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कविता
पाँच ग़ज़लें

पाँच ग़ज़लें

कलायन पत्रिका

पाँच ग़ज़लें


डा. मधु चतुर्वेदी

एक

ये तेरी दास्तां है और मैं हूँ,
सुलगता सा समां है और मैं हूँ !

मेरे पर काट के ऊँचा उठा है,
ये ज़्ाालिम आसमां है, और मैं हूँ !

लगे हर सू यहाँ, यादों के जाले,
ये उजड़ा सा मकां है, और मैं हँू।

झुकाना सर मुझे तू ही सिखा दे,
ये तेरा आस्तां है, और मैं हूँ ।

तू चाहे तो दिखा दूँ जीत कर मैं,
मुक़ाबिल येे जहां है, और मैं हूँ !

मेरे पैरों में कुछ कीलें गड़ी हैं,
गुज़रता कारवाँ है, और मैं हूँ !

वो चाहे है ‘मधु’ कर लूँ यकींं मैं,
ये झूठा सा बयां है, और मैं हूँ ।

दो

इश्क की बात चल रही है कहीं
कोई ख़ुशबू मचल रही है कहीं !

मेरे जज़बात की हरारत से,
बर्फ जि़द की पिघल रही है कहीं !

तेरी आँखों की दूधिया शबनम,
चांदनी में बदल रही है कहीं ।

ख़्वाब तारों में छुप गए सारे,
रात आँखों में ढल रही है कहीं ।

चाँद आँगन में उतर आया है,
रात छत पर टहल रही है कहीं !

भोर के गुनगुने उजाले में,
ज़िंदगी आँख मल रही है कहीं !

दर्द दिल में, पड़ाव डाले है,
पीर भावों में, पल है कहीं !

यूँ ही कुछ गुनगुना दिया ‘मधु’ ने,
और बनती ग़ज़ल रही है कहीं !

तीन

रोज़ पाबंदियाँ लगाते हैं !
वो मेरे हौसले बढ़ाते हैं !

जिनको मालूम नहीं हद अपनी,
वो मुझे मेरी हद बताते हैं !

हादिसे जो रुला गए थे कभी,
अब मुझे देर तक हँसाते हैं !

उनको मुझसे ज़रूर उलफ़त है,
बेरुखी इतनी जो दिखाते हैं !

वो ही तारीकि़यों में रहते जो,
रोशनी का शजर लगाते हैं !

ए ‘मधु’ गैर के गले लगकर,
वो मेरा सब्रा आज़माते हैं !

चार

इससे पहले कि मेरे दिल में मलाल आ जाए,
ये ही अच्छा है तुझे मेरा खयाल आ जाए ।
अपने जज़बात की शिद्दत पे यकीं है हमको,
इतने कमज़फऱ् नहीं, लब पे सवाल आ जाए ।

उसके होंठों पे हो इक़रार ये ज़िद क्यों कीजे?
हाँ समझ लीजिए जो, रुख़ पे गुलाल आ जाए ।

मत कभी ख़ून की तासीर समझिए ठंडी;
ख़ून तो ख़ून है, कब जाने उबाल आ जाए ।

मेरी आँखों ने समन्दर को बाँध रक्खा है;
जो ये पैमाने छलक जाएँ, बवाल आ जाए ।

बात लमहे की कहे, और सदी की ठहरे ।
या खुदा ‘मधु’ कलम में वो कमाल आ जाए ।

पाँच

यूँ तो हमने अभी कहा क्या है,
फिर भी कहने को अब बचा क्या है?

सिर्फ़ नज़रों का फेर है, यारो,
क्या भला है, यहाँ बुरा क्या है?
अपनी उलफ़त का फेर है यारो,
अब छुपाने से फ़ायदा क्या है?

ज़िंदगी है उदास, गुम सुम सी,
राम जाने इसे हुआ क्या है?

कोई गर्मी नहीं है रिश्तों में,
ये चली आजकल हवा क्या है!

अपना दिल ही नहीं है क़ाबू में,
उनके जलवों से फिर गिला क्या है?

मीठी मीठी ख़लिश है सीने में,
याद तुमने मुझे, किया क्या है!

यूँ ही घबरा गए ‘मधु’ तुम तो,
ज़िंदगी ने अभी सहा क्या है?

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