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आँख खुल गई

आँख खुल गई

कलायन पत्रिका

आँख खुल गयी


भविष्यवाणी

विक्रम एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था। उसके पिता एक गाँव में रहते थे। खेती-किसानी उनकी आजीविका का साधन था। अपने बेटे को अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने विक्रम का दाखिला शहर के एक अच्छे स्कूल में करा दिया।

हॉस्टल में विक्रम के सभी संगी-साथी अच्छे घरों के लड़के थे। वे विभिन्न शहरों से वहाँ पढने आये हुये थे। विक्रम के मन में हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं उसके संगी-साथी, गाँव का होने के कारण, उसे अपने से कम न समझ लें।

विक्रम अपने हाव-भाव और व्यवहार से यह जताने का प्रयास करता था कि वह एक अमीर परिवार का लड़का है। इसके लिये वह अनाप-शनाप तरीकों से अपने पिता की मेहनत की कमाई को अपने संगी-साथियों पर खर्च करता था। कभी उन्हें कैन्टीन में ले जाकर खिलाता तो कभी आउटिंग के दिन उन्हें पिक्चर दिखाता। बात-बात में अपने परिवार की अमीरी का बखान करता था। पूरा ध्यान इस ओर लगा होने के कारण पढ़ने में उसका मन नहीं लगता था।

विक्रम के कमरे में उसका साथी था, वैभव, एक शान्त स्वभाव का सीधा-सादा लडका। एकदम सादगी से रहने वाला वैभव भीड में अलग दिखाई देता था। कम बोलना उसका स्वभाव था। बाजार जाता तो केवल वही चीजें खरीदता जिनकी उसे आवश्यकता होती थी। पढ़ाई में सदा आगे रहता था। विक्रम को लगता था कि वैभव साधारण परिवार का लड़का है। वह उस पर कुछ ज्यादा ही रोब दिखाता था।

‘वैभव, मैंने कभी कोई काम नही किया है। घर में तो एक ग्लास पानी तक मुझे स्वयं उठ कर नहीं लेना पड़ता हैं। मेरे घर में इतने नौकर-चाकर हैं……। यहाँ हॉस्टल में आकर तो बिस्तर तक बिछाना पड़ता है। मुझे यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।’ विक्रम डींग हाँकता । *

‘थोडे दिनों में ठीक लगने लगेगा, दोस्त। वैसे भी अपना काम तो सबको स्वयं ही करना चाहिये।” वैभव शालिनता से उसे समझाता।

‘तुम्हारी यह सब करने की आदत है न, इसीलिये तुम ऐसा कह रहे हो।’ विक्रम कहता और वैभव इस बात पर केवल मुस्करा देता था।

गर्मी की छुटिटयाँ होने वाली थी सभी बच्चे बहुत उत्साहित थे। सब अपने घर जाने की तैयारी में लगे थे। सामान बाँधता हुआ वैभव बोला, ‘विक्रम छुटिटयों में तुम्हारा क्या प्रोग्राम हैं, घर पर ही रहोगे या कहीं घूमने भी जाओगे?’

‘घूमने तो जरुर जाऊँगा। हम लोग गर्मी की छुटिटयों में कहीं न कही जरुर जाते हैं।’ विक्रम ने गप्प हाँक दी।

‘अगर कानपुर की तरफ आओ तो मेरे घर जरुर आना।’ वैभव ने स्नेह से आमंत्रित किया।

‘हाँ हाँ क्यों नही। तुम इस डायरी में अपना पता लिख कर दे दो।’ विक्रम ने एक लाल डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।

गाँव पहुँच कर विक्रम का मन कही भी नही लगा। एक सप्ताह बाद ही वह अपने माता-पिता से अनुमति लेकर दो दिनों के लिये कानपुर की यात्रा पर चल दिया। जब उसकी ट्रेन कानपुर पहुँची तो वह अपनी एक अटैची और बैग के साथ स्टेशन पर उतर कर कुली के लिये इधर-उधर देखने लगा। धीरे-धीरे भीड़ छूटने लगी। जीन्स और टीशर्ट में सजे विक्रम को सामान उठाने में शर्म आ रही थी। वह चकित था इतने बड़े स्टेशन पर एक भी कुली नहीं हैं।

‘बेटा, क्या बात हैं? तुम कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो। क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ?’ सफेद धोती कर्ते में एक अधेड़ उƒा का त्यक्ति उसके सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटा सा ब्राीफकेस था।

‘बेटा, क्या बात हैं? तुम कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो। क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ?’ सफेद धोती कर्ते में एक अधेड़ उƒा का त्यक्ति उसके सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटा सा ब्राीफकेस था।

‘आज कुली हड़ताल पर है। चलो मैं बाहर तक तुम्हारा सामान पहुँचा देता हूँ।’ कहते हुये उस व्यक्ति ने विक्रम का सामान उठा लिया।

‘तुम्हारा सामान तो बिलकुल हल्का है। मैं समझा था भारी होने के कारण तुमसे उठ नहीं रहा हैं। वैसे तुम्हें जाना कहाँ है, बेटा?’

‘जी, साकेत कालोनी, श्री केदारनाथ जैन के घर जाना है।’

‘अच्छा -अच्छा तुम वैभव के साथी होगे।’

‘हाँ – हाँ, लेकिन आप वैभव को कैसे जानते हैं?” परदेश में किसी परिचित के मिल जाने की खुशीं विक्रम के स्वर में छलक उठी।

‘चलो में तुम्हें वैभव के पास पहुँचा देता हँू।’ कहते हुये वह व्यक्ति एक कार के पास जा कर रुक गया।

‘लेकिन ……’ विक्रम कुछ सोच में पड़ गया।

‘आओ – आओ बेठो। मैं तो उधर ही जा रहा हूँ। चलो तुम भी बिना भटके पहुँच जाओगे।’

कानपुर नया शहर था। विक्रम यह सोचकर उसके साथ कार में बैठ गया कि यह व्यक्ति कम से कम वैभव को जानता है, अत: किसी धोखे की सम्भावना नहीं हैं। परन्तु एक साधारण से व्यक्ति का कार से जाना उसे बार-बार खटक रहा था। कार आलीशान कोटियों वाली कालोनी से गुजर रही थी।

‘साकेत कालेानी। वो देखो हम लोग वैभव के घर पहुँच गये।’ कार एक आलीशान कोठी के व्दार पर पहुँच चुकी थी।

‘ये … वैभव का घर! अभी यह बात पूरी भी नहीं कर सका था कि कार पोर्टिको में रुक गई और वैभव ‘ पिता जी ….’ कहता हुआ आता दिखाई दिया।

‘देखो तेा मेरे साथ और कौन आया है।’ कहते हुए धोती-कुर्ते वाले सज्जन ने कार का दूसरा दरवाजा खोल दिया।

किंकर्तव्य विमूढ से बैठे विक्रम पर नजर पड़ते ही वैभव खुशी से चहक उठा।

‘अरे, विक्रम तुम !’

अचम्भितसा विक्रम विस्फारित नेत्रों से वैभव का ठाठ-बाट देखता रह गया।

‘वैभव तुम इतने अमीर हो तुमने कभी बताया नहीं ! माफ करना तुम्हारे पिता जी को देखकर मैं…मैं…’ पिता जी को सादगी पसन्द है। वे बहुत उच्च विचारों के इंसान हैं और उन्होंने हमें भी दिखावे से दूर ही रहना सिखाया है।’

‘वैभव, मुझे तो यह सोचकर ही शर्म आ रही है कि इतने बड़े हो कर भी वे स्वयं ही स्टेशन से मेरा सामान उठा कर लाये।’
‘मेरे पिता जी कहते हैं, कोई काम छोटा नहीं होता। सब को अपना काम स्वयं ही करना चाहिये। इसीलिये हम सब अपना-अपना काम स्वयं ही करते हैं।’

‘तुम्हारे घर आकर मेीर आँख खुल गई दोस्त। मैं तो एक साधारण किसान परिवार का लड़का हूँ। लेकिन सब पर रोब डालने के लिये अपने लक्ष्य से भटक गया था। परन्तु अब मैं मन लगाकर पढूँगा और सादगी से रहूँगा।’

वैभवने जोड़ा, ‘एक चीज और विक्रम। सदा सत्य….’

‘सत्य का ही आचरण करुँगा’ विक्रम ने वैभव के स्वर में स्वर मिलाया।

दोनों दोस्तों ने एक दूसरे को गले लगा लिया।

 

नीलम राकेश

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