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कविता
टिमटिमाता शुक्रतारा

टिमटिमाता शुक्रतारा

कलायन पत्रिका

टिमटिमाता शुक्रतारा


यश मालवीय

जग रहा है याद के आकाश में
टिमटिमाता शुक्रतारा
एक नीली रोशनी
फैली हुई है
पारदर्शी दृष्टि
कब मैली हुई है?
हो न सकता कभी
सम्बोधन उघारा
भाव की आकाशगंगा
बोलती है
मौन चिड़िया,
पंख अपने तौलती है।
पास आता जा रहा है
हर किनारा
धूप ने काजल अभी
पारा नहीं है
कौन कहता है कि
उजियारा नहीं है।
जानते है हम
कि कब किसने पुकारा

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