डोर- 3

कलायन पत्रिका


डोर

“वहाँ उसका क्या भविष्य बनेगा ?” वे बेटों से पूछ रही थी – “यहाँ अपने लोग हैं।”

अब उनकी एकमात्र चिंता थी टिकिट के लिए पैसों की व्यवस्था करना। इस अभियान में वे नितान्त अकेली थीं। पुराने जमाने में धरती की कोख में या कोनों में रुपया, सोना दबाकर रख दिया जाता था। उन्होंने भी पुरानी संदूकों में पुरानी पोटलियाँ ढूँढी। खोलीं। पुराने जेवर, सोने-चाँदी के तार, पिता का बचा हुआ पैसा, सब मिलाकर बमुश्किल टिकट लायक पैसा इकठ्ठा कर सकीं। हर बार पैसा गिनते हुए हिसाब लगाते हुए सोनू का चेहरा सामने आ जाता। बस एक बार बेटी वापस आ जाये। सबकी तरह उनका मन नहीं हो सकता… सबकी तरह वे नहीं सोच सकतीं। नहीं छोड़ सकतीं बेटी को इतनी बड़ी दुनिया में, जो वेगवान नदी की तरह बह रही हो।

“आप टिकिट भिजवा दें।” राकेश कह रहा था। बोलते हुए न ग्लानि थी, न शर्म, न पुरुष और पति होने का गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का ग्लानि भाव। उन्हें याद है – उनके देवर सात बरस विदेश में रहे थे और देवरानी गाँव में। तब न छूटने का भय रहता था न छोड़ने का संदेह। रिश्तों का धागा इतना मजबूत रहता था कि लौटकर आना ही होता था – मगर आज किस रिश्तेदार, किस बात पर, किस भावना पर विश्वास किया जाये।

“मम्मा, यह क्या किया आपने? सब कुछ खतम कर दिया होगा। मैं अपना इंतजाम करके आ जाती।” सोनू ने सिसकते हुए कहा।

“बच्चों से बढ़कर क्या होता है बेटी !”

“यहीं नौकरी कर लेती।”

“न बेटा न… मैंने कहा था न कि तुम्हारी डोर मुझसे बँधी है। बस तुम एक बार आ जाओ सब ठीक हो जायेगा। हम साथ-साथ रहेंगे तो एक-दूसरे की तकलीफें बाँट लेंगे।” शेष शब्द आकाश तरंगों के बीच में खो गये थे।

उन्होंने आखिर चीज भी निकालकर सामने रख ली। बेटों से कहा था कि बम्बई से सोनू को ले आयें तो उनका तर्क था कि जब इतनी दूर से आ सकती है तो मुम्बई से नहीं आ सकती? उसे अपने आप आने-जाने की आदत डालने दो। छोटी बच्ची नहीं है वह! सचमुच वह छोटी बच्ची नहीं है पर पाँवों पर खड़े करते-करते पता चला कि पाँव ही कमजोर हो गये हैं। सो उन्होंने पुश्तों पुरानी चीजों को सबकी आँख बचाकर बाजार में ले जाकर बेच दिया। जानती थीं कटौता बहुत कटा है। ऐसी चीजें बार-बार बनती भी नहीं हैं, मगर इस समय उन्हें बेटी के आगमन, उसकी सुरक्षा तथा उसके प्रति विश्वास व्यक्त करने से ज्यादा कुछ भी नहीं लग रहा था। कभी किसी ने पूछा तो क्या जवाब देंगी ? वह अमानत थी। निशानी थी परिवार की परम्परा का अंश थी। पर उसके अलावा कोई इतर वस्तु उनके अपने अधिकार में थी भी नहीं इसलिए उस करधनी को बेचकर वे अकेली ही मुम्बई के लिए रवाना हो गईं। उन्हें लग रहा था आसमान में खिंची वह अदृश्य डोर धीरे-धीरे कम होती जा रही है क्योंकि वे उसी डोर से बँधी खिंची चली जा रही थीं जो डोर कभी नाल के रूप में कटकर भी नहीं कटी थी।

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