पूर्णिमा वर्मन
तराई उत्तर प्रदेश में बसे एक रम्य नगर पीलीभीत का नाम बहुतों को नहीं मालूम होगा। इस नगर ने जहाँ उर्दू के कई शायर दिए हैं वही हिंदी का एक कर्मठ सैनिक भी दिया है जिसका नाम है पूर्णिमा वर्मन।
पूर्णिमा वर्मन का कला और साहित्य से बचपन से ही अनुराग रहा है। पीलीभीत, मिर्जापुर, इलाहाबाद होते हुए संयुक्त अरब अमीरात तक उन्होंने एक लंबी यात्रा तय की है, जिसमें कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए हैं। संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिजायनिंग में डिप्लोमा। और शायद सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है अंतर्जाल पर “अभिव्यक्ति” और “अनुभूति” पत्रिकाओं का आरंभ करना तथा उनका संपादन करना।
आज के युग में कंप्यूटर क्रांंति ने “वसुधैवकुटुम्बकम्” को नया अर्थ दिया है। एक कंप्यूटर स्क्रीन पर पूरी दुनिया से जुड़ा जा सकता है। इसका पूरा लाभ उठाते हुए पूणर््िामा जी ने ऐसे लोगोंं को इकट्ठा किया जो अपनी भाषा और साहित्य के लिए कुछ करना चाहते थे। उल्लेखनीय नाम हैं अश्विन गांधी
केनाडा) दीपिका जोशी और विकास जोशी (कुवेत) प्रवीन सक्सेना (सयुक्त अरब अमीरात )। परिणाम है “अभिव्यक्ति” और “अनुभूति” का अंतर्जाल में नियमित प्रकाशन। एक बार पत्रिकाएँ निकल पड़ी तो “लोग आते गए कारवाँ बनता गया।” ये पत्रिकाएँ जहाँ नयेे लेखकों को प्रोत्साहन देती हैं वहीं प्रतिष्ठत लेखकों की रचनाओं का भंडारण भी करती हैं।
अभी हाल ही में शारजाह (संयुक्त अरब अमीरात) में पूर्णिमा जी से मिलने का संयोग हुआ। उनसे दो मुलाकातें हुर्इं। इन दो मुलाकातांे के बीच का कुछ समय हमने एमएसएन चैट पर बिताया। चैट पर हुई बातचीत के कुछ अंश –
पूर्णिमा जी, आजकल तो अंंग्रेजी का बोलबाला है। आने वाली पीढि़यों में लगता है अच्छी हिंदी केवल रचनाधर्मियों तक ही सीमित रह जाएगी। इस संबंध में आपके विचार?
हिंदी का विकास उच्चतर शिक्षा के लिए नहीं हो रहा है। इस विषय में शायद विचारों की जरूरत नहीं, कुछ करने की जरूरत है।
जिस तरह आज की शिक्षा केवल अंग्रेजी में सिमट कर रह गई है मुझे स्थिति कुछ आशाजनक नहीं लगती है।
लेकिन बात करके कुछ नहीं होगा न, हमें आगे आकर किसी विषय में उच्चतर शिक्षा हिंदी में शुरू करनी होगी और जो बच्चे पास हो कर निकलें उनके लिए रोजगार ढूंढने होंगे। बातोंे से हंगामा ज्यादा होता है और जो काम हो रहा है उसमें बाधा डालने वाले बहुत मिल जाते हैं।
आप और हम जैसों का प्रयास – ऊँट के मुँह में जीरा।
जीरे के बिना दाल ही नहीं बनती। यह भी एक सच है। “अभिव्यक्ति” भी एक जीरा ही है।
जो करना चाहते हैं वह कर ही रहे हैं पर मंजिल बहुत दूर है।
जब हम अपने छोटे से प्रयास को सफल साबित कर सकेंगे तभी बात आगे बढ़ेगी। मैं रचनात्मक आंदोलन में विश्वास रखती हॅूं। अंग्रेजी के बोर्ड मिटाने और भीड़ में भाषण देने से तो हमारी कुछ करने की शक्ति भी खतम हो जाती है। हम कुछ कर सकें तो सरकारी अथवा गैरसरकारी सहयोग भी मिल जाते हैं, न भी मिलें तो अपने दम पर ही करने की कोशिश करनी चाहिए। हम एक मीडिया कॉलेज की शुरूआत करने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी पूरी पढ़ाई हिंदी में होगी। पर अभी इस पर इतना काम नहीं हुआ है कि कुछ बात की जाय।
किसी ने मुझसे एक बार कहा था हिन्दी की पत्रिका निकालना किसी यज्ञ से कम नहीं है। पूर्णिमा जी अपने पूरे सत्व के साथ इस यज्ञ में लगी हुर्इं हैं। अश्विन गांंंधी के शब्दों में ” पूर्णिमा वक्त के साथ चल रहीं हैं, हर मोड़ से गुजर रहीं हैं, अपने कदमों के निशाँ छोड़े जा रही हैं और हर मोड़ पर, हर मौसम से गुजरते हुए जीवन की अनुभूतियाँ पृष्ठ-पृष्ठ पर अभिव्यक्त कर रही हैं।”
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