मैं टूटी हँू पर बिखरी नहीं
मैं औरत हूँ कोई देवी नहीं।
तुम्हारे हर इम्तहाँ में खरा उतरने के लिए
कई बार जली पर रोई नहीं।
मैं औरत हूँ कोई देवी नहीं।
कैसा होता था वो वक्त जब पनपती थी
दिल-ए-गुलशन में तमन्नाएं कई
और कई परवाज होती थीं।
अब तो है वह दौर
कि करे दिल कोई तमन्ना
ऐसी तमन्ना ही न रही।
कागज को कलम की रौशनाई
से करके काला
अपने अंदर के अंधेरों को
फ़ीका किया मैंने
खुदाबंद तू बन कर रहबर
पैरवी करता है मुहब्बत की
शाम जब मिलती है गले रात के
तो सेा जाता है जहंा भी।
वक्ते-दौरा का सफर कट ही जाएगा
न रुका है कुछ और न ही रुक पाएगा
काफिले यूँ चलत ही रहेंगे
क्या हुआ जो हम नहीं या तुम नहीं।