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कायर
कायर – 2

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कलायन पत्रिका

कायर


कहानी – प्रेमचन्द

 

 

उसकी माता ने पूछा, ‘क्या तुझे अब तक नींद न आई? मैंने तुझसे कितनी बार कहा कि थोड़ा बहुत घर का काम काज किया कर; लेकिन तुझे किताबों से ही फुरसत नहीं मिलती। चार दिन में तू पराए घर जायगी, कौन जाने कैसा घर मिले। अगर कुछ काम करने की आदत न रही, तो कैसे निबाह होगा?’

प्रेमा ने भोलेपन से कहा, ‘मैं पराए घर जाऊँगी ही क्यों?’

माता ने मुस्कराकर कहा, ‘लड़कियों के लिए यही तो सबसे बड़ी विपत्ति है, बेटी! माँ बाप की गोद में पलकर ज्यों ही सयानी हुई, दूसरों की हो जाती है। अगर अच्छे प्राणी मिले तो जीवन आराम से कट गया, नहीं रो-रोकर दिन काटना पड़ा। सब कुछ भाग्य के अधीन है। अपनी बिरादरी में तो मुझे कोई घर नहीं भाता। कहीं लड़कियों का आदर नहीं; लेकिन करना तो बिरादरी में ही पड़ेगा। न जाने जात-पाँत का बंधन कब टूटेगा?’

प्रेमा डरते-डरते बोली, ‘कहीं-कहीं तो बिरादरी के बाहर भी विवाह होने लगे हैं!’

उसने कहने को कह दिया; लेकिन उसका ह्मदय काँप रहा था कि माता जी कुछ भाँप न जायँ।
माता ने विस्मय के साथ पूछा, ‘क्या हिन्दुओं में ऐसा हुआ है!”

फिर उसने आप ही आप उस प्रश्न का जवाब भी दिया, ‘और देा चार जगह ऐसा हो भी गया, सो उससे क्या होता है?’

रेमा ने इसका कुछ जवाब न दिया, भय हुआ कि माता कहीं उसका आशय समझ न जायँ। उसका भविष्य एक अँधेरी खाई की तरह उसके सामने मुँह खोले खड़ा था, मानो उसे निगल जाएगा।

उसे न जाने कब नींद आ गई।

प्रात:काल प्रेमा सोकर उठी, तो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय हो गया था। सभी महत्वपूर्ण फैसले हम आकस्मिक रूप से कर लिया करते हैं, मानो कोई दैवी शक्ति हमें उनकी ओर खींच ले जाती है; वही हालत प्रेमा की थी। कल तक वह माता पिता के निर्णय को मान्य समझती थी, पर संकट को सामने देखकर उसमें उस वायु की हिम्मत पैदा हो गई थी, जिसके सामने कोई पर्वत आ गया हो। वही मंद वायु प्रबल वेग से पर्वत के मस्तक पर चढ़ जाती है और उसे कुचलती हुई दूसरी तरफ जा पहुँचती है। प्रेमा मन में सोच रही थी, माना, यह देह माता पिता की है; किंतु आत्मा तो मेरी है। मेरी आत्मा को जो कुछ भुगतना पड़ेगा, वह इसी देह से तो भुगतना पड़ेगा। अब वह इस विषय में संकोच करना अनुचित ही नहीं, घातक समझ रही थी। अपने जीवन को क्यों एक झूठे सम्मान पर बलिदान करे? उसने सोचा विवाह का आधार अगर प्रेम न हो, तो वह देह का विक्रय है। आत्म समर्पण क्या बिना प्रेम के भी हो सकता है? इस कल्पना ही से कि न जाने किस अपरिचित युवक से उसका विवाह हो जाएगा, उसका ह्मदय विद्रोह कर उठा।

वह अभी नाश्ता करके कुछ पढ़ने जा रही थी कि उसके पिता ने प्यार से पुकारा, ‘मैं कल तुम्हारे पिं्रसिपल के पास गया था, वे तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहे थे।’

प्रेमा ने सरल भाव से कहा, ‘आप तो यों ही कहा करते हैं।’

‘नहीं, सच।’

&यह कहते हुए उन्होंने अपनी मेज की दराज खोली, और मखमली चोैखटों में जड़ी हुई एक तस्वीर निकालकर उसे दिखाते हुए बोले, ‘यह लड़का आई. सी. एस. के इम्तहान में प्रथम आया है। इसका नाम तो तुमने सुना होगा?’

बूढ़े पिता ने ऐसी भूमिका बाँध दी थी कि प्रेमा उनका आशय न समझ सके लेकिन प्रेमा भाँप गई! उसका मन तीर की भाँति लक्ष्य पर जा पहुँचा। उसने बिना तस्वीर की ओर देखे ही कहा, ‘नहीं, मैंने तो उसका नाम नहीं सुना?’

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