्प की यह विशेषता है कि कीचड़ युक्त वातावरण में भी अपनी निर्मलता को बचाये रखता है। यह इस बात का संकेत है कि संघर्ष एवं दु:ख में भी मानव को प्रसन्न रहना चाहिए।

गोपदा
हिंदू संस्कृति में गाय को माँ का स्थान दिया गया है। अत: वह पूजनीय है। गाय को चरणों की आकृति पूजन के विधि विधान में शुभ मानी गई है।

विंदु
विंदु यानी शून्य से ब्राहृाण्ड का बोध होता है। विंदु को हर शक्ति का आधार माना गया है।

रेखा
यह सरलता एवं गतिशीलता का बोध देती है। इसके बिना कोई विंदु आकार नहीं ले सकता है।

वर्तुल
(गोलाकार) एक रेखा गोल रूप लेती हुई फिर उसी विंदु पर जा मिलती है। यह वर्तुल आकार इस बात का परिचायक है कि परिवर्तन के बाद फिर पूर्व का स्थिति का निर्माण होता है। यह समग्रता का बोधक है।

शृंखला
जोड़ने वाली कड़ियों के स्वरूप को शृंखला कहते है। एक इकाई दूसरी इकाई से जुड़कर ही बड़ा स्वरूप धारण करती है। संगठन की शक्ति के आधार पर ही संगठित समाज एवं राष्ट्र का निर्माण संभव है।

ये प्रतीक चिह्न हमारी संस्कृति की धरोहर हैं जो हमें गतिशील, सहनशील तथा स्नेहपूर्व जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

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