एक
दिल ने तेरी याद के मौसम बुला लिये हैं फिर
दिल ने तेरी प्रीत के परचम हिला दिये हैं फिर ।।१।।
मैं चला था घर तरफ, तुम खड़ीं थी राह में
देख मुझको हँस पड़ीं थी,वे क्षण आ गये हैं फिर ।।२।।
मैं ठगा सा तक रहा था,गुन रहा था कि तू
पास आके कहे मुझे,दिन फिरे से लगे हैं फिर ।।३।।
तूने मेरे हाथ को थाम चूमा था उसे
फिर कहा,तूने मुझे कहकहे दे दिये हैं फिर ।।४।।
हम चले,बारिश हुई,भींग गये हम और तुम
वे महकते लरज़ते पल मेरे,आ गये हैं फिर ।।५।।
लू थपेड़े दे रही थी,किवाड़ें थी खुली
तुमने साड़ी थी सुखाई,वे दिन आ गये हैं फिर ।।६।।
ठंड भी तुमने साथ मेरे कहीं काटी तो थी
वे पहाड़ों में कटे दिन तुझे बुला रहे हैं फिर ।।७।।
“रंक” के दिल में तू ही है,तू नहीं तो और नहीं
तेरे बिन घर घर नहीं,कुछ घुटन सी लगे है फिर ।।८।।
—
दो
तेरी ज़मीं पे आके हम
पा लेंगे ख़ुशियाँ गा के हम।।१।।
जब भी मिलोगी तुम हमें
ग़म सर ले लेंगे सारे हम।।२।।
सदियों पुराना ये मकां
जी भर के कूदे फांदे हम।।३।।
जलसा यहाँ पे रोज़ है
बागों में झूला डालें हम।।४।।
शाहे ख़ुदा तू है कहाँ
तू डोर ,तेरे धागे हम।।५।।
तुझसे मिलेंगे “रंक” तभी
दिल से करेंगे नाले हम।।६।।
—
पीताम्बर दास सराफ “रंक”
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