जग को दें कुछ मिलकर हम तुम जीवन साथी हाथ बढ़ा दो।
मैं सूरज सा नित प्रकाश दूॅ तुम चंदा सी शीतलता दो।
दुख को झेलंे हँसकर कैसे मैं दिखलाऊँ बनकर समीर।
कष्टों में भी तुम बनी रहो पृथ्वी के जैसी सहनशील।
तुम पतित पावनी गंगा सी मेरे पीछे चलती जाओ ….
मैं भगीरथ सा आगे बढ़कर जग को बाटूॅ अमृतमय नीर।
मैं सागर सा बनूॅ विशाल ओ तुम नदियों की निर्मलता दो।
मैं बन पारस स्पर्श करूॅ तो लोहा बन जाये सोना।
तुम मधुर स्मृति सी हरदम रुठे मन का कालिख धोना।
मैं मलयज सा सौगंध लिये नित शीत मंद सुगंध बहूॅ।
तुम बन सुरभि इस धरती का महकाओ प्रिय कोना कोना।
मैं सत्या सा बनूॅ कठोर औ तुम मृदु मन की कोमलता दो।
श्रध्दा में तुम रहेा लिप्त और तना रहूॅ मैं स्वाभिमान में।
तुम प्रेम की बनो प्रतीक मैं बनूॅ धरोहर इस जहान में।
बनकर स्वाति की बूॅद प्रिये तुम प्यास बूझाओ जनजन की।
मैं ध्रुव तारा सा दीप्त सदा शोभा पाऊँ इस आसमान में।
मैं हिमगिरि सा अचल अडिग तुम ताजमहल की सुंदरता दो।