1. अगस्त्य कोहली, सियैटल
कई “विशेषज्ञ” यह कहेंगे, कि भाषा की वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि वह दूसरी भाषाओं से शब्द अपनाए… लेकिन सच यह है कि दूसरी भाषाओं से शब्द अपना कर हम अपने शब्दों का प्रयोग छोड़ देते हैं, और फिर मान बैठते हैं कि अपनी भाषा में शब्दों की कमी है।
लोग शुद्ध (अच्छ) शब्दों से दूर रहने का प्रयत्न करते हैं – या आम आदमी को समझ आने वाले शब्दों को ढूँढते हैं। किन्तु अंग्रेज़ी में शायद किसी भी पारिभाषिक शब्द के प्रयोग से नहीं कतराते। हमें स्वयं अपनी भाषा के शब्दों का ज्ञान न होना, भाषा के अविकसित रूप का प्रमाण नहीं हैं। इस से किसी और चीज़ के विकास की कमी सिद्ध होती है।
“”भई तुम तो बड़ी शुद्ध हिन्दी बोलते हो…”” – इस तरह की बातें करने वाले कितने ही लोग मिल जाते हैं। चाहे साहित्य न पढ़ने के कारण, चाहे फ़िल्मों के कारण, और चाहे कारण-अकारण संस्कृत की जगह अंग्रेज़ी से शब्द उधार लेने के कारण, “”आम आदमी”” की भाषा या तो अरबी/फारसी, या अंग्रेजी के शब्द तो पचा लेती है, लेकिन तत्सम शब्दों से परहेज करती है। हमारे अपने हिन्दी के पत्रकार खुद भी इतने आलसी हो गए हैं कि अंग्रेज़ी के शब्द जैसे-के-तैसे अपना कर अखबारों में छापते रहते हैं।
हिन्दी का पाठक अच्छी मानक भाषा सीखे भी तो कहाँ से?
अपने व्यक्तिगत धरातल पर, अब जब भी मुझ पर कोई “”शुद्ध हिन्दी”” बोलने का आरोप लगाता है, तो मैं उन्हें भी अपने जीवन से हर प्रकार की अशुद्धि हटाने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ।
2. इला प्रसाद -ह्मयूस्टन, टेक्सास
भाषा जनसम्पर्क का माध्यम है। यदि किसी भाषा का शब्दकोश समृध्द न हो तो उस भाषा में सहज ही अन्य भाषा के शब्दों का समावेश हो जाता है। वर्तमान में यही समस्या हिन्दी की भी है। अंगरेजी में विज्ञान एवं तकनीक से जुड़े शब्दोें का एक बहुत बड़ा भंडार है जिनका हिन्दी अनुवाद उस गति से नहीं हुआ जिस गति से होना चाहिए था। उन शब्दों का समावेश हिन्दी में इतने सहज रुप में इतनी तेजी से हुआ है कि उन विषयों पर बोल रहा व्यक्ति हिन्दी कम, अंगरेजी अधिक बोल रहा हेाता है। मनोरंजक तथ्य यह है कि इस समस्या से अंगरेजी भी मुक्त नहीं है। विदेशों में बसा हिन्दी भाषा भाषी समुदाय अंगरेजी के स्वरुप को बड़ी तेजी से बदल रहा है और अंगरेजी में हिन्दी के शब्दों का समावेश उसी तरह हो रहा है जिस तरह हिन्दी में अंगरेजी का। अंगरेजी के शब्दकोश में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द बढ़ते जा रहे हैं और भाषा का जो नया स्वरुप इधर ब्रिाटेन में विकसित हुआ है उसे अधिकारिक तौर पर हिंगलिश की संज्ञा दीजा रही है।
प्रश्न यह है कि भाषा के शुध्द स्वरुप को सुरक्षित रखना क्यों जरुरी है? तो इस सन्दर्भ में मैं कहूँगी कि भाषा का स्वरुप समाज से जुड़ा है और स्वस्थ सोच वाले विकसित समाज की भाषा के रुप में हिन्दी को इतना सबल, समृध्द होना चाहिए कि वह किसी अन्य भाषा की बैसाखी के बिना अपने आप को पूर्णरुपेण अभिव्यक्त करने का माध्यम बनी रहे। तभी वह एक जीवित भाषा की श्रेणी में बनी रह सकती है। उसके शुध्द स्वरुप को सुरक्षित रखना इसलिए भी जरुरी है कि इस भाषा का सौन्दर्य, इसकी गरिमा, विस्तार, सहजता एवं ग्राह्रता हमारी समझ से परे की चीज न हो जाएँ। हम उसे सराह सकें, उस पर गर्व कर सकें एवं अपनाए रहना चाहें। वरना आनेवाली पीढ़ी हिन्दी को कभी अपनाने की इच्छुक नहीं होगी।
हिन्दी एक सबल, सरल एवं सहजग्राह्र भाषा रही है। इसका एक समृध्द साहित्य एवं इतिहास है। वर्तमान संकट वैश्वीकरण से जुड़ा है जिसे हिन्दी आसानी से उदरस्थ कर उभर सकती है यदि बुध्दिजीवी वर्ग इस दिशा में पहल कर सरकारी तंत्र पर यथेष्ट दबाव डाल सके और हिन्दी के समुचित विकास को अवरूध्द होने से रोक सके।
3. चंद्रशेखर दूबे, इन्दौर
कलायन पत्रिका ने परिचर्चा का जो विषय चुना है वह बड़ा सामयिक एवं ज्वलंत प्रश्न है। हिन्दी के संदर्भ में वस्तु-स्थिति का सही आकलन किया गया है। यह सही है कि …..
4. डा. प्रीतिश्री ‘कबीर’, लखनउ
जहाँ एक और हिन्दी की प्रगति उन्नयन, उत्थान हेतु हिन्दी सेवी सतत प्रयत्नशील है वहीं हिन्दी के विकास में व्यवधान के पर्वत भी हैं। हिन्दी का अंगरेजीकरण आज चिन्ता का……
5. उर्मिला शिरीष
आपने एक ऐसा विषय चुना है जिसको लेकर एक गहरे आत्मबोध और आत्मचिंतन की जरुरत है क्यों कि भाषा सिर्फ भावों को व्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है, वह ……….
6. डॉ वि कु अग्रवाल, नई दिल्ली
राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रयोग के लिए यह विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. दिनोदिन हिंदी के प्रयोग में अगर बहुत वृद्धि हो तो भाषा के शुद्धिकरण में सहायता जरूर मिलेगी. इसके लिए देवनागिरी लिपि में किये गए हिंदी लेखन को स्वीकृति देनी होगी. चाहे कुछ शब्द दूसरी भाषाओँ के सम्मिलित हो जाएँ.