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कहानी – डा. सुमन मेहरोत्रा

`ठंडी हवा का सरसरात हुआ एक झोंका कमरे में घुस आया। कमजोर शरीर के लिये यह नन्ही सी हवा भी दुखदायी हो जाती हैं। उनका खाँसी का दौर फिर शुरु हो गया। वे बिस्तर पर उठ कर बैठ गये। काँपते सीने को धीरे-धीरे सहलाते रहे जैसी कोई पंख कटा पक्षी गोद में आकर गिर गया हो और वे उसकी पीठ को सहलाकर सहानुभूति का हाथ फिरा रहे हों। पास ही पलंग पर लेटी पत्नी ने धीरे से करवट ली।
”फिर खाँसी शुरु हो गई। कैसी आँते निकालने वाली खाँसी है। दम लेने का नाम ही नहीं लेती है। जरा धीरे धीरे खाँसेा। लड़के-बहू के कमरे आवाज पहुँच रही होगी। उनकी नींद खुल जायेगी।”
उन्होंने अपना मुँह कम्बल के अन्दर छुपा लिया। दम घुटने जैसी आवाज उनके मुँह से निकलती रही। जरा साँंस रुकी तो उनके मुँह से केवल ”हे राम” ही निकला। ”रुको एक गोली देती हूँ। उससे शायद कुछ आराम आये।”
वे पलंग पर पाटी का सहारा लेकर धीरे-धीरे उठीं और लंगड़ाती हुई तिपाई तक पहुँचीं। एक गोली और एक गिलास पानी लेकर वे उन तक किसी तरह पहुँच गई। ”लो खा लो।”
वे उनकी पीठ पर हाथ फेरने लगीं। इतनी जल्दी क्या प्रभाव होता। पर धीरे धीरे उन्हे चैन आने लगा। खाँसी रुकने पर दोनों ने एक लम्बी नि:श्वास ली जैसे किसी बड़ी मुसीबत से छुटकारा मिल गया हो। पर मुसीबतें उस भीगी हुई चटाई की तरह थीं जिसकी एक-एक तीली गठी हुई थी, जो खींचने से भी अलग नहीं हो रही थी। दोनेां में से किसी को भी नींद नहीं आ रही थी।
”क्या बजा होगा?” उन्होंने कम्बल और अपने चारों ओर लपेट लिया।
”जानने से कोई लाभ होगा क्या? घड़ी की सुई भी लगता है हम लोगों कि तरह बूढ़ी हो गई है। बड़ी धीरे-धीरंे खिसकती हैं।”
”समय नहीं रुकता हैं, लगता हैं हमीं समय पकड़ कर रुक गये हैं।”
”चलो अब सो जाओ। ज्यादा बात करोगे तो नींद और भी उचट जायेगी,” और उन्हेांने करवट ले ली।
शरीर की क्षीण काया इतनी नन्ही थी कि किसी के वहाँ होने का केवल एक आभास मात्र ही होता था। वरना वे वहाँ पर है। यह विचारों के चक्र ने अवगत करा दिया। उनके मस्तिष्क में यह चक्र घूमता रहा। वे चाहती थीं कि कहीं एक जगह ऊँगली रख कर एक सिलसिला पकड़ लें, पर ऊँगली कहीं पर भी स्थिर नहीं हो पा रही थी।
कितनी ही भूली बिसरी स्मृतियाँ थी जो समुद्र की लहरों की भाँती एक दूसरे को पछाड़ती हुई आगे आने का प्रयत्न कर रहीं थीं। कोई विशेषता नहीं थीं। वही ऐतिहासिक घटनाएँ जिनकी पुनरावृति ही जीवन कहलाती हैं। एक नीड़ बनाया। चहचहाते बच्चों के मुँह में अपना सब कुछ विस्मृत करके दाना डाला। बच्चे समर्थ हो गए, स्वच्छन्द हो गये, अपनी अपनी चुनी हुई दिशाओं की ओर उड़ गये। जमाने की तेज हवा ने उन्हे पीछे मुड़ कर देखने नहीं दिया। वे जानते थे कि उनके जन्मदाता में दम-खम है। पर फिर क्या था जो हाथ से फिसलने लगा! एक शून्यता का घेरा चारों और से घिरने लगा। वें दो; और सन्नाटे की चट्टान के नीचे दबा हुआ ईट – पत्थर का घर। घर? और बिना ध्वनि के एक हँसी उनके होंठों पर फैल गई। लगता था जैसे घर से जाने वाले अपने साथ सारा घर ही ले गये हों।
पहले मन टूटा, फिर शरीर टूटा और अब लगता है कि सब कुछ टूटने और बिखर जाने के लिए ही तिनका-तिनका जोड़ा था। दुनियाँ का यही दस्तूर है। कोई भी इस दस्तूर को बदल नहीं सकता हैं। वे भी नहीं बदल सके। बस यों ही जीते रहे कभी आँसू पीकर कभी आँसू गिराकर। यों ही यादों के ढ़ेर से कभी हँसी के स्त्रोत फूट पड़ते तो हँसते-हँसते आँखो में आँसू आ जाते। कभी छुट्टी बिताने वे लोग अपने परिवार के साथ आ जाते तो लगता घर के कोने-कोने में संगीत छिड़ गया है। राग रागनियों की लहरें चारों और उमड़ती हुई लगती। अतीत और भविष्य को भूल वे केवल वर्तमान में जीने लगते। पर कैसा होता था वह सुख, जो अकेलेपन, निस्तब्धता को और भी गहरे रंगों से भर जाता था। कैसे थे वे खुशी के आँसू कि सूखते-सूखते अपने साथ आँखेां का उजाला भी ले गये। कैसा हे यह गणित, बचपन और जवानी को जोड़ बुढापे में बदल जाता है।
अब जिन्दगी की यही नियति है। थोड़ी देर तक नींद आती है और फिर आँखों से दूर होती चली जाती है। कभी खाँसी का दैार शुरु होता हैं तो कभी शरीर के किसी अंग का दर्द। एक दूसरे से सहानुभूति जताते हुये दूसरी ही दूनिया में खेा जाते हैं। वह दिन आज भी मन में धूनी रमा कर बैठा हैं, जब बेटों ने कहा था कि अब आप लोग अकेले नहीं रह सकते हैं। हम लोगों केसाथ चलकर रहिए। कितना सुखद था यह वाकय।
पेड़ लगाया था तो उसके फल खाने को भी मिलेंगें। इस अनुभूति ने ही भीतर से बाहर तक रंगों में भर दिया था, परन्तु उसी क्षण कहे गए दूसरे वाक्य, ”यहाँ सामान बेच देते है” ने उन रंगो का कच्चापन दिखा दिया। सामान बेचने के नाम से वे भीतर तक हिल उठे थे। उन्हे लगा था कि बरसों तक नन्हीं से नन्ही वस्तु के साथ जो अनेक कहानियाँ रची थीं, उसके पन्ने बिखर गये है। धीरे – धीरे क्या वे लोग भी व्यक्ति से सामान की ओर यात्रा नहीं कर रहे है।
एक दिन वह क्षण आ ही पहुँचा जब बिखरी गृहस्थी से वे स्वयं भी बिखरे जा रहे थे। जिन्दगी उषा की किरणों की भाँति सुनहरे रंग में आरम्भ हुई थी और आज अमावस की काली रात तन-मन पर छाई जा रही हैं। नही, छा नहीं नही हैं किसी और के व्दारा स्याह की जा रही हैं। जीवन की बागडोर हमारे कमजोर हाथों से फिसल कर हमारी सुदृढ़ सन्तति के अधिकार में आ गई हैं। शायद यही हर पीढ़ी की नियति होती हैं।
बेटा तो यह कह कर चला गया कि माँ तुम फालतू सामान एक तरफ करो मैं कबाड़ी को बुला कर लाता हूँ। बिखरे सामन के मध्य वे दोनों खड़े सोचते रहे कि इसमें फालतू क्या है? शायद यह चीजें जो कभी उनके लिए जीवन का सबसे बड़ा मूल्य थी, आज किसी और के घर जाकर अपनी नयी रिश्तेदारी जोड़ लेंगी, पर शाख से गिरे पते की भाँति वे अब कभी इनसे जुड़ नही पायेंगें।
उन्हेांने लपक कर एक छोटा सा खिलैाना उठा लिया। यह तो बड़े के लिए खरीदा था। कितने दिनों तक अरमान मन में गीली मट्टी की तरह तह पर तह करके जमते गये थे तब कहीं इतने पैसे जुट पाये थे कि यह पहला खिलौना खरीदा था। पोते – पोतियों को भी कभी खेलने को नहीं दिया। उस खिलौने को देख कर आज भी बड़ा बेटा इतना छोटा लगता है कि उनकी बाहों में समा जाता है। वरना तो अब सभी हथेली में भरे पानी की तरह बह कर अपनी राह पर चल चुके हैं।
पहले भी तो वे लोग कितनी बार कभी बड़े लड़के के पास और कभी छोटे बेटे के पास जा चुके हैं। कुछ दिन रहने के बाद धीरे – धीरे यह अहसास होने लगता है कि सब कुछ अपना होते हुए भी कहीं कुछ ऐसा है जो अपना नहीं रहने देता है। मन में भी सहजता नहीं रह जाती तो आपस में ही एक दूसरे पर दोषारोपण करने
लगते।
”तुम तो यहाँ आकर जम ही जाते हो। दो महीने हेा गये आये हुये, आख़ि़र कब तक पड़े रहोगे।”
”पड़े रहने की क्या बात हैं? अपने लड़के का ही तो घर हैं, अब रहो आराम से।”
”यह तो ठीक है कि घर हैं पर फिर भी पता नही क्यों अब यहाँ मन नहीं लगता है। तुम चलना चाहोगे तब तो चल पायेंगे। तुम चलना ही नही चाहते।”
”मैं क्यों नहीं चलना चाहता। तुम्हे ही यहाँ बैठे – बैठे खाने को मिलता हैं तो क्यों जाओगी वहाँ खटने।”
”†ुîश्र् तुम तो यहाँ जैसे बड़ा हल जोत रहे हो। जो कुछ हो सकता है सुबह से शाम तक करती ही रहती हूँ। जनम से बातें सुनाने की आदत है, वह अब बुढ़ापे में क्या बदलेगी।” आँखों से आँसू बह चले।
”हाँ हाँ, मैं तो तुम्हे बातें ही सुनाता रहा हूँ। चलो उठो, अभी चलो।”
उनका गुस्सा देखकर वे थोड़ा डर गई और खुशामद करती सी बोलीं।
”गुस्सा क्यों होते हो। क्या हम अपने घर नहीं चल सकते? ठीक है यहाँ सब कुछ है, पर वह हमारा घर है।”
वे यह कह कर उठ कर चले गये कि ”ठीक है टिकिट मँगवाने को कहता हूँ। वे विचारों की दुनियाँ के मध्य भँवर सी घूमती रहीं। यहाँ कोई भी काम करने में मन में संकोच पहले आकर बिराजमानर हो जाता है।
संकोच नहीं एक भय, एक डर। नये जमाने के यह लोग पुरानी हर चीज को खिल्ली उड़ाने की दृष्टि से देखते हैंं। सुबह पूजा की घन्टी बजाना उन्होंने छोड़ दिया कि देर से उठने वालों की नींद में व्याघात होगा। अपने घर में सुबह सुबह वे रेडियो पर भजन सुनती रहती हैं। और काम करती रहती हैं। पर यहाँ आकर लगता है कि ईश्वर में मन लगाने की परम्परा अब हमारी संस्कृति में नहीं हैं। यह हमारे ही खून के कतरे हैं। फिर इनकी संस्कृति इतनी भिन्न कैसे हो गई। ये लोग आवाजों की दुनियाँ मे बसते रहे हैं। हम शब्दों के संसार में रहते हैं। शोरगुल का कैसा ताण्डव नृत्य इन लोगों को भाता हैं। कौन गलत हैं कौन सही हैं यह कौन बताएगा? तो क्या हमीं बदल जायें? इन्ही के साथ रच बस जायें? अरे तो क्या अब हम भी पराये मर्द का हाथ पकड़ कर नाचना शुरु कर दें?
अपनी ही बात पर वे अकेले में भी जोर से हँस पड़ीं। एक पल की हँसी ने ही मन थोड़ा हल्का कर दिया। कमरे की खिड़की से झाँक कर देखा तो रसोई में कुछ चहल पहल सी लगी। वे उठ कर चल दी कि कुछ काम में हाथ बैटा दूँ। हर बार यही होता हैं कि काम हाथ से छीनने की कोशिश होती हैं कि आप बैठिये हम काम कर लेंगे। यह हमारे आदर-सत्कार और प्यार के कारण ही होगा। पर कहीं इसके साथ यह भी जुड़ा रहता हैं कि हम लोग अब नकारा हेा गये हैं। असमर्थ हो गये हैं। हमारी बुध्दि भी कुंठित हो गई हैं। हो ही नही गई हैं कुछ यह अहसास क्षण -क्षण दिलाया जाता हैं जैसे कभी हमारे पास शक्ति सार्मथ्य या मस्तिष्क नाम की वस्तुएँ थी ही नहीं। हमने अपनी जिन्दगी में जो कुछ भी किया, जो कुछ भी निर्णय लिये वह किसी की उधार ली हुई बुध्दि थी। शायद बुढ़ापा नाम ही ऐसा हैं जो सब कुछ लेने आता हैं, देने के नाम पर वह स्वयं ही कंगाल हैं तो दूसरे को क्या देगा?
”यह क्या बना रही हो, मृदुल?”
”कुछ नही माँ। इन्होंने अभी आकर बताया कि कुछ लोगों को आज शाम चाय पर बुला आये हैं। मेरी आज छुट्टी है सोचा अभी कुछ बना लँू।”
”मैं मदद करुँ?”
”नही माँ मैं कर लँूगी। आज एक नई डिश ट्राई कर रही हूँ।” मृदुल कुकरी बुक पर झुकी हुई थी।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा ओर बोली, ”ला, यह गिलास मैं पोंछ देती हूँ। तुम कुछ और कर लो अखिलेश।”
”रहने दो माँ मैं कर रहा हँू, तुम्हारे हाथ से छूट- छाट जायेगा।”
उन्हे ऐसा लगा कि कहीं उनके अन्दर ही कोई शीशा दरक गया है। परन्तु कोई नहीं समझ पाया कि गिलास टूटने की कीमत से कहीं ज्यादा मोल मन के भीतर के टूटने का होता हैं।
वे चुपचाप अपने कमरे में वापस आ गई। उन्होंनें अपने मन को धिक्कारा कि क्यों नहीं वह यह स्वीकार कर लेती कि वे लोग ऊपर से गिरने वाले पानी की भाँति नहीं है। उस पानी में प्रवाह होता है, ऊर्जा होती है और होता हैं सौंदर्य। वे लोग अपनी जिन्दगी की चरम स्थिती से अब नीचे ढ़लान की ओर है। वे अब उछले हुए पानी के छींटे मात्र रह गये हैं। जो अपने अन्दर की आग को भी बुझा नहीं सकते हैं।
अपने घर में तो वे सभी काम करती हैं। यहीं आकर क्या हो जाता हैं जो शीशे का गिलास छूने मात्र से ही टूट जायेगा, या टीवी उन्हे दूर से देखते ही बिगड़ जायेगा!
छ: वर्ष का अभिषेक उसी समय उनकी गोद में आकर बैठ गया। दादी के गले में बाँहे डालकर बोला ”दादी कहानी सुनाओ न।”
उनके निष्प्राण मन में साँसों का दौर फिर शुरु हो गया। अपने मन का कफ़न उतार कर उन्हेांने बच्चे को बाहों में समेट लिया। ”इस समय दिन में कहानी सुनेगा? आज पढ़ाई नहीं करनी हैं? अभी मम्मी आकर डाँटेगी।”
”नही दादी पहले कहानी सुनाओ। अच्छा एक सुना दो।”
”दिन में कहानी सुनाने से तेरा मामा रास्ता भूल जायेगा। फिर वह घर कैसे आयेगा।”
”तो वह टैक्सीवाले से पूछ लेगा। सुनाओ न दादी।” अभिषेक मचल उठा।
बच्चे की भोली बातों से उनका मन भी निश्छल हो गया। ”कौन सी सुनेगा?”
”वही सात परियों वाली।”
अभिषेक आराम से कहानी सुनने के लिए तैयार होकर बैठ गया।
”अच्छा बाबा, अच्छा।”
दोनेां ही कहानी के आदि, मध्य और अन्त में खोते चले गये। कहानी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि मृदुल ने आकर व्यवधान डाल दिया।
”अभिषेक, यह कहानी सुनने का समय नहीं है। जाओ पहले होमवर्क खत्म करो।”
”मम्मी बस थेाड़ी सी रह गई हैंं, जरा सी देर और।”
अभिषेक दादी की पीठ से चिपकता जा रहा था। वे भी जैसे उसे बचाने के लिए, हँसते हुये अपनी बाहे उस पर फैलाती जा रही थीं। वे इस खेल का हिस्सा नहीं, स्वयं ही खेल बन गई थीं। कही तो उनका कुछ अधिकार हैं। छोटे बच्चे पर ही सही। पर अभिषेक और दादी दोनेां ही हार गये। अभिषेक के जाने के बाद मृदुल वहीं उनके पास बैठ गई।
”मम्मी आजकल के बच्चों को परियों अरियों की कहानियाँ नहीं अच्छी लगतीं हैं। वे तो ऐरोप्लेन, कम्प्युटर, स्पेस, कार रेस, इनकी कहानियाँ सुनना चाहते हैं।”
वे बिना बोले रह न सकीं। ”बच्चे कहानी की कहानी नहीं सुनते हैं। वे तो कल्पना में उड़ते है। उन परियों और राजकुमारों के साथ। इस कल्पना से उनकी बुध्दि भी तीव्र होती है और विचार शक्ति भी आती है।”
”पर ऐसी कहानियों से उनका नॉलिज तो नहीं बढ़ता है।”
मृदुल बहस पर उतर रहींे है यह जानकर वे केवल इतना कहकर चुप हो गई। ”तथ्यों को जान लेने से ही ज्ञान नहीं बढ़ता है, ज्ञान बढ़ाने के लिए भविष्य का अनुमान लगाना भी जरुरी होता हैं। ऐसा न होता तो विज्ञान की इतनी उन्नती न हेाती।”
”अरे मम्मीजी यह सब फैन्टसीज़ का ज़माना गया। विज्ञान तो बच्चा अपनी घुट्टी में पीकर आता हैं।”
वे यहाँ भी हार गई। हारना शायद इतना बुरा नहीं लगता हैं जितना यह अहसास दिलाना कि तुम नहीं समझ सकते। हमारी पढ़ाई-लिखाई, हमारा अनुभव सब कूड़ेदान में डालने लायक हैं। उस दिन अखिलेश भी तो एैसा ही कुछ कह रहा जब मृदुल ने कहा, ”पापा से पूछते हैं।”
”पापा से क्या पूछना, जो तुम्हे समझ में आये वह करो,” अखिलेश की आवाज़ थी।
”क्यों पापा ने तो एल. आई. सी. में ही नौकरी की हैं।”
”उनको रिटायर हुए सालों को गये। न जाने कितने नये रुल्स निकल आये है। उनको क्या पता।”
वह वाक्य ”उनको क्या पता” हम दोनों के माथे पर डूरोफिक्स से चिपका दिया गया है। यही अगर चन्दन सा लगाया जाता तो खुशबू और ठंडक दोनों देता। पर यह तो पट्टे जैसा लगा है। इस नाम की तख्ती है कि हम बीते हुये है।ं हमारे भी तो पुरखे…..,
पुरखों के नाम से वह दिन उनकी स्मृति में मडराने लगा जब पुरखों का वह घर बेच कर लाखों की सम्पति इस घर में आई थी। वे फिर से जीवन की यात्रा में उल्टी और बहने लगीं।
जिन्दगी के खट्टे-मीठे अहसास उस घर की हवा, रोशनी और अँधेरे से जुड़े थे। उस घर में अपनी एक जगह थी, अपना अस्तित्व था। उस घर के हर कार्य से, हर वस्तु से हम जुड़ कर चलते थे। यहाँ उखड़ापन सा क्यों लगता है? वहाँ सारे घर में हम फैले हुये थे। यहाँ बस एक कमरे तक सिकुड़ कर रह गये है। कभी ड्राइंगरुम में कोई मिलने आ जाता है तो थोड़ी देर तक बातचीत होती है, पर कुछ ही देर बाद लगता है जैसे हम यहाँ पैबन्द जैसे है। हमारी वहाँ जरुरत नहीं है और अनजाने ही कदम, धीरे धीरे घसीट कर हमें फिर इसी कमरे तक ले आकर कैद कर देते।
उन्होंने करवट बदल कर देखा। उनकी जैसी एक काया भी कहीं पुरानी यादों में भटक रही थी। वे थोड़ा सा उठ कर बैठ गई।
”क्या हुआ? क्या सोच रहे हो?”
”कुछ नहीं येां ही।”
”यों ही क्या? तुम्हे भी आज घर याद आ रहा है।”
उत्तेजना में वे भी उठ कर बैठे गये।
”आज पुरुखों की निशानी भी खत्म हो गई।”
”हाँ, वे जश्न मना रहे हैं। भविष्य के नक्शे तैयार कर रहे हैं। हमें लगता हैं कि नयी रस्सी हम पकड़ नहीं पायेंगे, पुरानी हमारे हाथ से छूट गई हैं।”
”हूँ, धीरे धीरे सब खत्म हो जाता हैं। हम भी तुम भी।” एक नि:श्वास उनके मुँह से निकल गया।
वे अपनी ही धुन में बोलती रहीं। ”इसी को कहते हैं। भँवर में डूबना।”
”तुम बहुत भावुक हो। अब इसी घर को अपना घर समझो। जिन्दगी के बाकी दिन अब यहीं काटने हैं।”
”सच सच बोलेा क्या तुम्हे यह घर अपना लगता हैं?”
”क्योंं नहीं लगता हैं। मेरा ही तो हैं।” वे उत्साह में भर कर बोले, पर गर्म तवे पर पड़े पानी की छींटे जैसे तुरन्त ही बुझ गये।
”अपना घर लगता हैं तो संकोच क्यों करते हो? चार दिनों से दवा खत्म हो गई हैं, अखिलेश से कहते क्यों नहीं हो?”
”अरे वह तो मैं भूल गया। अब कह दूँगा।”
”मैंं सब जानती हूँ।” एक लम्बी साँस भर कर वे फिर बोली, ”अपनी जमीन से उखड़ा हुआ पेड़ कभी पनप नहीं सकता हैं। शायद वहाँ रहते तो अपने सगी साथियों के बीच, पुराने ही सही पर हरे भरे तो रहते। पर यहाँ समय से पहले ही झड़ जायेंगे।”
”इतना सोचेागी तो जिन्दगी में रोने के सिवा और कुछ भी शेष नही रह जायेगा।”
”तुम्हारे सामने अपना मन हल्का कर लेती हूँ इसलिए तो…., चाहती हँू कि तुम्हारे कन्धे पर चढ़ कर चली जाऊँ। पर वहाँ पहुँच कर भी यही चिन्ता लगी रहेगी कि तुम्हे कौन सम्भालेगा?”
”चाहता तो मैं भी यही हूँ कि तुम्हारे रहते चला जाऊँ। पर तुम इतनी भावुक हो कि मेरे पीछे अकेले रह न पाओगी।”
”नहीं नहीं ऐसा मत कहो, तुम्हारे बिना अकेले मैं नहीं रह सकती हूँ। पर तुम भी क्या अकेले रह लोगे।”
”जाना तो आगे पीछे ही पड़ेगा।”
घबरा कर दोनेां ने एक दूसरे के हाथ पकड़ लिये। नीची निगाह किये एक दूसरे से आँखे चुराते रहे। धीरे धीरे आँखें उठी। निगाहे मिलते ही बेसाख्ता दोनेां के मुँह से निकला ”परन्तु पहले कौन…………”
”तुम तो यहाँ आकर जम ही जाते हो। दो महीने हेा गये आये हुये, आख़ि़र कब तक पड़े रहोगे।”
”पड़े रहने की क्या बात हैं? अपने लड़के का ही तो घर हैं, अब रहो आराम से।”
”यह तो ठीक है कि घर हैं पर फिर भी पता नही क्यों अब यहाँ मन नहीं लगता है। तुम चलना चाहोगे तब तो चल पायेंगे। तुम चलना ही नही चाहते।”
”मैं क्यों नहीं चलना चाहता। तुम्हे ही यहाँ बैठे – बैठे खाने को मिलता हैं तो क्यों जाओगी वहाँ खटने।”
”†ुîश्र् तुम तो यहाँ जैसे बड़ा हल जोत रहे हो। जो कुछ हो सकता है सुबह से शाम तक करती ही रहती हूँ। जनम से बातें सुनाने की आदत है, वह अब बुढ़ापे में क्या बदलेगी।” आँखों से आँसू बह चले।
”हाँ हाँ, मैं तो तुम्हे बातें ही सुनाता रहा हूँ। चलो उठो, अभी चलो।”
उनका गुस्सा देखकर वे थोड़ा डर गई और खुशामद करती सी बोलीं।
”गुस्सा क्यों होते हो। क्या हम अपने घर नहीं चल सकते? ठीक है यहाँ सब कुछ है, पर वह हमारा घर है।”
वे यह कह कर उठ कर चले गये कि ”ठीक है टिकिट मँगवाने को कहता हूँ। वे विचारों की दुनियाँ के मध्य भँवर सी घूमती रहीं। यहाँ कोई भी काम करने में मन में संकोच पहले आकर बिराजमानर हो जाता है।
संकोच नहीं एक भय, एक डर। नये जमाने के यह लोग पुरानी हर चीज को खिल्ली उड़ाने की दृष्टि से देखते हैंं। सुबह पूजा की घन्टी बजाना उन्होंने छोड़ दिया कि देर से उठने वालों की नींद में व्याघात होगा। अपने घर में सुबह सुबह वे रेडियो पर भजन सुनती रहती हैं। और काम करती रहती हैं। पर यहाँ आकर लगता है कि ईश्वर में मन लगाने की परम्परा अब हमारी संस्कृति में नहीं हैं। यह हमारे ही खून के कतरे हैं। फिर इनकी संस्कृति इतनी भिन्न कैसे हो गई। ये लोग आवाजों की दुनियाँ मे बसते रहे हैं। हम शब्दों के संसार में रहते हैं। शोरगुल का कैसा ताण्डव नृत्य इन लोगों को भाता हैं। कौन गलत हैं कौन सही हैं यह कौन बताएगा? तो क्या हमीं बदल जायें? इन्ही के साथ रच बस जायें? अरे तो क्या अब हम भी पराये मर्द का हाथ पकड़ कर नाचना शुरु कर दें?
अपनी ही बात पर वे अकेले में भी जोर से हँस पड़ीं। एक पल की हँसी ने ही मन थोड़ा हल्का कर दिया। कमरे की खिड़की से झाँक कर देखा तो रसोई में कुछ चहल पहल सी लगी। वे उठ कर चल दी कि कुछ काम में हाथ बैटा दूँ। हर बार यही होता हैं कि काम हाथ से छीनने की कोशिश होती हैं कि आप बैठिये हम काम कर लेंगे। यह हमारे आदर-सत्कार और प्यार के कारण ही होगा। पर कहीं इसके साथ यह भी जुड़ा रहता हैं कि हम लोग अब नकारा हेा गये हैं। असमर्थ हो गये हैं। हमारी बुध्दि भी कुंठित हो गई हैं। हो ही नही गई हैं कुछ यह अहसास क्षण -क्षण दिलाया जाता हैं जैसे कभी हमारे पास शक्ति सार्मथ्य या मस्तिष्क नाम की वस्तुएँ थी ही नहीं। हमने अपनी जिन्दगी में जो कुछ भी किया, जो कुछ भी निर्णय लिये वह किसी की उधार ली हुई बुध्दि थी। शायद बुढ़ापा नाम ही ऐसा हैं जो सब कुछ लेने आता हैं, देने के नाम पर वह स्वयं ही कंगाल हैं तो दूसरे को क्या देगा?
”यह क्या बना रही हो, मृदुल?”
”कुछ नही माँ। इन्होंने अभी आकर बताया कि कुछ लोगों को आज शाम चाय पर बुला आये हैं। मेरी आज छुट्टी है सोचा अभी कुछ बना लँू।”
”मैं मदद करुँ?”
”नही माँ मैं कर लँूगी। आज एक नई डिश ट्राई कर रही हूँ।” मृदुल कुकरी बुक पर झुकी हुई थी।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा ओर बोली, ”ला, यह गिलास मैं पोंछ देती हूँ। तुम कुछ और कर लो अखिलेश।”
”रहने दो माँ मैं कर रहा हँू, तुम्हारे हाथ से छूट- छाट जायेगा।”
उन्हे ऐसा लगा कि कहीं उनके अन्दर ही कोई शीशा दरक गया है। परन्तु कोई नहीं समझ पाया कि गिलास टूटने की कीमत से कहीं ज्यादा मोल मन के भीतर के टूटने का होता हैं।
वे चुपचाप अपने कमरे में वापस आ गई। उन्होंनें अपने मन को धिक्कारा कि क्यों नहीं वह यह स्वीकार कर लेती कि वे लोग ऊपर से गिरने वाले पानी की भाँति नहीं है। उस पानी में प्रवाह होता है, ऊर्जा होती है और होता हैं सौंदर्य। वे लोग अपनी जिन्दगी की चरम स्थिती से अब नीचे ढ़लान की ओर है। वे अब उछले हुए पानी के छींटे मात्र रह गये हैं। जो अपने अन्दर की आग को भी बुझा नहीं सकते हैं।
अपने घर में तो वे सभी काम करती हैं। यहीं आकर क्या हो जाता हैं जो शीशे का गिलास छूने मात्र से ही टूट जायेगा, या टीवी उन्हे दूर से देखते ही बिगड़ जायेगा!
छ: वर्ष का अभिषेक उसी समय उनकी गोद में आकर बैठ गया। दादी के गले में बाँहे डालकर बोला ”दादी कहानी सुनाओ न।”
उनके निष्प्राण मन में साँसों का दौर फिर शुरु हो गया। अपने मन का कफ़न उतार कर उन्हेांने बच्चे को बाहों में समेट लिया। ”इस समय दिन में कहानी सुनेगा? आज पढ़ाई नहीं करनी हैं? अभी मम्मी आकर डाँटेगी।”
”नही दादी पहले कहानी सुनाओ। अच्छा एक सुना दो।”
”दिन में कहानी सुनाने से तेरा मामा रास्ता भूल जायेगा। फिर वह घर कैसे आयेगा।”
”तो वह टैक्सीवाले से पूछ लेगा। सुनाओ न दादी।” अभिषेक मचल उठा।
बच्चे की भोली बातों से उनका मन भी निश्छल हो गया। ”कौन सी सुनेगा?”
”वही सात परियों वाली।”
अभिषेक आराम से कहानी सुनने के लिए तैयार होकर बैठ गया।
”अच्छा बाबा, अच्छा।”
दोनेां ही कहानी के आदि, मध्य और अन्त में खोते चले गये। कहानी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि मृदुल ने आकर व्यवधान डाल दिया।
”अभिषेक, यह कहानी सुनने का समय नहीं है। जाओ पहले होमवर्क खत्म करो।”
”मम्मी बस थेाड़ी सी रह गई हैंं, जरा सी देर और।”
अभिषेक दादी की पीठ से चिपकता जा रहा था। वे भी जैसे उसे बचाने के लिए, हँसते हुये अपनी बाहे उस पर फैलाती जा रही थीं। वे इस खेल का हिस्सा नहीं, स्वयं ही खेल बन गई थीं। कही तो उनका कुछ अधिकार हैं। छोटे बच्चे पर ही सही। पर अभिषेक और दादी दोनेां ही हार गये। अभिषेक के जाने के बाद मृदुल वहीं उनके पास बैठ गई।
”मम्मी आजकल के बच्चों को परियों अरियों की कहानियाँ नहीं अच्छी लगतीं हैं। वे तो ऐरोप्लेन, कम्प्युटर, स्पेस, कार रेस, इनकी कहानियाँ सुनना चाहते हैं।”
वे बिना बोले रह न सकीं। ”बच्चे कहानी की कहानी नहीं सुनते हैं। वे तो कल्पना में उड़ते है। उन परियों और राजकुमारों के साथ। इस कल्पना से उनकी बुध्दि भी तीव्र होती है और विचार शक्ति भी आती है।”
”पर ऐसी कहानियों से उनका नॉलिज तो नहीं बढ़ता है।”
मृदुल बहस पर उतर रहींे है यह जानकर वे केवल इतना कहकर चुप हो गई। ”तथ्यों को जान लेने से ही ज्ञान नहीं बढ़ता है, ज्ञान बढ़ाने के लिए भविष्य का अनुमान लगाना भी जरुरी होता हैं। ऐसा न होता तो विज्ञान की इतनी उन्नती न हेाती।”
”अरे मम्मीजी यह सब फैन्टसीज़ का ज़माना गया। विज्ञान तो बच्चा अपनी घुट्टी में पीकर आता हैं।”
वे यहाँ भी हार गई। हारना शायद इतना बुरा नहीं लगता हैं जितना यह अहसास दिलाना कि तुम नहीं समझ सकते। हमारी पढ़ाई-लिखाई, हमारा अनुभव सब कूड़ेदान में डालने लायक हैं। उस दिन अखिलेश भी तो एैसा ही कुछ कह रहा जब मृदुल ने कहा, ”पापा से पूछते हैं।”
”पापा से क्या पूछना, जो तुम्हे समझ में आये वह करो,” अखिलेश की आवाज़ थी।
”क्यों पापा ने तो एल. आई. सी. में ही नौकरी की हैं।”
”उनको रिटायर हुए सालों को गये। न जाने कितने नये रुल्स निकल आये है। उनको क्या पता।”
वह वाक्य ”उनको क्या पता” हम दोनों के माथे पर डूरोफिक्स से चिपका दिया गया है। यही अगर चन्दन सा लगाया जाता तो खुशबू और ठंडक दोनों देता। पर यह तो पट्टे जैसा लगा है। इस नाम की तख्ती है कि हम बीते हुये है।ं हमारे भी तो पुरखे…..,
पुरखों के नाम से वह दिन उनकी स्मृति में मडराने लगा जब पुरखों का वह घर बेच कर लाखों की सम्पति इस घर में आई थी। वे फिर से जीवन की यात्रा में उल्टी और बहने लगीं।
जिन्दगी के खट्टे-मीठे अहसास उस घर की हवा, रोशनी और अँधेरे से जुड़े थे। उस घर में अपनी एक जगह थी, अपना अस्तित्व था। उस घर के हर कार्य से, हर वस्तु से हम जुड़ कर चलते थे। यहाँ उखड़ापन सा क्यों लगता है? वहाँ सारे घर में हम फैले हुये थे। यहाँ बस एक कमरे तक सिकुड़ कर रह गये है। कभी ड्राइंगरुम में कोई मिलने आ जाता है तो थोड़ी देर तक बातचीत होती है, पर कुछ ही देर बाद लगता है जैसे हम यहाँ पैबन्द जैसे है। हमारी वहाँ जरुरत नहीं है और अनजाने ही कदम, धीरे धीरे घसीट कर हमें फिर इसी कमरे तक ले आकर कैद कर देते।
उन्होंने करवट बदल कर देखा। उनकी जैसी एक काया भी कहीं पुरानी यादों में भटक रही थी। वे थोड़ा सा उठ कर बैठ गई।
”क्या हुआ? क्या सोच रहे हो?”
”कुछ नहीं येां ही।”
”यों ही क्या? तुम्हे भी आज घर याद आ रहा है।”
उत्तेजना में वे भी उठ कर बैठे गये।
”आज पुरुखों की निशानी भी खत्म हो गई।”
”हाँ, वे जश्न मना रहे हैं। भविष्य के नक्शे तैयार कर रहे हैं। हमें लगता हैं कि नयी रस्सी हम पकड़ नहीं पायेंगे, पुरानी हमारे हाथ से छूट गई हैं।”
”हूँ, धीरे धीरे सब खत्म हो जाता हैं। हम भी तुम भी।” एक नि:श्वास उनके मुँह से निकल गया।
वे अपनी ही धुन में बोलती रहीं। ”इसी को कहते हैं। भँवर में डूबना।”
”तुम बहुत भावुक हो। अब इसी घर को अपना घर समझो। जिन्दगी के बाकी दिन अब यहीं काटने हैं।”
”सच सच बोलेा क्या तुम्हे यह घर अपना लगता हैं?”
”क्योंं नहीं लगता हैं। मेरा ही तो हैं।” वे उत्साह में भर कर बोले, पर गर्म तवे पर पड़े पानी की छींटे जैसे तुरन्त ही बुझ गये।
”अपना घर लगता हैं तो संकोच क्यों करते हो? चार दिनों से दवा खत्म हो गई हैं, अखिलेश से कहते क्यों नहीं हो?”
”अरे वह तो मैं भूल गया। अब कह दूँगा।”
”मैंं सब जानती हूँ।” एक लम्बी साँस भर कर वे फिर बोली, ”अपनी जमीन से उखड़ा हुआ पेड़ कभी पनप नहीं सकता हैं। शायद वहाँ रहते तो अपने सगी साथियों के बीच, पुराने ही सही पर हरे भरे तो रहते। पर यहाँ समय से पहले ही झड़ जायेंगे।”
”इतना सोचेागी तो जिन्दगी में रोने के सिवा और कुछ भी शेष नही रह जायेगा।”
”तुम्हारे सामने अपना मन हल्का कर लेती हूँ इसलिए तो…., चाहती हँू कि तुम्हारे कन्धे पर चढ़ कर चली जाऊँ। पर वहाँ पहुँच कर भी यही चिन्ता लगी रहेगी कि तुम्हे कौन सम्भालेगा?”
”चाहता तो मैं भी यही हूँ कि तुम्हारे रहते चला जाऊँ। पर तुम इतनी भावुक हो कि मेरे पीछे अकेले रह न पाओगी।”
”नहीं नहीं ऐसा मत कहो, तुम्हारे बिना अकेले मैं नहीं रह सकती हूँ। पर तुम भी क्या अकेले रह लोगे।”
”जाना तो आगे पीछे ही पड़ेगा।”
घबरा कर दोनेां ने एक दूसरे के हाथ पकड़ लिये। नीची निगाह किये एक दूसरे से आँखे चुराते रहे। धीरे धीरे आँखें उठी। निगाहे मिलते ही बेसाख्ता दोनेां के मुँह से निकला ”परन्तु पहले कौन…………”