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परिधि के बाहर
परिधि के बाहर – 2

परिधि के बाहर – 2

कलायन पत्रिका


परिधि के बाहर

मथुरा कलौनी

 

“यह कोई पहली बार सॉरी नहीं बोल रहे हो तुम! चंद्रा कहती है।

“पता नहीं मुझे क्या हो जाता है कभी-कभी!”

“मुझे मालूम है तुम्हें क्या हो जाता है। तुम कहने को तो आधुनिक हो, लेकिन प्रकृति तुम्हारी वही केव-मैन की है।”

“यह तो तुम ज्यादती कर रही हो *”

“मैं ज्यादती कर रही हूँ? अगर तुम सचमुच समझदार हो तो तुम मेरे अस्तित्व को क्यों नहीं स्वीकार करते? मेरा भी अपना व्यक्तित्व है। मैं भी तुम्हारी तरह काम करती हूँ। काम में देर-सबेर तो होती रहती है। वहाँ मेरी भी जिम्मेदारी है। इतनी सी बात तुम समझते तो आज का यह सीन नहीं होता।”

“मैं समझता हूँ चंद्रा कि तुम बहुत मीक हो। अपने अधिकारों के लिए खड़ी नहीं हो सकती हो। एक बार कुमार ने कह दिया कि रुक जाओ और बस तुम रुक गर्इं। तुम्हारे ऑफिस में और भी तो स्टाफ है, फिर तुम्हीं को क्यों रुकना पड़ता है। मैं नहीं चाहता कि कोई मेरी पत्नी के अच्छे स्वभाव का लाभ उठाए।”

देखो ईश्वर, तुमको मालूम है कि अठारह साल की उमर से मैं स्वावलंबी हो कर नौकरी कर रही हूँ। अच्छे-बुरे की तमीज है मुझमें। मेरे व्यक्तित्व को क्यों नहीं स्वीकारते तुम?”

“अपनी लच्छेदार बातें रहने दो चंद्रा! सच बात तो यह है कि तुम्हारा अहम् बहुत बड़ा है। मुझसे हजम नहीं होता है। एक अकेली तुम ही तो नौकरी नहीं कर रही हो। लाखों औरतें काम करती हैं। तुम्हारी तरह घर से अधिक ऑफिस को अहमियत कोई नहीं देता है।”

“पता नहीं ईश्वर, तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं। तुम चाहते हो कि मैं नौकरी भी करूँ तो तुम्हारी शर्तों पर। तुम अहमियत की बात कर रहे हो। तुम मुझसे मुँह खोल कर कहो कि चंद्रा तुम नौकरी मत करो तो मैं नौकरी नहीं करूँगी। मुझे भले ही यह अच्छा न लगे। यदि मैं तुमसे कहूँ कि ईश्वर तुम नौकरी न करो तो तुम शायद ही मेरी बात मानो।”

“ऐसा भी कहीं हुआ है क्या?”

“नहीं हुआ है। मुझे मालूम है। तभी तो… “

बहस ऐसे ही समाप्त होती है, या बढ़ती ही चली जाती है, जब तक कि एक थक न जाए। यहाँ बात समझने की नहीं होती, मानने की होती है। दोनों को एक दूसरे के मन की बात का पता रहता है।*

पिछले एक साल से कमोबेश यही चला आ रहा था। और यही चलता रहेगा, चंद्रा ने सोचा। हमारा व्यवहार इतना प्रेडिक्टेबल क्यों होता है? झगड़ा नहीं करना चाहते हैं, तो क्यों करते हैं? क्या हम अपनी इस मानसिकता पर कभी विजय पा सकेंगे?

साढ़े पाँच बज गए थे। कुमार के केबिन का दरवाजा अभी तक बंद था। आज फिर देर हो जाएगी, चंद्रा ने सोचा। *

उसका अनुमान ठीक निकला। कुमार अपने केबिन से निकल कर उसके टेबल के पास आया और बोला, “चंद्रा आज कुछ देर रुकना पड़ेगा।”

“रुक जाऊँगी सर।”

“एग्रीमेंट के पेपर तैयार रखना।”

“तैयार हैं सर। बस, रिक्त स्थानों की पूर्ति बाकी है।”

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