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कविता
ढलती उम्र

ढलती उम्र

कलायन पत्रिका

ढलती उƒा


देवी नागरानी

1. ढलती उƒा

उƒा के संग जवानी भी ढलने लगी
ज़िंदगानी की सूरत बदलने लगी।
हमने जाना लरज़ने लगे हाथ जब
अब जवानी अलग हमसे चलने लगी।

ज़िंदगी का निशाँ दूर तक अब नहीं
मौत जैसी मुझे वो है लगने लगी।
लड़खड़ाती हुई ज़िंदगी फिर यहाँ
मौत को देखते ही सँभलने लगी।

बेबसी में यहाँ चीखती ज़िंदगी
सुन के तन्हाइयों को सँभलने लगी।
द्रौपदी को बचा ना सके पाँच वो
सामने लाज जब उसकी लुटने लगी।

धूप भी थी यहाँ, छाँव भी है वहाँ
ज़िंदगी थी कि हंस हंस के जलने लगी।
पत्थरों को सदा पूजने वालों को
मंदिरों की वो मूरत भी छलने लगी।

2. जब वो आया होगा

घर में जब वो आया होगा
ख़ुशबू से घर महका होगा।
उसने ज़्ाुल्फ को झटका होगा
प्यार का सावन बरसा होगा।
साँसों में है उसकी ख़ुशबू
उसने दीप को जलाया होगा।

मुझको सँवरता देख के दर्पण
मन ही मन शरमाया होगा।
कलियाँ भी मुसकाने लगी हैं
उन पे यौवन आया होगा।
झनन झनन झनकार करे दिल
दिल का साज़ बजाया होगा।
दिल के दर्पण में ऐ देवी
अक्स उसी का आया होगा।

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