तुम

कलायन पत्रिका

तुम


डॉ प्रिया सैनी

जैसे बाती के संग दीप, खुश्बूू के संग हवा,
वैसे ही तुम हमारे जीवन में संग हो.
जग के इस उपवन में फूल से हैं हम दोनो,
तुम हमारी फूलों की पाँखुरी का रंग हो.

संचित अभिलाषा को सृष्टि का स्वरूप मिला.
नव सृजन की कामना को साधना का रूप मिला.
तुम हमारी साधना का अंग हो.

तुम मिले तो पल में लगा, पा लिया ज़मीं गगन..
खुशियों की परिभाषा जान चुका आज मन.
इन्द्रधनुषी मन का सतरंग हो..

तुमने थाम्ही उँगली तो मिल गया सहारा हमें.
तेरे रूप में मिला है जीवन दुबारा हमें.
तुम हमारे सोचने का ढं़ग हो..

मत रोको मुझे

मत रोको मुझे
बस कहने दो !
मौजों को रवाँ यूँ रहने दो !
जो अपना था वो छूट गया
बेगानों को अपना कहने दो !
खाली हुए इस कमरे में
यादों का नेह बरसने दो !
तुम दूर रहो या पास रहो स्पर्शी हवा को बहने दो !
मत बंद करो मौसम को अभी
पतझर को बहार ही कहने दो !
ओ मन के मीत ! ओ प्राण गीत !
होंठों की मौन पंखुडि़यों को कुछ कहने दो
कुछ तो कहने दो……. !

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