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देश धर्म

देश धर्म

कलायन पत्रिका

देश-धर्म


देश-धर्म के लिए ह्मदय में संचित नही रहा यदि प्यार,
तो न मिला ऐसेां को भारत भू पर रहने का अधिकार।
जिसकी गोदी में जगते पलते बढ़ते और सेाते हैं झ
फूलों पर चलकर हँसते, शूलेां को पाकर रोते हैं,
अन्न-वायु और जल जीवन का जिससे है वरदान मिला
फिर भी बिसरा कर जिसको अपना जिन्दा शव
जो न कभी तारेंगे उनका तो लेते हैं हरपल नाम
जिससे उपकृत होते हैं उसके प्रति शेष न क्यों आभार?
जननी में ही निर्माता की छाया दीख रही प्रतिपल
देख देख कर गद्दारों को आकुल चीख रही हरपल
मातृवंदना करना जिनको रास नहीं आता उनको
धिक्कारा करते सपूत हैं निस्तेजों को जो दुर्बल
रही स्वर्ग से भी महीयसी उसको किया उपेक्षित यदि
नही आत्मसुख पा सकते हैं असह लिए जो ऊपर भार।
चंदन माटी का अनुरागी कौन कहाँ है दिखलाओ,
उसका जो चिंतन करता हो कौन लाल है दर्शाओ,
छोड़ सैन्यदल को न किसी में बलिदानेां की साध मिली
शताशत बार नमन हो उसका यदि ऐसा सम्मुख लाओ।
नाव डूबती बुला रही है सबल कर्णधारों अब
किंतु कोई न आया फिर भी अर्थभरी लेकर पतवार।
अलग-अलग मत मज़हब वाले, नही धर्म को समझे हैं
सद्भावों से वंचित होकर भ्रमंजालों में उलझे हैं
अलग-अलग भगवान बना कर भेदभाव को विकसाते
नफरत में फंस कर न कभी यों स्वप्न सुनहरे सुलझे हैं।
सबके सम्मुख संविधान की होली जहाँ जला करती
कभी तिरंगे को अर्पित करते क्या ह्मदयों का उपहार?
कवयत्री – डॉ महाश्वेता चतुर्वेदी

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